अपराध

CM रघुवर बताएं, कि जांच में दोषी पाये गये पूर्व DGP के खिलाफ वे क्या कानूनी कार्रवाई करने जा रहे हैं?

जब जांच में यह खुलासा हो ही गया कि रांची के कांके अंचल के चामा मौजा का खाता 87 गैर-मजरुआ है। जब रांची के उपायुक्त ने म्यूटेशन रद्द करने तथा वहां मकान बनानेवालों को नोटिस जारी करने का आदेश दे ही दिया। जब जांच में यह पता चल ही गया कि पूर्व डीजीपी की पत्नी समेत 17 बड़े लोगों ने सरकारी जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली है, तो राज्य सरकार बताएं कि इतना बड़ा गुनाह करनेवाले व्यक्ति को सिर्फ ऐसे ही छोड़ दिया जायेगा, या उनके लिए भी कानूनी प्रावधान है, भारतीय दंड संहिता के अनुसार उनपर भी कार्रवाई होगी, या ऐसे ही नोटिस देकर, उनके म्यूटेशन रद्द कर, वहां निर्माणाधीन ढांचा गिरवाकर मामले को रफा-दफा कर दिया जायेगा।

क्योंकि आज के अखबारों में इस संबंध में छपे समाचारों के बाद भी राज्य में बहुसंख्यक ऐसे लोग है, जो यह मानने को तैयार नहीं है कि राज्य सरकार या उनके अधिकारी, जांच में पाये गये दोषियों के खिलाफ नोटिस जारी करेंगे, या इनका म्यूटेशन रद्द होगा या वहां निर्माणाधीन ढांचा ध्वस्त होगा, लोगों को मानना है जैसे-जैसे समय बीतेगा, यह बहुचर्चित कांड भी समय के आगोश में दम तोड़ देगा और जो लोग इनके खिलाफ कार्रवाई की बात कर रहे हैं, वे भी सदा के लिए चुप्पी साध लेंगे, क्योंकि झारखण्ड में तो अब तक यहीं होता आया है, जो जितना बड़ा अधिकारी, उसका उतना बड़ा गोरखधंधा।

आजकल तो यह भी पैटर्न यहां चल रहा हैं कि जो भाजपा से जुड़े हैं, या जो भाजपा के हितैषी है, वे कितना भी गलत करें, उन्हें बचाया जाय और जो भाजपा के विरोधी है, भाजपा को आइना दिखानेवाले लोग हैं, उन्हें उलटा लटका दिया जाय, चाहे उनके गुनाह कुछ भी हो, झाविमो के प्रदीप यादव और भाजपा के ढुलू महतो पर यौन शोषण का मामला इसके ज्वलंत उदाहरण है।

कल ही आम आदमी पार्टी के एक नेता लक्ष्मी नारायण मुंडा ने आरोप लगाया कि भाजपा में ही बहुत सारे ऐसे नेता है, जो आदिवासियों की जमीनों को अपने नाम करवा लिया है, पर सर्वाधिक गाज गिराने की कोशिश हेमन्त सोरेन पर हैं, इन आप के नेताओं का साफ कहना था कि अगर दोषी हेमन्त सोरेन हैं तो उसी प्रकार का दोषी तो भाजपा के कुछ नेता भी हैं, पर उन्हें इस गुनाह की सजा क्यों नहीं मिल रही, मतलब मामला यहां पार्टी देखकर बनता या बनाया जाता है।

दैनिक भास्कर अखबार के अनुसार सरकार द्वारा बनाई गई प्रतिबंधित सूची में कांके अंचल से संबंधित उक्त खाता व प्लाट की जमीन भी शामिल है, इसके बावजूद तत्कालीन सब रजिस्ट्रार राहुल चौबे ने रजिस्ट्री की, तत्कालीन सीओ प्रभात भूषण ने गलत तरीके से म्यूटेशन करके जमाबंदी की। जांच कमेटी ने रजिस्ट्रार से लेकर सीओ व सत्यापन करनेवाले कर्मचारी व सीआई की भूमिका भी संदिग्ध बताई है। आखिर बिना इन महानुभावों की संलिप्तता के तो ये गैर-कानूनी काम हुए नही होंगे, तो इन पर कार्रवाई कब होगी?

दैनिक भास्कर ने लिखा है पूर्व डीजीपी डी के पांडेय अवैध तरीके से दो मंजिले मकान का भी निर्माण करवा चुके है, मकान का काम अंतिम चरण में है। लेकिन मकान का नक्शा अभी तक पास नहीं कराया गया है, और चूंकि यह नक्शा आरआरडीए द्वारा पास होना है, और आरआरडीए ने अभी तक इस इलाके में किसी का नक्शा पास नहीं किया है, अब सवाल उठता है कि एक सामान्य व्यक्ति जब बिना नक्शा के मकान बना रहा होता है तो सरकार उसे अवैध ठहरा देती है, तथा उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी करती है, पूर्व डीजीपी के खिलाफ कब कानूनी कार्रवाई करेगी?

आखिर, डी के पांडेय ने अपनी पत्नी पूनम पांडेय के नाम पर जो 50.94  डिसिमिल सरकारी जमीन खरीदी, और जब जांच में पता भी चल गया, तो अब तो कानूनी कार्रवाई भी होनी चाहिए न, कि उन्हें उदारता के साथ इससे बरी कर दिया जायेगा, कि वे चूंकि राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक रह चुके हैं, इसलिए उन्हें ये सब करने की छूट है।

पूर्व डीजीपी की पत्नी के नाम पर सरकारी जमीन की रजिस्ट्री, उसका म्यूटेशन हो जाना, रघुवर सरकार के शासनकाल में व्याप्त भ्रष्टाचार की पोल खोलकर रख दी है, पर रघुवर सरकार को इससे क्या मतलब, वो तो आज भी डबल इंजन की सरकार का ढिंढोरा पीटकर, भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को बचाने का ही काम कर रही हैं, जो किसी न किसी प्रकार से भाजपा के लिए काम कर रहे हैं, इधर दैनिक भास्कर और प्रभात खबर ने दावा किया है कि इस समाचार को सबसे पहले उन्होंने प्रकाशित किया।

सवाल समाचार प्रकाशित करने से नहीं, सवाल तो यह है कि इस समाचार के आने के बाद, जांचोपरांत के बाद भी जो दोषी पाये गये, उन सारे दोषियों को, उनके किये की सजा कानून के तहत मिलेगी, या सिर्फ सरकारी जमीन उनसे हासिल किया जायेगा, और उनके निर्माणाधीन भवनों को गिरा दिया जायेगा, हालांकि एक बार फिर वहीं यहां बात आती है, राज्य की बहुसंख्यक जनता को आज भी विश्वास नहीं है कि इनसे उक्त जमीन को सरकार हासिल करेगी और उनके द्वारा वहां निर्मित भवनों को ध्वस्त किया जायेगा, इन पर कानूनी कार्रवाई तो बहुत दूर की बात हैं, क्योंकि यहां ज्यादातर प्रशासनिक अधिकारी व सत्ता में लिप्त नेता यहीं तो कर रहे हैं।