सुबोधकांत सहाय और बाबूलाल मरांडी ने जनसंगठनों के प्रस्ताव को दिया समर्थन

रांची के पुरुलिया रोड स्थित लोयला इंस्टीट्यूट में झारखण्ड बचाओ समन्वय समिति के बैनर तले आदिवासी-मूलवासी सामाजिक संगठन की तृतीय बैठक संपन्न हो गई, जिसमें भाजपा को छोड़कर, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलो के प्रमुख नेताओं ने भाग लिया। इस अवसर पर कई प्रबुद्ध नेताओं ने अपनी बातें रखी, तथा राज्य की वर्तमान सरकार को कई मुद्दों पर घेरा, साथ ही राज्य से इसे उखाड़ फेकने का संकल्प भी लिया,

रांची के पुरुलिया रोड स्थित लोयला इंस्टीट्यूट में झारखण्ड बचाओ समन्वय समिति के बैनर तले आदिवासी-मूलवासी सामाजिक संगठन की तृतीय बैठक संपन्न हो गई, जिसमें भाजपा को छोड़कर, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलो के प्रमुख नेताओं ने भाग लिया। इस अवसर पर कई प्रबुद्ध नेताओं ने अपनी बातें रखी, तथा राज्य की वर्तमान सरकार को कई मुद्दों पर घेरा, साथ ही राज्य से इसे उखाड़ फेकने का संकल्प भी लिया, इस कार्यक्रम में शामिल कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता सुबोध कांत सहाय और झाविमो नेता बाबू लाल मरांडी ने जनसंगठनों के इस तृतीय बैठक में पारित सभी प्रस्तावों पर अपनी सहमति दी।

वक्ताओं का कहना था कि कई दशकों के आंदोलन और कुर्बानियों के बाद झारखंड अलग राज्य का चिरप्रतीक्षित सपना पूरा हुआ, लेकिन झारखंड राज्य के विकास का जो स्वरूप झारखंड के आंदोलनकारियों ने तैयार किया था, उसे दरकिनार कर बीते 18 वर्षों में जन विकास की अवहेलना करते हुए कारपोरेट विकास की अवधारणा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गयी। झारखंड की गरीब जनता बड़ी बेसब्री से इंतजार करती रही और राज्य में बनती-बिगड़ती सरकारों को देखती रही। राज्य में बनने वाली नीतियों में अपने अपने अधिकारों को तलाशने की कोशिश करती रही। 

जनता को ऐसा लगा जैसे अब अच्छे दिन आने वाले हैं, लेकिन जिनके लिये झारखंड बना उनपर आज गोलियां चलायी जा रही है। पिछले 18 वर्षों के कार्यकाल में झारखंड के आदिवासी मूलवासियों के अरमानों का गला घोंटा गया, उन्हें अपमानित किया गया, संवैधानिक अधिकारों की बात करने वाले लोगों पर देशद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें जेल में बंद किया गया। पत्थलगड़ी कार्यक्रम के तहत आदिवासियों द्वारा अपने संवैधानिक अधिकारों को आम जनता तक पहुचाने की पारंपरिक व्यवस्था को भी गैर कानूनी घोषित करने की कोशिश करते हुए आदिवासियों को देशद्रोही कहा गया।

उनके संवैधानिक अधिकारों की धज्जियां उड़ायी गयी। युवाओं को रोजगार देने की बात करने वाली सरकार ने युवाओं के साथ छल किया। सरकारी नियुक्तियों में बाहरी लोगों की बहाली का मार्ग प्रशस्त किया गया। झारखंड लोक सेवा आयोग के माध्यम से होने वाली नियुक्ति प्रक्रियाओं को बाधित कर बाहरी लोगों को प्रशासनिक अधिकारी बनाये जाने का रास्ता बनाया गया।

अब यह बात खुलकर सामने आ गयी कि झारखंड राज्य विकास के अपने बुनियादी लक्ष्य से भटक गया है और राज्य के विकास के नाम पर आदिवासी-मूलवासियों को धोखे में रखकर कोरपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाया जा रहा है। उपनिवेशवादी शोषण,  अत्याचार, पुलिस-जुल्म,  राजनीतिक एवं आर्थिक भ्रष्टाचार, अफसरशाही चरम पर हैं। राज्य में शोषण की वही इतिहास दुहरायी जा रही है, जिसके कारण अलग राज्य के गठन के लिए संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार हुई थी। 

