झारखण्ड के शिक्षा विभाग को पता ही नहीं, इधर लक्षद्वीप ने बच्चों के स्कूल बैग और पढ़ाई की सुध ले ली

जब छोटा सा केन्द्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप, भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देशों को पालन करने में रुचि दिखा सकता है, उसे क्रियान्वयन करने के लिए सक्रिय हो सकता है, तो झारखण्ड में ऐसा देखने को क्यों नहीं मिल सकता, पर यहां का शिक्षा विभाग रुचि लेगा तभी न। यहां तो झारखण्ड को दूहने से किसी को फुर्सत ही नहीं।

जब छोटा सा केन्द्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप, भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देशों को पालन करने में रुचि दिखा सकता है, उसे क्रियान्वयन करने के लिए सक्रिय हो सकता है, तो झारखण्ड में ऐसा देखने को क्यों नहीं मिल सकता, पर यहां का शिक्षा विभाग रुचि लेगा तभी न। यहां तो झारखण्ड को दूहने से किसी को फुर्सत ही नहीं।

भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सारे राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों को विषयों के शिक्षण और स्कूल बैगों के वजन को लेकर एक दिशा-निर्दश जारी किये है। जिसे तत्काल प्रभाव से सभी राज्यों में लागू होने है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का कहना है कि पहली और दूसरी कक्षा के छात्र-छात्राओं को होमवर्क नहीं दिये जाये। भाषा और गणित को छोड़कर, कोई अन्य विषय पहली और दूसरी कक्षा के लिए नहीं होनी चाहिए। एनसीइआरटी द्वारा निर्देशित कक्षा तीन से से पांच तक के लिए भाषा, इवीएस और गणित ही सिर्फ जरुरी है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कहा है कि पहली और दूसरी कक्षा के लिए स्कूल बैग का वजन- डेढ़ किलो, तीसरी से लेकर पांचवी कक्षा के लिए स्कूल बैग का वजन – दो से तीन किलो, छठी एवं सातवी कक्षा के लिए स्कूल बैग का वजन – चार किलो, आठवीं व नौवीं कक्षा के लिए साढ़े चार किलो, तथा दसवी कक्षा के लिए स्कूल बैग का वजन पांच किलो होनी चाहिए।

आश्चर्य है, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के इन दिशा-निर्देशों को छोटे-छोटे राज्य शीघ्रता से अनुपालन करने में लगे हैं, पर इस संबंध में झारखण्ड सरकार का शिक्षा विभाग कोई ठोस स्टेप नहीं लिया है, ऐसे भी झारखण्ड के स्कूली बच्चों के बैगों का वजन ज्यादा हो जाये या कम, इन्हें क्या फर्क पड़ता है, या इन बच्चों के बैगों में जरुरत से ज्यादा होमवर्क की कॉपियां या किताबें बढ़ जाये तो भी इनका क्या फर्क पड़ता है, फर्क तो बच्चों और उनके अभिभावकों को पड़ता है, जो बेकार की किताबों और होमवर्क के पचड़ों में पड़कर बच्चों के साथ-साथ अपनी भी मानसिक क्षमता को प्रभावित कर लेते हैं।

Krishna Bihari Mishra

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