स्वर्णिम काल का ढिंढोरा पीटनेवालों, अपने रघुवर को कहो कि वह बिहार के CM नीतीश से कुछ सीखे

आजकल झारखण्ड भाजपा में एक से एक रघुवर भक्त हो गये हैं, उन्हें झारखण्ड की जनता के दुख से कोई मतलब नहीं हैं, वे तो अपने प्रभु राज्य के सीएम रघुवर की भक्ति में ही स्वयं को अनुप्राणित महसूस कर रहे हैं, इसके लिए कोई रघुवर के शासनकाल को स्वर्णिम काल कह दे रहा हैं, तो किसी को रघुवर में अद्भुत शासक नजर आने लगा है, जबकि सच्चाई यह भी है कि इस राज्य में जो लोग रह रहे हैं, उन्हें पता है कि इस सीएम रघुवर ने राज्य की क्या दुर्दशा कर दी है।

कमाल है, एक ओर झारखण्ड का मुख्यमंत्री हाथी उड़ाने में व्यस्त है,तो दूसरी ओर इसका पड़ोसी बिहार का मुख्यमंत्री अपने राज्य में रह रहे उन लाखों मां-पिता की चिन्ता कर रहा है, जिनके बेटे-बेटियां, बहूँए अपने माता-पिता की सेवा करने में कोताही बरत रहे हैं, जरा देखिये कल के अपने कैबिनेट के फैसले में कितना सुंदर फैसला लिया है, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने और इस राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास को देखिये कि वह कैसे-कैसे फैसले लेता है?

आज बिहार ही नहीं, बल्कि झारखण्ड के भी प्रमुख समाचार-पत्रों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा लिये गये एक कैबिनेट फैसले की खुब चर्चा है। समाचार है कि बिहार सरकार ने बुजुर्ग माता-पिता की सामाजिक सुरक्षा के लिए अहम फैसला लिया है, अब अगर कोई बेटा, मां-पिता को प्रताड़ित करता है, तो पीड़ित माता-पिता इसकी शिकायत अपने जिलाधिकारी से कर सकते हैं, दोष सिद्ध होने पर बेटे को सजा दी जा सकती है। यह निर्णय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कल की बैठक में ले लिया। अब इसका फायदा यह हुआ कि प्रताड़ना झेल रहे माता-पिता को शिकायत के लिए फैमिली कोर्ट जाने की कोई जरुरत ही नहीं।

अब कोई बिहार के उन माता-पिता से पूछे जो अपने बेटे-बेटियों के द्वारा प्रताड़ना के शिकार है, कि यह फैसला कैसा लगा, तो वे निःसंदेह कहेंगे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ऐसा निर्णय लेकर उनकी बची-खुची जिंदगी में बहार ला दी, सचमुच उनके लिए ये नीतीश कुमार द्वारा दिया गया एक अनुपम उपहार है। ऐसे ही फैसलों से राज्य में खुशियां आती है, न कि हाथी उड़ाने से, अपना चेहरा चमकाने से, बड़े-बड़े होर्डिंग व बैनर लगाने से, अपने बेटे के लिए विशेष व्यवस्था करने से।

मैं बचपन से देखता आया हूं कि समाज में कुछ को छोड़कर ज्यादातर नालायक बेटे-बेटियों ने अपने माता-पिता की जिंदगी तबाह कर दी, जब उनके माता-पिता कुछ देनेलायक थे, तब तो उनकी खूब सेवा की, पर जैसे ही उनके हालात खराब हुए, उन्होंने दुध में पड़ी मक्खी की तरह अपने दिल से ही नहीं, बल्कि उनके अपने ही बनाये घरों से भी निकाल दिया। शायद यहीं कारण है कि मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी “पंच-परमेश्वर” में मुंशी प्रेमचंद ने जुम्मन शेख, जूम्मन शेख की पत्नी और उसकी खालाजान के बीच चल रहे  विवाद को बहुत ही सुंदर ढंग से उकेरा है।

सचमुच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ऐसा कर, उन बिहार के लाखों माता-पिता की जिंदगी में बहार ला दी हैं, सचमुच उनके दिलों से निकली दुआएं उनके जीवन को और महकायेंगी, क्योंकि मैंने अपनी आंखों से ऐसे कई मां-बाप को तिल-तिल मरते देखा हैं, अब कम से कम ऐसे नालायक बेटे-बेटियों को प्रशासन का भय तो होगा, जिसके कारण वे अपने मां-बाप के साथ क्रूरता करने से बाज आयेंगे।