सुप्रियो को सुनील तिवारी ने भेजा मैसेज, लिखा मानहानि का मुकदमा करने के लिए उनके बयान पर्याप्त व यथेष्ट, झामुमो द्वारा लगाये सारे आरोप बेबुनियाद व मनगढ़ंत

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी के राजनीतिक सलाहकार सुनील तिवारी द्वारा झामुमो के केन्द्रीय महासचिव व प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य को भेजे गये व्हाटसएप मैसेज की झारखण्ड की राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा है। इस मैसेज में सुनील तिवारी ने अपना पक्ष रखा है। साथ ही इस पक्ष के माध्यम से एक तरह से सुप्रियो को धमकी भी दी हैं साथ ही पुचकारा भी है।

सुनील तिवारी ने साफ लिखा है कि सुप्रियो ने जो भी प्रेस कांफ्रेस कर उनके उपर आरोप लगाये हैं। उन आरोपों के आधार पर मानहानि का केस तो एक बनता ही है, पर वे ऐसा नहीं करेंगे। सुनील तिवारी ने इस मैसेज को व्हाट्सएप के माध्यम से भेजने के बाद इसे टिव्ट भी किया है। आखिर उस मैसेज में क्या है, आइये देखते हैं …

सुप्रियो दा। आज तक आपने मेरे खिलाफ अनेक प्रेस कांफ्रेस किए, जिस पर मैंने अपनी शालीनता को बनाये रखा। परंतु ऐसा लगता है कि जैसे आपने मेरी खामोशी को मेरी कमजोरी समझ ली। अतः आपके सभी सवालों के जवाब इस पत्र के माध्यम से दे रहा हूं। इसकी कॉपी आपके निजी व्हाट्सएप पर भी मैने भेज दिया है। सादर धन्यवाद।

आदरणीय सुप्रियो दादा जी,

सप्रेम जोहार!

पिछले कुछ दिनों से एक के बाद एक आपका हमसे एवं हमारे परिवार से संबंधित आरोपों की बौछार वाला धुआँधार प्रेस कॉन्फ्रेंस समाचारों की सुर्खियों में देखने को मिला। आधी-अधूरी एक तरफा जानकारी के आधार पर आप जितना कह चुकें हैं, वह आप पर मानहानि का मुकदमा करने के लिये पर्याप्त एवं यथेष्ट है। लेकिन मैं वो काम नहीं करूँगा जो गुजरे काल में राजनैतिक विरोधियों से निपटने के लिये आपलोगों ने सत्ता के पावर को टूल किट की तरह इस्तेमाल कर किया है।

मुझे पता है कि बबूल का पेड़ लगाने से कांटा ही मिलेगा, उसमें आम का फल कभी नहीं आयेगा। पता कर लीजिये, जिन अधिकारियों का इस्तेमाल गलत कार्यों, केस-मुकदमे के लिये किया गया वे आज उन मामलों के संभावित सीबीआई जांच एवं अन्य एजेंसियों के जांच से कितना परेशान हैं। कुछ की तो रातों की नींद उड़ी हुई है। अपने अपने जुगाड़ तंत्र से सम्पर्क साध कर बचने के लिये और सरकार पोषित गलतियों को अंजाम देने के लिये माफी माँगते फिरते कितने पापड़ बेलने पड़ रहे हैं उन्हें? ये सब जरूर पता कर लीजिये अपने तंत्र से।

जीवन में साठ साल की उम्र तक कभी भी 107 का मामला झेलने का भी मौका नहीं आया। लेकिन आप महानुभावों की असीम कृपा एवं आशीर्वाद से मुझे डराने, चुप कराने एवं मुंबई कांड में मेरे द्वारा मुंबई हाईकोर्ट में दायर हस्तक्षेप याचिका से हटाने के लिये पहले मुझे धमकी मिली। फिर अगस्त 2021 में मुझ पर ताबड़तोड़ दो-दो मुकदमे करवाये गये, जेल भेजा गया, जान मरवाने तक की साजिश रची गई।

गनीमत है कि मुझे अतितायियों के विनाशकारी योजनाओं की पहले से ही सूचना मिल रही थी। सो मैंने जून 2021 में ही मुंबई कांड के बदला स्वरूप मुझ पर मुकदमा कराने का षड्यंत्र रच रहे होने की जानकारी मैंने पत्र लिखकर मुख्य सचिव समेत अन्य अफसरों को भी दे दिया था और ठीक तीन महीने बाद वैसा ही सबकुछ मेरे साथ हुआ।

