धर्म

चुनौतियों से मुक्ति पाने का सबसे सुगम तरीका परमहंस योगानन्द का बताया आध्यात्मिक पथः स्वामी निगमानन्द

योगदा सत्संग आश्रम में आयोजित रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए स्वामी निगमानन्द ने कहा कि आज जो नाना प्रकार की चुनौतियां हमारे जीवन में जो मुंह बाये खड़ी हैं, उसके शिकार केवल आप ही नहीं हैं, बल्कि ये चुनौतियां अनादि काल से चली आ रही है। लोग उसका सामना करते रहे हैं, कुछ उस पर विजय पाये और कुछ उस पर विजय नहीं पा सकें। लेकिन इन नाना प्रकार की चुनौतियों पर विजय पाने का सबसे सरल तरीका है – परमहंस योगानन्द जी द्वारा बताया गया आध्यात्मिक पथ। अगर हम उनके बताये पथ को अपनाते हैं, तो हमारा जीवन सरल व सुगम हो जायेगा।

उन्होंने इस बात पर जोर देकर कहा कि आधुनिक विज्ञान वहां तक नहीं पहुंच सकता, जहां तक परमहंस योगानन्द जी का बताया मार्ग हमें पहुंचाता है। परमहंस योगानन्द जी का चुनौतियां के समाधान के बारे में बताया गया मार्ग बहुत ही सुंदर और सरल है। उन्होंने कहा कि आजकल की दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती आइडेंटिटी क्राइसिस की है। लोगों को पता ही नहीं कि वे क्या हैं? और करना क्या है?

स्वामी निगमानन्द ने इस आइडेंटिटी क्राइसेस को लेकर एक प्राचीन कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि एक बार जब राजा जनक सो रहे थे। तब उन्होंने स्वप्न में देखा कि वे भिखारी है। भीख मांग रहे हैं। कोई उन्हें भीख दे रहा है और कोई भीख नहीं दे रहा है। जब उनका स्वप्न भंग हुआ तो उन्होंने स्वयं को राजा के रूप में देखा। उन्होंने इस बात को लेकर सभा बुलाई और सभासदों से पूछा कि आखिर वे क्या है? स्वप्न में दिख रहे भिखारी या सही में राजा? राजा जनक के इस सवाल को देखकर सभी आश्चर्य में पड़ गये कि भला ये कोई सवाल है? तभी उनके मंत्री कही से महर्षि अष्टावक्र को ले आये। अष्टावक्र को देखते ही सभी सभासद् हंसने लगे।

जिसे देखकर अष्टावक्र ने कहा कि ये सभी उनके शरीर को देखकर हंस रहे, लेकिन इस शरीर के अंदर जो ज्ञान के रूप में आत्मा हैं, उसे ये देख ही नहीं सकते। इसलिए वे हंस रहे हैं। तभी राजा जनक ने अष्टावक्र को बैठने को कहा। अष्टावक्र ने कहा कि राजा जनक अभी आप शिष्य के रूप में हमारे सामने हैं और मैं गुरु, अतः मेरे लिए ऊंची आसन और आपके लिए उससे नीचे आसन होनी चाहिए। राजा जनक ने ठीक वैसा ही किया। तभी राजा जनक ने वो सवाल पूछा जो उन्होंने सभासदों से की थी। वे क्या हैं? भिक्षुक या राजा। महर्षि अष्टावक्र ने कहा कि न तुम राजा हो और न ही भिक्षुक, तुम केवल तत्वमसि हो। राजा जनक को ज्ञान हुआ और तब जाकर वे राजर्षि बने।

स्वामी निगमानन्द ने कहा कि ये आइडेंटिटी क्राइसिस से लोग आज भी जूझ रहे हैं। उन्हें पता ही नहीं कि वे क्या हैं, करना क्या है, जिंदगी खत्म हो जाती है और लोग स्वयं को समझ नहीं पाते और इसी उधेड़ बुन में उनकी जिंदगी समाप्त हो जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि आजकल के लोगों को कई लोगों से अपेक्षाएं होती है और ये अपेक्षाएं भी कई चुनौतियों को जन्म देती हैं। उन्होंने इस पर भी युक्तेश्वर गिरि और परमहंस योगानन्द से जुड़ी कथा सुनाई, कि कैसे परमहंस योगानन्द जी अपने गुरु युक्तेश्वर गिरि से बिना बताए आश्रम को छोड़कर चल दिये थे और जब वे आश्रम लौटे तो उन्हें लगा कि उनके गुरु युक्तेश्वर जी गुस्सायेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। क्योंकि युक्तेश्वर गिरि जी ने परमहंस योगानन्द जी से कोई अपेक्षा ही नहीं रखी थी।