झारखंड अलग राज्य की बुनियाद हजारों सालों के गौरवशाली आदिवासी संघर्ष के इतिहास की नींव पर डाली गयी है। भारत के संविधान में दिये गये अधिकार उसी स्वर्णिम इतिहास का कानूनी दस्तावेज है, इसी लिये सर्वप्रथम झारखंड अलग राज्य के गठन का सवाल हमारी सामाजिक सांस्कृतिक पहचान की रक्षा सवाल है। झारखंड राज्य की परिकल्पना जल, जंगल,जमीन और कृषि की रक्षा और उसपर आधारित दो-तिहाई आबादी के आर्थिक विकास की कल्पना है।

हमारी विचारधारा समानता, धार्मिक सद्भाव और समरसता पर आधारित है। हमारा दर्शन मनुष्य, प्रकृति और अन्य जीव-जंतुओं के समन्वय पर आधारित है। इस दृष्टिकोण से विस्थापन और पलायन से जुड़ी उपनिवेशवादी पूंजी विकास की कल्पना झारखंड के विकास की परिकल्पना नहीं हो सकती। झारखंड का इतिहास इन्हीं सवालों से जुड़ा संघर्ष का इतिहास है। विकास के नाम पर सिर्फ सरकारी खजाने को खर्च कर देना और विकास के झूठे आंकड़े पेश कर राज्य के विकास का दावा नहीं किया जा सकता।

बड़े-बड़े आकर्षक विज्ञापनों और जुमलेबाजी से राज्य नही चलता। आदिवासियों और गैर-आदिवासीयों के बीच,  इसाई और सरना के बीच, हिंदू और मुस्लिम के बीच जातीय और धार्मिक तकरार पैदा कर झारखंड को अशांत करने का प्रयास,  झारखंड के आदिवासी-मूलवासियों की ताकत को कमजोर करने की साजिश है। ताकि यहां के लोगों की जमीनों पर बाहरी लोगों का राजनीतिक एवं प्रशासनिक नियंत्रण कायम हो सके।  

इस बैठक में शामिल जनसंगठनों के वक्ताओं ने खुलकर कहा कि झारखंड के आदिवासी-मूलवासियों के गौरवशाली अतीत, वर्तमान और भविष्य पर यह एक गंभीर चिंतन है। विकास की अवधारणा पर एक बहस है। एक मंथन है अपने अस्तित्व की रक्षा का। सामाजिक सांस्कृतिक एवं भाषाई पहचान की सुरक्षा का। आहवान है अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिये संघर्ष का और उद्घोष है जनता की आशाओं आकांक्षाओं के दमन के खिलाफ जनांदोलन का। हमारा प्रस्ताव है –