ईश्वर की कृपा मिली। माननीय उच्च न्यायालय ने मुझे न सिर्फ जमानत दे दी बल्कि मेरे मामले में पुलिस की कार्यशैली पर प्रतिकूल गंभीर टिप्पणी की। छः महीने मुझे तड़ीपार रहना पड़ा। बदले की आग में जल रहे अत्याचारियों के कलेजे को इतने से भी संतोष नहीं हुआ। मुझे जेल में ही सड़ाने के लिये इतनी “तत्परता और जरूरत” थी कि मेरा जमानत रद्द कराने के लिये भारी-भरकम वकीलों की टीम रखकर झारखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट गयी।

भगवान की कृपा और न्यायालय की पैनी नजर के सामने यह सरकारी प्रयास भी विफल हो गया। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने माननीय हाईकोर्ट द्वारा दिये गये जमानत को सही मानकर पहली तारीख में झारखंड सरकार के जमानत रद्द करने के अनुरोध वाले एसएलपी को सिरे से खारिज कर दिया। मेरे पर दर्ज मामलों की सीबीआई जांच की याचिकाओं की माननीय हाईकोर्ट रांची में सुनवाई हो रही है।

अगर हाईकोर्ट से अनुमति मिली तो जांच देर-सबेर जरूर होगी। तब मैं सप्रमाण बताउँगा कि किन-किन महानुभावों ने किस-किस तरीके से कब-कब मुझे मुंबई केश से हटाने के लिये किस हद तक जाकर प्रलोभन देने एवं दबाव में लेने का अथक प्रयास किया था। लेकिन ईश्वरीय शक्ति के बल पर मैं तमाम कष्ट एवं संकट झेलकर भी चट्टान की तरह अडिग बना रह गया और आज भी हूँ।

मेरे पर मुकदमा हुआ, जेल गया तो आपके उत्साही सहयोगियों को अपने साजिश पूर्ण होने पर इतना पक्का भरोसा था कि उन्होंने ने तो सोशल मीडिया पर डंके की चोट पर यहां तक लिख दिया कि “मैं तो अब जेल में ही मर जाऊँगा, शायद निकलूँगा ही नहीं।” आपके लोगों ने ऐसा लिखा मानो आपके लोग कोर्ट का  “डेथ वारंट जजमेंट” ही सुना रहे हों। लेकिन मरना-जीना तो ईश्वर के हाथ है। सो, मरा नहीं और आपसबों के बीच जिंदा हूँ, पहले भी अपना काम कर रहा था, आज भी कर रहा हूँ और जिंदा रहा तो आगे भी करता रहूँगा।

आप पर मुकदमा इसलिये भी नहीं करूँगा कि मेरी नजर में आप उस तानाशाह जमात के एक सज्जन, गंभीर एवं निर्विवादित (एकाध मामलों को छोड़कर) व्यक्ति रहे हैं। मुझे पता है कि इसके पीछे वो कौन शातिर दिमाग के लोग हैं जो आपका इस्तेमाल एक भोंपू के रूप में करते हैं। लेकिन आपका यह दायित्व है कि कुछ भी बोलने से पहले अपनी जानकारी को जांच-परख लें।

अगर हमारे बारे में आप बिना सिर पैर की आधारहीन बात भी करेंगे तो चलेगा। वह मुझे कतई बुरा नहीं लगेगा। क्योंकि राजनीति में ये सब चलता है आजकल। लेकिन जब कभी मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघ कर मेरे परिवार-बच्चों के बारे में कुछ कहें, आरोप लगायें तो पहले उसे जांचे-परखे। क्योकि बात जुबान से और तीर कमान से निकल कर वापस नहीं आती।

आप उस जमात के समझदार और विनम्र व्यक्ति माने जाते हैं। आप दूसरों की तरह धोखेबाजों, छलियों, अज्ञानियों के साजिश का पार्ट नहीं बने जिन्होंने अपना-अपना हिडेन एजेंडा सेट करने, लाभ लेने एवं खुद का खुनन्स निकालने के चक्कर में अपनी वैमनस्यता उपरवालों के माथे थोप कर ऐसा उलझा-फँसा दिया है कि कईयों को दिन में ही तारे दिखायी दे रहे हैं।

आप तो अगस्त 2021 से प्रेस कान्फ्रेंस कर मेरे नाम की माला कई बार जप चुके हैं फिर भी आपको मेरे बारे में पता लगाने में बड़ी मुश्किल होती रही और दो साल तीन महीने लग गये मेरे बारे में पता लगाने में। इतनी मेहनत की क्या जरूरत थी? जिस यूनिवर्सिटी में आप पढ़ा रहे हैं कभी मैं भी उसका ऑनरेरी विजिटिंग प्रिंसिपल/संकटमोचक हुआ करता।

यकीन न हो तो आदरणीय वाइस चांसलर साहब से ही ज्ञात-अज्ञात सारी चीजों के बारे में पूछ लीजियेगा। कई चश्मदीद तो अभी भी आपके सीनियर विधायक हैं। उनसे पूछियेगा तो मेरे बारे में आपको सब बता देंगे। उसके बाद शायद जीवन में आपको यह कहने की जरूरत न पड़े कि ’’आखिर सुनील तिवारी हैं कौन”?