उन्होंने कहा कि चुनौतियां कई युद्धों को भी जन्म देती है। जब आप जीवन धारण करते हैं तो कई युद्ध आपके जीवन में चलते रहते हैं, अगर आप इस जीवन रुपी युद्ध में स्थिर हैं तो युद्धिष्ठिर है। उन्होंने इस पर भी एक कथा सुनाई जो रोचक थी। उन्होंने कहा कि एक बार श्रीकृष्ण दुर्योधन के पास गये और उनसे कहा कि वो उनके लिए एक सत्यनिष्ठ व्यक्ति खोज लाये। लेकिन दुर्योधन का कहना था कि इस संसार में सत्यनिष्ठ व्यक्ति कोई हैं ही नहीं। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि थोड़ा जोर लगाओ, देखो, कही मिल जाये।

लेकिन दुर्योधन को एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला। अब भगवान युद्धिष्ठिर के पास गये और उन्हें कहा कि इस संसार में अगर कोई दुरात्मा व्यक्ति हैं, तो खोज कर लाओ। युद्धिष्ठिर ने कहा कि उन्हें तो इस संसार में कोई दुरात्मा व्यक्ति ही नहीं दिखता। भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे भी कहा कि जोर लगाओ, देखो कही मिल जाये। पर अंत में युद्धिष्ठिर को कोई दुरात्मा व्यक्ति नहीं मिला। अंत में भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि प्रभु माफ करें, हमें तो कोई दुरात्मा व्यक्ति नहीं मिला। इसका मतलब क्या, इसका मतलब यह है कि जैसी जिसकी सोच होती है, वैसे ही लोग उसके सामने आ जाते हैं। आप अपनी सोच और इच्छाशक्ति को जैसा रखेंगे। वैसा ही सब कुछ होता जायेगा।

उन्होंने कहा कि हमारे शरीर में जो चक्र है। वे दरअसल पांडव पुत्रों का स्थान रखते हैं। जैसे मूलाधार चक्र -सहदेव, स्वाधिष्ठान -नकुल, मणिपुर – अर्जुन, अनाहत -भीम, और विशुद्धि – युद्धिष्ठिर की तरह है। ये पांचों मिट्टी, जल, अग्नि, वायु, आकाश का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब हम क्रिया-साधना करते हैं, तो इससे चेतना का परिवर्तन होता है और प्राणशक्ति को इससे ऊर्जा मिलती है।

उन्होंने कहा कि हमारे जीवन में देवासुर संग्राम की तरह युद्ध चल रहा है। नकारात्मक शक्तियां असुर और सकारात्मक शक्तियां देवता का प्रतिनिधित्व करती हैं। हर के अंदर कौरव-पांडव हैं। पांडवों को हमेशा कौरवों को परास्त करना है। हमेशा आप अंतःनिरीक्षण करते रहे। इससे आपको सत्य को समझने में आसानी होगी। इसके लिए टाइम मैनेजमेंट करिये। टाइम मैनेजमेंट के साथ इनर्जी मैनेजमेंट पर भी ध्यान देना होगा। मैनेजमेंट का भी एक तरीका होता है। नहीं तो आप कुछ भी नहीं कर पायेंगे।

आपकी इनर्जी, आपकी चेतना को सिर्फ ध्यान के द्वारा ही ठीक रखा जा सकता है। आपको अपने शरीर को ठीक रखने की कला भी आनी चाहिए। आपको अपनी भावना को नियंत्रित करने की कला भी आनी चाहिए। योगदा सत्संग यही सिखाता है। आप अपनी सोच, अपनी भावना और अपने विचार को कैसे संतुलित रख सकते हैं, इसके लिए परमहंस योगानन्द जी के बताये पाठों का अभ्यास करिये। उनकी बताई शिक्षाएं आपको सकारात्मकता की ओर ले जायेंगी।

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