जिन भाजपाइयों ने रांची के जयपाल सिंह स्टेडियम की दुर्दशा कर दी, वे उनके गांव को क्या आदर्श बनायेंगे?

सत्ता क्या बदली, भाजपाइयों को मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा याद आने लगे। भाजपाइयों को सांसद होने का एहसास होने लगा। मरांग गोमके के गांव की याद सताने लगी। मतलब ये राजनीतिक हार, ऐसी सबक सिखा देती है कि लोगों को अपने महापुरुष, उनके गांव, महापुरुषों के चरित्र व संस्कार तक याद आने लगते हैं, यही नहीं ये अपने घर पर कार्यक्रम भी आयोजित करने लगते हैं तथा अपने चाहनेवालों और उनके बयान पर समय-समय पर ताली पीटनेवालों को भी निमंत्रण देते हैं, ताकि उनके कार्यक्रम में चार-चांद लग जाये।

ऐसे भी दुनिया की दस्तुर है, कि जब आप कुछ नहीं होते, तो आपको कोई नहीं पुछता और जब आप हो जाते हैं, तो आपके आगे दुनिया परिक्रमा करने लगती है, कुछ ऐसा ही हाल आजकल भाजपा नेता अर्जुन मुंडा का हैं, कुछ महीने पहले वे कुछ भी नहीं थे, तब उनके रांची स्थित आवास पर कोई भीड़ नहीं दिखती थी, पर जैसे ही, वे जैसे-तैसे खूंटी से भाजपा सांसद, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आशीर्वाद से केन्द्रीय मंत्री बने, रांची स्थित उनके आवास पर महफिल सजने लगी, पत्रकारों की संख्या भी बढ़ने लगी, साथ ही भाजपा की सत्ता महागठबंधन के हाथों में आते ही तथा अपने चिरपरिचित प्रतिद्वंदी पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास की करारी हार ने उन्हें भाजपा में खासकर झारखण्ड में शीर्ष पर लाकर खड़ा कर दिया।

आजकल उन्होंने फिर स्वयं को झारखण्ड में शीर्ष पर बरकरार रखने के लिए उन सारे तिकड़मों का सहारा लेना शुरु कर दिया है, जो आम तौर पर हर चालाक राजनीतिज्ञ करता है, जरा देखिये न, आज उन्होंने अपने आवास पर संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें उन्होंने कहा कि मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के टकरा गांव को वे आदर्श गांव बनायेंगे, ताकि इसकी पहचान राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय क्षितिज तक पहुंच सकें।

अब सवाल उठता है कि जिन भाजपाइयों ने राजधानी रांची में जयपाल सिंह के नाम पर बने इकलौते जयपाल सिंह स्टेडियम का नक्शा बदल दिया। उसे इतना छोटा कर दिया कि वह अब स्टेडियम कहलाने लायक नहीं, उसकी सूरत बिगाड़ दी, कूड़े-कचड़े के ढेर में परिवर्तित कर दिया, वहां लगी उनकी प्रतिमा को देखनेवाला कोई नहीं, आज भी उनकी प्रतिमा खंडित अवस्था में हैं, और अर्जुन मुंडा जो एक किलोमीटर की कम दूरी पर रांची में रहकर भी इसकी सूध नहीं ले सकें, वो जयपाल सिंह के गांव टकरा को कैसे आदर्श ग्राम बनायेंगे?  

अरे अर्जुन मुंडा जी, आप तो कई बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे, जब मुख्यमंत्री पद पर रहते आपको टकरा गांव याद नहीं आया, ये आज अचानक टकरा गांव कैसे याद आ गया? कही ऐसा तो नहीं कि आपको हेमन्त सोरेन के सत्ता में आने के बाद, आपको यह भय सताने लगा कि कही झारखण्ड में सबसे बड़े आदिवासी नेता होने का पद हेमन्त सोरेन के कब्जे में सदा के लिए न चली जाये। इस राज्य में ज्यादा शासन भाजपा के लोगों ने ही किया और मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा को किस हालात में लाकर खड़ा कर दिया, उसका प्रमाण है डीसी कार्यालय के समक्ष स्थित जयपाल सिंह स्टेडियम और उनकी प्रतिमा की दुर्दशा और इसके लिए कोई जिम्मेवार हैं तो वह हैं यहां के भाजपा नेता और यहां की भाजपा सरकार, जिसमें आप भी शामिल है।

आप उस वक्त कहां थे? जब झारखण्ड सिविल सोसाइटी जयपाल सिंह स्टेडियम को बचाने के लिए आंदोलनरत थी, आप क्यों नहीं जयपाल सिंह के नाम पर बनी इस स्टेडियम को बचाने के लिए आगे आये? और अब आज के दिन, जो कि उनका जन्मदिन है, उस पर राजनीति शुरु कर दी, कम से कम उपरवाले से तो डरिये, पर आप डरेंगे कैसे?  

भाजपाई तो बहुत ही बहादुर होते हैं, ऐसे भी पांच साल के मोदी शासनकाल में कितने सांसदों ने स्वयं के द्वारा गोद लिये गांवों को कितना आदर्श बनाया है, वो तो झारखण्ड के उन गांवों की दुर्दशा ही बता देती हैं, जिनका सांसदों ने गोद लेने का दावा किया। परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का के गांव जारी का क्या हाल है? वो किसी से छुपा भी नहीं है, जबकि इस गांव की कायाकल्प का जिम्मा तो सरकार ने ही उठाया था, चलिए ख्वाब दिखाते रहिये, ख्वाब में ही जब सब कुछ हो जाना हैं तो काम करने की क्या जरुरत?

One thought on “जिन भाजपाइयों ने रांची के जयपाल सिंह स्टेडियम की दुर्दशा कर दी, वे उनके गांव को क्या आदर्श बनायेंगे?

  • January 4, 2020 at 7:50 pm
    Permalink

    arjunji phir bhi kabhi kabhi sudh lete rahe hain………..raghuvar ki sarkar ne banttadhar kiya tha ye sabhi jante hain,bolte nahi……..arjun ji bhi dukhee thhe………cm rahate huwe raghuvar ka harna,ye uske liye aur sath hee party ke liye dikhh dayee hai…..phir se upar lane kee zimmewaree ab arjun ji ko milani chahiye……..karyakarta pyar chahata hai wo kisi ka bandhuwa mazdoor nahi hota,pichhali sarkar aur sangtthan ne karyakartawon ko apna gulam jaisa samjha tha…….kisi sangtthan ke padadhikari ya vidhayak/mantree ko janta se kabhi bhi pyaar se bolte nahi dekha ya suna.natiza samne.

Comments are closed.