सार्वजनिक जीवन में ढेर सारी छुई-अनछुई बातें पर्दे में रखने की परम्परा है, सो इसका पालन करने का प्रयास करता हूँ। वैसी अनछुई बातें इतिहासकारों के लिये छोड़ रखा हूँ जिसे वे लोग ही लिखें और आने वाली पीढ़ी उसे पढ़े, जाने समझे। लेकिन जब लोग जरूरत से ज्यादा मुँह में अंगुली डालेंगे तो कितना चुप रहूँगा? पत्रकार रहा हूँ, लिखना-पढ़ना दिन चर्या है। सो, किताब के रूप में आपसबों से वैसी जानकारी भी साझा करने का प्रयास करूँगा जो आजतक अनकही-अनछपी हैं।

प्रेस में चटकारे लेकर छपवाने के लिये ये भी कहा जा सकता है कि “ जोहार साथियों, जब इस सरकार में जेपीएससी का गठन हुआ तो कुछ नाम ऐसे दिखे जिनके बारे में पता ही नहीं चल रहा था। बड़ी मेहनत से पता किया कि तो पता चला कि उनका झारखंड में योगदान इतना भर है कि वो फलां महानुभाव का परिवार हैं। उनको जो सरकारी वेतन-भत्ता मिलता है वो किसी दल के नेता के पास जाता है कि नहीं, उस पैसे का भोजन वो नेता जी करते हैं या नहीं, श्वेत पत्र जारी कर बताया जाय….  आदि…….आदि…..” मीडिया उसे प्रमुखता से छापेगी भी।

लेकिन ये काम कितना नैतिक होगा? मेरी नजर में तो यह उचित नहीं होगा। वैसे इसका फैसला करने का अधिकार हम आपके विवेक पर भी छोड़ते हैं। मैं तो ये काम कभी नहीं करूँगा। इसलिये नहीं करूँगा कि मेरा जमीर न तो मुझे ऐसा करने देगा और न ही मैं जिनके लिये काम करता हूँ वो मुझे ऐसा करने के लिये भोंपू बनने की इजाजत देंगे।

योगेन्द्र तिवारी कौन है? क्या है? किसके माध्यम किसको कितने पैसे दिये। अगर इसमें कुछ मुझसे या मेरे परिवार से संबंधित कोई वक्तव्य देना हो तो जरूर दीजिये। एक नहीं सौ बार दीजिये। लेकिन एक बार हमसे सीधे ही पूछ लीजिये तो वादा है हम तथ्यपरक सही जानकारी आपको जरूर देंगे ताकि आपका कोई तथ्यहीन एक पक्षीय गलत बयान हंसी-मजाक का विषय नहीं बने।

मैं दूसरों की तरह न तो मुँह छिपाऊँगा न ही इस बात से इंकार करूँगा कि योगेन्द्र तिवारी को तो हम जानते ही नहीं। डंके की चोट पर कहता हूँ कि योगेन्द्र ही नहीं बल्कि उनके पिताजी से पैंतीस सालों से सुख-दुख का पारिवारिक संबंध था, है और कल भी रहेगा। वो अगर गलत किया है और उसके गलती में मैं सहभागी हूं तो मुझे भी कानूनन सजा मिले। मैं उनलोगों जैसा नहीं हूँ जो सुविधा, सहयोग और लालच के लिये ’’यूज एंड थ्रो’’ की नीति पर कपड़े की तरह आदमी बदलते रहते हैं। कहिये तो नाम गिनाऊँ? कान बंद कर लेना होगा वो सब नाम सुनकर।

मेरे परिवार के जिस बैंक ट्रांजेक्शन की एकतरफा जानकारी की ओर आप इशारा कर रहे हैं वह किसी जमीन के छोटे प्लाट की खरीद के लिये एक जमीन मालिक को …..2017 में एडवांस के रूप में ड्राफ्ट के जरिये दी गई थी। फिर वह पूरी जमीन जिन्होंने सीधे मालिक से ले ली उन्होंने …..2021 को वही सेम एमाउंट चेक से मेरे परिवार के खाते में वापस किये। याद रहे, मेरे परिवार के खाते में, मेरे खाते में नहीं।