  1. भाजपा एवं भ्रष्टाचार मुक्त झारखंड का निर्माण हो।
  2. सी0 एन0टी0 एवं एस0पी0टी एक्ट की भूल भावना से छेड़छाड़ बंद हो।
  3. झारखंड का मुख्यमंत्री झारखंडी मूल का व्यक्ति हो।
  4. आदिवासी-मूलवासियों की सामाजिक सांस्कृतिक पहचान की रक्षा एवं आर्थिक विकास के लिये किये गये संवैधानिक प्रावधानों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।
  5. आदिवासीयों की भूमि रक्षा के लिये किये गये कानूनों का अनुपालन सख्ती से किया जाय।
  6. आदिवासियों की लूटी गयी जमीन की वापसी के लिये सरकार द्वारा गठित एस0आई0टी की रिपोर्ट सार्वजनिक हो एवं जमीन वापसी की कारवाई को समय सीमा के अंतर्गत पूरी की जाय।
  7. सरकार द्वारा बनाई गयी स्थानीय नीति को रदद किया जाय एवं खतियान तथा 1951 की जनगणना के आधार पर नई डोमिसाईल नीति बनाई जाय तथा झारखंड की स्थानीय नीति को ठेकेदारी, माइनिंग लीज, नियुक्तियों में स्थानीय नीति लागू किया जाय।
  8. झारखंड में विस्थापन आयोग का गठन किया जाय।
  9. भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची के प्रावधानों का सख्ती से पालन किया जाय। आदिवासी परामर्शदातृ समिति को सशक्त बनाया जाय, उसके संरचना को दुरूस्त किया जाय तथा उसके संचालन के लिये एक सचिवालय की व्यवस्था की जाय, जिसकी अनुमति के बिना सरकार किसी प्रकार का मनमाना निर्णय न ले।
  10. आदिवासियों के पारंपरिक धर्म कोड को जनगणना कॉलम में शामिल किया जाय।
  11. राज्य सरकार द्वारा जारी भूमि अधिग्रहण कानून संशोधन आदेश रदद किया जाय।
  12. शिक्षण एवं गैर शिक्षण संस्थानों के मुख्य पदों पर स्थानीय आदिवासी एवं मूलवासियों को नियुक्त किया जाय।
  13. पेसा कानून का एवं समता जजमेंट का अक्षरशः अनुपालन सुनिश्चित किया जाय।
  14. राज्य सरकार राज्य में हुए संविदा के आधार पर सभी प्रकार की नियुक्तियों को रदद करे तथा विधि सम्मत आरक्षण का अनुपालन सुनिश्चित करे।
  15. राज्य में महिला नीति की घोषणा की जाय।
  16. झारखंड के स्थानीय संसाधनों पर आधारित उद्योगों की स्थापना की जाय।
  17. झारखंड में आदिवासी होड़ापैथी को आयुष में शामिल किया जाय।
  18. झारखंड में हो बेस्ड माईक्रो इंडस्ट्री की स्थापना हो।
  19. झारखंड की आदिवासी एवं क्षेत्रीय भाषाओं के अध्ययन अध्यापन तथा शोध की व्यवस्था के0 जी0 से पी0 जी0 तक की जाय।
  20. झारखंड में फिल्म नीति के तहत आदिवासी एवं स्थानीय फिल्मों तथा उससे जुड़े फिल्म मेकर को प्राथमिकता दी जाय तथा 01 फरवरी से होने वाले फिल्म फेस्टिवल में आदिवासी विषयों एवं स्थानीय विषयों पर बनी फिल्मों को प्राथमिकता दी जाय।
  21. राज्य में कृषि विकास की नीति बनाई जाय।
  22. राज्य से होने वाले सभी प्रकार के विस्थापन एवं पलायन पर रोक लगायी जाय तथा उनके रोजगार की समुचित व्यवस्था झारखंड में की जाय।
  23. युवाओं के विकास के लिये उनके रोजगार की व्यवस्था झारखंड में की जाय।
  24. झारखंड सरकार आदिवासी-मूलवासी विरोधी सभी प्रकार के कानून को निरस्त करे।

पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री श्री सुबोध कांत सहाय ने झारखंड बचाओ समन्वय समिति के तत्वाधान में आयोजित आदिवासी-मूलवासी सामाजिक संगठनों की तृतीय बैठक में कहा कि विगत 18 वर्षों के दौरान झारखंड के टिकाउ ससटेनेबल विकास का रोड मैप नही बन पाया जो सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। अपने मुख्यमंत्रित्व काल में बाबूलाल मरांडी ने जब आदिवासी मूलवासियों के हित में नीतियां बनाकर लागू करना चाहा तो कई शक्तियों ने मिल कर उनकी सरकार को ही अस्थिर कर दिया।

सुबोध कांत सहाय ने कहा मौजूदा राज्य सरकार के कार्यकाल के दौरान झारखंडियों के मूल अधिकरों पर हमला हो चुका है। समस्याएं बंद से बदतर होती जा रही हैं। वर्तमान में झारखंड के विपक्षी दलों को एकसूत्र में बांधा नही गया तो हालात नही बदलने वाले हैं। आदिवासियों और मूलवासियों के लिये रोजगार की नीतियां नही बनी। उन्होंने कहा कि आदिवासी दर्शन ही झारखंड को लूटने से बचायगा। जन संगठनों के  प्रस्तावों को राजनीतिक दल मानने को तैयार हैं। भविष्य का रोडमैप सामाजिक संगठनों को तैयार करना चाहिये। इस बाबत राजनीतिक दलों से जन मुद्दों पर बचनबद्धता करानी होगी।

