गव्य विकास निदेशालय के निदेशक की सामंती सोच, पहले रजिस्टर मेन्टेन करो, जब अधिकारियों को लगेगा कि तुम मिलने योग्य हो, तब मिलेंगे!
गव्य विकास निदेशालय (पशुपालन प्रभाग, कृषि पशुपालन एवं सहकारिता विभाग) झारखण्ड का सामंती सोच! पहले अपना नाम, पता बताओ, विभाग में आने का उद्देश्य बताओ, जब संबंधित अधिकारी तुम्हारे नाम और पता को देखेंगे, तुम्हारे आने का उद्देश्य जानेंगे और जब अधिकारी को तुमसे मिलने की इच्छा होगी, तभी वे मिलेंगे और अगर नहीं इच्छा होगी तो तुम चाहे झारखण्ड के पाकुड़ के किसान हो या रांची के, तुम अपनी समस्याओं को लेकर नाक रगड़ते रह जाओगे। वे नहीं मिलेंगे।

गव्य विकास निदेशालय का इस प्रकार का तुगलकी फरमान आठ अक्तूबर 2026 को गव्य निदेशक डॉ. संजीव कुमार के हस्ताक्षर से जारी हुआ है। जिससे पूरे विभाग में इस सामंती व्यवस्था पर लोग सवाल उठाने लगे हैं। अब सवाल यह है कि जिस प्रकार का यह विभाग है। वहां जायेंगे कौन? किसान और मजदूर ही न। किसलिये जायेंगे, तो जाहिर है अपनी समस्याओं को लेकर। झारखण्ड में कितने किसान हैं, जो इनके आगंतुक रजिस्टर को भर पायेंगे और उनसे मिलने के लिए आस लगाकर बैठेंगे। यह सोचकर की गव्य विकास विभाग के भगवान बने ये अधिकारी की जब कृपा होगी तो वे बुलायेंगे और उनकी समस्या सुनेंगे।
सवाल यह भी है कि इस प्रकार की आगंतुक रजिस्टर तो हमें लगता है कि इस विभाग की मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की या इनके सचिव अबू बकर सिद्धखी पी अपने कार्यालय या आवास में भी नहीं लगाये होंगे। कारण स्पष्ट है कि यह विभाग ऐसा विभाग है, जो सीधे झारखण्ड की आत्मा जिन्हें किसान कहा जाता है, उनसे जुड़ा है। किसानों को सम्मान न कर, उन्हें भी दोयम दर्जे की सूची में ला खड़ा करने की जुर्रत ऐसे ही अधिकारी जब करेंगे तो राज्य में किसान और कृषि का क्या हाल होगा? ये समझा जा सकता है।
हालांकि अभी ये मामला तूल नहीं पकड़ा हैं। लेकिन लगता है कि अब तूल पकड़ेगा, क्योंकि कई लोगों ने विद्रोही24 को बताया कि इस प्रकार की तुगलकी फरमान व सामंती सोच से उनकी भावनाओं को ठेस लगा है। जिन अधिकारियों को किसानों से डायरेक्ट बात करने में शर्म आती है। वैसे अधिकारियों को चाहिए कि ऐसे विभाग से अपनी दूरियां बना लें अथवा सरकार को चाहिए कि ऐसे अधिकारियों को जितना जल्दी हो सके, वीआरएस दे दें, ताकि वे आराम से अपने घर में रहकर अंबानी या अडानी की तरह जिंदगी जी सकें।
वरिष्ठ पत्रकार नवल सिंह ने विद्रोही24 को बताया कि जब वे विभाग की उपलब्धियों की जानकारी के लिए उक्त विभाग में गये तो उन्हें भी ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उनका कहना था कि यह विभाग किसान और मजदूरों का विभाग हैं, वहां इस प्रकार की मानसिक दिवालियेपन वाली बात होनी ही नहीं चाहिए। इसी गव्य विभाग से एक अवकाश प्राप्त अधिकारी ने विद्रोही24 को बताया कि इस प्रकार की व्यवस्था तो झारखण्ड सरकार के किसी भी निदेशालय में नहीं हैं और न ही इस प्रकार की सामंती सोच किसी विभाग के अधिकारियों में हैं। लेकिन गव्य विकास निदेशालय ने ऐसी सोच को लाकर अपनी सामंती प्रवृत्ति को जमीन पर ला खड़ा किया है।
