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फेडरेशन ऑफ ऑल व्यापार संगठन के अध्यक्ष दीपेश मिले प्रख्यात समाजवादी देवकीनंदन नारसरिया से, दी स्वलिखित पुस्तक, किया सम्मानित

फेडेरेशन ऑफ ऑल व्यापार संगठन के अध्यक्ष दीपेश निराला गुरुवार को 1928 में जन्मे समाजवादी देवकीनंदन नारसरिया जी उर्फ देवला बाबू से मिले और उनसे काफी लंबी चर्चा की, जिससे उन्हें रांची के इतिहास के बारे में भी जानकारी प्राप्त हुई। दीपेश निराला ने उनको अपने स्वलिखित पुस्तक और अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया। जब वे देवला बाबू को सम्मानित कर रहे थे, तब उनके साथ उमाशंकर सिंह, विनोद जैन बेगवानी और सुजीत कुमार पांडेय भी मौजूद थे।

देवला बाबू 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया था और 1951 के समाजवादियों का रांची में हुए अखिल भारतीय सम्मेलन, जिसमें डॉ राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अशोक मेहता, अरुणा आसिफ अली, अर्चना आचार्य जैसे विभूतियों ने भाग लिया था। उस सम्मेलन में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई थी। यह वह समय जब कांग्रेस के विकल्प के रूप में समाजवादी भारत में उभरे थे।

1952 में हुए आजाद भारत के पहले लोकतांत्रिक चुनाव, जिसमें रांची से मीनू मिसानी ने अपनी दावेदारी प्रस्तुत की थी, की भी स्मृतियां अभी तक देवला बाबू के जेहन में जीवंत हैं। इन्होंने बताया कि रांची की धरती पर रामवृक्ष बेनीपुरी, बचावन सिंह, रामनंदन मिश्र, मधु लिमये, राजनारायण, जॉर्ज फर्नांडिस, रामधारी सिंह दिनकर जैसी हस्तियों के साथ उनका सानिध्य रहा है, उनका कहना था कि प्रख्यात समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया आठ बार रांची आए हैं। साथ ही इन्होंने जयपाल सिंह मुंडा, फादर कामिल बुल्के, राजा कामाख्या नारायण सिंह, नागरमल मोदी, गंगा प्रसाद बुधिया, सत्यनारायण शर्मा जी के साथ के अपने अनुभव भी साझा किये।

इन्होंने रांची नागरिक समिति, लोहिया स्कूल, जानकी देवी आयुर्वेद कॉलेज और राजस्थान छात्रावास जैसे संगठनों को खड़ा करने और उन्हें चलाने में अपनी मुख्य भूमिका निभाई है, साथ ही साथ इन्होंने कपड़ा, छाता, लाह, इत्यादि का व्यवसाय भी किया है। जब रांची की राजनीति मुख्य रूप से सत्ता (कांग्रेस) और उभरते हुए जनसंघ के बीच बंटी थी, तब एक प्रतिष्ठित व्यापारिक परिवार (नारसरिया परिवार) से निकलकर समाजवादी विचारधारा को चुनना और डॉ. लोहिया का अनुयायी बनना यह साबित करता है कि उनके लिए राजनीति ‘सत्ता’ का माध्यम नहीं, बल्कि ‘सिद्धांत’ की अभिव्यक्ति थी।

गैर-कांग्रेसी राजनीति और समाजवादी संघर्ष- उस दौर में गैर-कांग्रेसवाद (Non-Congressism) का नारा डॉ. लोहिया ने ही दिया था। देवकी बाबू ने व्यापारिक सुगमता के लिए सत्ता का हाथ पकड़ने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। मारवाड़ी समाज उस समय स्थिरता और व्यापारिक हितों को देखते हुए कांग्रेस के करीब था। देवकी बाबू का SSP (संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी) से जुड़ना एक प्रकार का ‘बौद्धिक विद्रोह’ था। सिद्धांत बनाम संख्या बल: उनका चुनाव हारना दरअसल उनकी वैचारिक जीत थी, क्योंकि उन्होंने समाज के दबाव में अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया।