राज्य के प्रथम मुख्य मंत्री बाबू लाल मरांडी ने अपने संबोधन में कहा कि झारखंड की सबसे बड़ी त्रासदी विस्थापन है। आजादी के बाद से विस्थापन की सबसे ज्यादा कीमत झारखंड के आदिवासियों ने चुकाई है। लाखों लोग विस्थापन के कारण दूसरे राज्यों में रोजगार की तलाश में जा चुके हैं। यही कारण है कि झारखंड के मूल स्वरूप में जनसंख्या का जो अनुपातिक स्वरूप होना चाहिये, उसमें आदिवासियों की संख्या दिनों-दिन घट रही हैं। राज्य की सरकार को हर नागरिक की शिक्षा स्वास्थ्य एवं  नियोजन की गारंटी लेनी चाहिये। जो योजनाएँ झारखंड के हित में नही है उन्हें रद्द करना चाहिये। जनसंगठनों के तमाम मुददों पर झाविमो पूर्णतः सहमत हैं।

कार्यक्रम में अध्यक्षीय भाषण देते हुये डा0 कर्मा उरांव ने सभी जनसंगठनों की ओर से प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए कहा कि झारखण्ड में न केवल बिहार बल्कि दुनिया भर की शक्तियां यहां की प्राकृतिक संसाधनों को लूटने के लिए आमदा है, जिसकी पहल मौजूदा सरकार के मुख्यमंत्री द्वारा की जा रही है। बाहरी लोगों को यहां के कारोबार, नियोजन आदि पर काबिज होने के लिये मार्ग प्रशस्त किया जा रहा है। गलत स्थानीय नीति एवं औद्योगिक नीति से यहां के आदिवासी मूलवासियों को उजाड़ने की साजिश की जा रही है। डा0 कर्मा उरांव ने जोर देकर कहा कि जब तक भाजपा एवं भ्रष्टाचार मुक्त झारखंड नही बनेगा तब तक यहां के लोगों का कल्याण नहीं होगा।

कार्यक्रम में झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रतिनिधि के तौर पर अंतु तिर्की, झारखंड पार्टी की ओर से सोमा मुंडा, राष्टीय जनता दल की ओर से पार्टी के प्रवक्ता डा0 मनोज कुमार तथा पूर्व मंत्री गीताश्री उरांव, थियोडोर किड़ो, नियल तिर्की, पूर्व विधायक बहादुर उरांव, मंगल सिंह बोबोंगा,  राजू महतो, नरेश मुर्मू, दयामनी बारला, मुस्ताक आलम, एस अली, रतन तिर्की, ललित मुर्मू, सुशील उरांव, डेमका सोय, कुमारचंद मार्डी, प्रेमशाही मुंडा, सैम टुडु, संध्या कुंटिया, रायमुनी मुंडा, लुथर टोपनो, वासवी किडो ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन प्रेमचंद मुर्मू ने, जन मुद्दों पर आधारित दस्तावेज का उल्लेख प्रभाकर तिर्की ने तथा धन्यवाद ज्ञापन दुर्गावती ओडेया ने किया। 

Krishna Bihari Mishra

One thought on “सुबोधकांत सहाय और बाबूलाल मरांडी ने जनसंगठनों के प्रस्ताव को दिया समर्थन

  1. इस जानकारी-से-भरे रिपोर्ट के लिए धन्यवाद॰ बस, ये 24-सूत्री अजेंडा व जानकारी ‘जन-जन’ / ‘आम आदमी’ तक पहुँच जाये… लोग इन्हें जाने…. समझे…. सही निर्णय लें…. और साझेदारी करे – काम मुश्किल अवश्य है पर कठिन नहीं क्योंकि इन आयोजनों में सिर्फ जन-प्रतिनिधि, बुद्धिजीवी और जन-संगठन शरीक होते हैं॰ लोगों और जन-संगठनों का निःस्वार्थ योगदान चाहिए !

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