तेजस्वी को अभी से ही झाड़ पर चढ़ाने को उतारु हो गयी मीडिया…

बस मौका मिलना चाहिए और शुरु हो गये। हमारे देश में मीडिया का यहीं हाल है – बस थोड़ा बोलनेवाला कोई नेता क्या मिल गया? बस उसमें नायक देखने लगे। नायक भी ऐसा-वैसा नहीं। सीधे चन्द्रगुप्त, और लीजिये चन्द्रगुप्त बनानेवाला चाणक्य भी उन्हें जल्द दीखने लगता है। फिलहाल मीडिया को चन्द्रगुप्त के तौर पर कई घोटालों के आरोपी लालू प्रसाद यादव का होनहार पुत्र तेजस्वी यादव दिखाई पड़ा है, यहीं नहीं मीडिया ने चाणक्य भी ढूंढ निकाला है,

बस मौका मिलना चाहिए और शुरु हो गये। हमारे देश में मीडिया का यहीं हाल है – बस थोड़ा बोलनेवाला कोई नेता क्या मिल गया? बस उसमें नायक देखने लगे। नायक भी ऐसा-वैसा नहीं। सीधे चन्द्रगुप्त, और लीजिये चन्द्रगुप्त बनानेवाला चाणक्य भी उन्हें जल्द दीखने लगता है। फिलहाल मीडिया को चन्द्रगुप्त के तौर पर कई घोटालों के आरोपी लालू प्रसाद यादव का होनहार पुत्र तेजस्वी यादव दिखाई पड़ा है, यहीं नहीं मीडिया ने चाणक्य भी ढूंढ निकाला है, इस बार चाणक्य बने है – जगतानन्द सिंह।

मीडिया ने अपना चरित्र खोया, शुरु की तेजस्वी वंदना

अभी कोई ज्यादा दिन की बात नहीं है, कुछ ही दिन पहले की ही बात है, कैबिनेट की बैठक से निकलने के वक्त मीडियाकर्मियों की तेजस्वी के सुरक्षाकर्मियों से झड़प हो गई थी, जिसमें तेजस्वी के रुप में उन्हें खलनायक दिखाई पड़ गया था। मीडियाकर्मियों का दल पुलिस महानिदेशक से मिला था और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की थी। यहीं नहीं जिस मीडियाकर्मी की तेजस्वी के सुरक्षाकर्मियों ने ठुकाई की थी या जिस संस्थान से ठुकानेवाला मीडियाकर्मी जुड़ा था, किसी ने प्राथमिकी तक दर्ज नहीं कराई। उलटे इस संस्थान में कार्य करनेवाले वरीय अधिकारियों का कहना था कि अगर उनके यहां का आदमी ठुका ही गया तो क्या हुआ, ये तो चलता ही रहता है। यहीं नहीं अगर आपको याद होगा तो मीडियाकर्मियों ने 27 अगस्त की राजद की रैली को कवर करने से भी मना कर दिया था, अब जरा इन्हीं मीडियाकर्मियों से पूछिये कि क्या उन्हें ये बातें याद है, तो पता चलेगा कि याद तो है पर उनके चेहरे पर गजब की मुस्कुराहट दिखाई पडेगी, जो बताती है कि उनकी हैसियत या औकात क्या है? अब जरा सोचिये, जो मीडिया तेजस्वी को चन्द्रगुप्त बनाने पर तुला है, क्या चन्द्रगुप्त ऐसे ही था क्या? क्या चन्द्रगुप्त पर ऐसे ही घटियास्तर के आरोप लगे थे?

चन्द्रगुप्त बनने से ज्यादा अच्छा है कि वे तेजस्वी बने

पहले यह जानिये कि जिस तेजस्वी को चन्द्रगुप्त की श्रेणी में लाने के लिए मीडिया ने कुचक्र रचा है, उस पर आरोप क्या है? तेजस्वी पर बेनामी संपत्ति और रेलवे टेंडर घोटाले में शामिल होने का आरोप है। गत 16 मई को आयकर विभाग ने लालू प्रसाद यादव और उनसे जुड़े लोगों के 22 ठिकानों पर छापेमारी की थी, उसमें तेजस्वी के नाम पर हुई संपत्तियों के लेन-देन की भी जांच हुई। स्थिति यह है कि लालू प्रसाद की पूरी फैमिली पर 1000 करोड़ तक की बेनामी संपत्ति है, जिस मामले में तेजस्वी भी घिरे है। अब मीडिया बताये कि क्या चंद्रगुप्त के परिवार पर भी इसी प्रकार की बेनामी संपत्ति अर्जित करने का आरोप था?  इसलिये चाटुकारिता उतनी ही, जितनी पचे, किसी को झाड़ पर उतना ही चढ़ाये, जितना झाड़ उसको बर्दाश्त करें। पहले तेजस्वी इन आरोपों से मुक्त होने का प्रयास करें। ईमानदारी दिखाये, चरित्र पर ध्यान दें। वे जान लें कि उनका सामना नीतीश कुमार जैसे व्यक्ति से है, हो सकता है कि आगे चलकर कुछ और लोग उनके सामने हो, जिनसे टक्कर लेने में उनके पसीने छूट जाये, इसलिए मैं तो यहीं कहुंगा कि तेजस्वी मीडिया के ऐसे लोगों से बचे, जो उन्हें झाड़ पर चढ़ाने की कोशिश शुरु कर दी है, वे इन सबसे बचते हुए, स्वयं को परिमार्जित करते हुए, कुशल राजनीतिज्ञ बनने की कोशिश करें, अच्छा रहेगा कि वे चन्द्रगुप्त न बनकर, तेजस्वी बने और इस नाम को साकार करें, ऐसे भी तेजस्वी होने में क्या गलत है?

Krishna Bihari Mishra

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