चुनाव का ऐतिहासिक संदर्भ (The 1967/1972 Period) – रिकॉर्ड्स संकेत देते हैं कि देवकी बाबू ने जिस दौर में चुनाव लड़ा, वह रांची में समाजवादी आंदोलन (Socialist Movement) का स्वर्ण युग था। उन्होंने संभवतः संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP) के टिकट पर या उसके समर्थन से चुनाव लड़ा था। उस दौर में रांची में चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से ‘कांग्रेस’ और ‘जनसंघ’ के बीच होता था, लेकिन देवकी बाबू ने ‘लोहियावादी’ तीसरे विकल्प के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।

वे रांची के ‘नगर विकास समिति’ जैसी पुरानी नागरिक संस्थाओं में भी पर्दे के पीछे से सक्रिय रहे, जहाँ वे शहर के बुनियादी ढांचे और पार्कों के रखरखाव के लिए आवाज उठाते थे। मारवाड़ी समाज ऐतिहासिक रूप से व्यापारिक हितों और स्थिर राजनीति (अक्सर कांग्रेस या बाद में जनसंघ/भाजपा) की ओर झुका रहा। देवकी बाबू की ‘समाजवादी विचारधारा’ उनके अपने समाज के पारंपरिक ढाँचे से टकराती थी, यही कारण रहा होगा कि उन्हें अपनों का वह चुनावी समर्थन नहीं मिला जो एक ‘व्यापारी नेता’ को मिलता।

“बेहिचक बोलना” उनके लोहियावादी संस्कारों की ही देन है, जहाँ सच कहना किसी भी लाभ-हानि से बड़ा माना जाता है। ​रांची के सामाजिक ताने-बाने में ‘नैतिक पहरेदार’ वे दिग्गजों के “यस-मैन” नहीं थे, और कई मामलों में उनकी बेबाकी उस समय के अच्छे-अच्छे दिग्गजों को खलती थी

उस समय के रांची के प्रभावशाली व्यक्तित्वों के बीच देवकी बाबू की भूमिका एक ‘विवेक’ (Conscience) की तरह थी। दोस्ती अपनी जगह थी, लेकिन गलत नीतियों पर टोकने की उनकी निडरता ने उन्हें समाज में एक विशिष्ट सम्मान दिलाया। ​अपर बाजार से लालपुर तक भौगोलिक रूप से भी उनका जीवन रांची के विकास का गवाह रहा है। आज जहाँ ‘देवकीनंदन अपार्टमेंट’ है, वह न केवल एक पता है, बल्कि उनके आदर्शों की विरासत का प्रतीक भी है।

एक सफल व्यावसायिक पृष्ठभूमि (नारसरिया परिवार) होने के बावजूद सादा जीवन जीना यह दर्शाता है कि उन्होंने लोहियावादी दर्शन को केवल पढ़ा नहीं, बल्कि जिया है। व्यापार में मन न लगना और वैचारिक विमर्श में रमे रहना उन्हें एक ‘ट्रेडर’ के बजाय एक ‘थिंकर’ (चिंतक) के रूप में स्थापित करता है।

अग्रवाल सभा द्वारा उनको अग्रसेन सम्मान से भी सम्मानित किया गया है जो उनके समाज के प्रति उनकी दीर्घकालिक सेवाओं की स्वीकृति है। स्वर्गीय हनुमान प्रसाद सरावगी जी, लोहरदगा के राधाकृष्ण और स्वर्गीय वासुदेव बुधिया जी जैसे लोगों का सानिध्य उन्हें प्राप्त था।

देवकी बाबू जैसे व्यक्तित्व रांची के उस ‘पुराने दौर’ के आखिरी स्तंभों में से एक हैं, जहाँ सार्वजनिक जीवन में सत्यनिष्ठा और स्पष्टवादिता का मोल किसी भी चुनावी जीत या व्यापारिक लाभ से कहीं अधिक था। उनके भतीजे विश्वनाथ नारसरिया और पुत्र प्रेम नारसरिया के पास निश्चित रूप से गौरवान्वित होने के लिए एक महान नैतिक विरासत है।

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