अगर आपकी नजर में यह रकम मेरे मार्फत राजनैतिक लेन देन का है तो यह आपकी बुद्धि की बलिहारी है और इस पर मुझे कोई सफाई नहीं देनी है। मेरे परिवार के ऐसे खरीद-बिक्री में अकाउंट से लेनदेन कोई दूसरे मामले भी हो सकते हैं। मेरा परिवार तीस सालों से इनकमटैक्स पेयी हैं। वह काम कर सकती है। ठीक वैसे ही जैसे किसी राजनीति से जुड़े व्यक्ति का परिवार गैर राजनैतिक संवैधानिक पद पर बतौर मेंबर मनोनीत होकर काम कर सकता है और कर रहा है।

आपने बड़े गर्व से बताया था कि ’’ जोहार साथियों, फलाँ कंपनी 2005 में बनी जिसमें फलां- फलां डायरेक्टर हैं। ये देखिये प्रमाण हैं या नहीं।” लेकिन आप शायद हड़बड़ी में ये बताना भूल गये कि आपने जिन-जिन को डायरेक्टर बताया वे लोग तो 2009 में ही उस कंपनी से इस्तीफा देकर पूरी तरह अलग हो चुके थे। हो सकता है किसी धूर्त ने आपको गलत अधूरी जानकारी देकर आपको यूज कर लिया हो। लेकिन आपका फर्ज बनता था कि आप पूरी जानकारी जुटाते। तब मीडिया में सबकुछ अच्छा से बताते। इस इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के युग में कोई जानकारी जुटाना मुश्किल थोड़े न है। मिनटों में होता है ये

सब। आपके उस झूठे जानकारी वाले प्रेस कॉन्फ्रेंस की मीडिया और सोशल मीडिया में कितनी थू-थू हुई? निकलवाकर देख लीजिये। पता चल जायेगा। बेईमानों की झूठी जानकारी पर काहे पूरे जीवन की विश्वसनीयता की खुद की कमाई मिट्टी में मिला रहे हैं आप? मैं तो कहूँगा कि ऐसे मामले में अगर सीधे हम पर मुकदमा कर कार्रवाई कराने का स्कोप आपसबों को नहीं मिल रहा है तो योगेन्द्र तिवारी पर शराब सिंडिकेट बनाकर सरकार की आँख में धूल झोंककर गलत तरीके शराब कारोबार पर कब्जा करने का मुकदमा करवाईये। फिर एसआईटी बनाइये और 2005 से ही जांच करवाईये।

अगर मैं या मेरे परिवार के द्वारा कोई भी गलती होगी, घपले-घोटाले में संलिप्तता होगी तो उसकी जांच के रास्ते आपको हमारी गर्दन तक पंहुचने का मौका बैठे बिठाये मिल जायेगा। कारवाई करिये। फिर डंके के चोट पर हमें बेनकाब कीजिये। इस भय के भूत से मत डरिये कि केस होगा तो प्रेडिकेट आफेंस बन जाने का भय बना रहेगा। फिर कोई बड़ी एजेंसी जांच में कूद जायेगी तो क्या होगा….. लेने के देने तो नहीं पड़ जायेंगे….ब्ला….ब्ला….?

अरे भाई डर किस बात का? जो गलत किया होगा , वही न किसी जांच में फँसेगा। इसकी चिंता में अभी से दूबले होने की क्या जरूरत?  सुप्रीयो भाई, सरकार आपकी, पुलिस आपका। तो देर किस बात की? फटाफट यह काम करवाईये। दूध का दूध पानी का पानी साफ साफ दिख जायेगा। सिर्फ हीट एंड रन और गलथेथरयी के बल पर और आप अपनी कितनी बेइज्जती कराईयेगा? गलत-सलत सतही जानकारी मीडिया में पुश कर?

उम्मीद है मेरी बातों को अन्यथा नहीं लेंगे और गंभीरता से विचार करेंगे। आगे लोकसभा, राज्य सभा, विधानसभा चुनाव है। लगे रहिये। मेहनत करते रहिये। क्या पता किस्मत खुले और लॉटरी लग जाये आपकी? लेकिन किसी के बहकावे और दबाव में झूठ पर झूठ बोलकर अपनी सभ्य पहचान को पलीता मत लगाइये। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ।