रघुवर सरकार की कार्यशैली पर भड़के सुबोध, राज्य सरकार पर लगाये गंभीर आरोप

पूर्व केन्द्रीय गृह मंत्री एवं कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता सुबोधकांत सहाय ने आज रांची में संवाददाताओं से बातचीत के क्रम में बताया कि भूमि अधिग्रहण बिल 2013 में झारखण्ड सरकार द्वारा लाये गये संशोधन बिल 2017 को गृह मंत्रालय ने पुनर्विचार के लिए लौटा दिया है। भारत सरकार के कृषि मंत्रालय की अनुशंसा के मद्देनजर गृह मंत्रालय ने यह कदम उठाया है।

पूर्व केन्द्रीय गृह मंत्री एवं कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता सुबोधकांत सहाय ने आज रांची में संवाददाताओं से बातचीत के क्रम में बताया कि भूमि अधिग्रहण बिल 2013 में झारखण्ड सरकार द्वारा लाये गये संशोधन बिल 2017 को गृह मंत्रालय ने पुनर्विचार के लिए लौटा दिया है। भारत सरकार के कृषि मंत्रालय की अनुशंसा के मद्देनजर गृह मंत्रालय ने यह कदम उठाया है। ज्ञातव्य है कि कारपोरेट घराने को फायदा पहुंचाने के लिए लाये गये सीएनटी/एसपीटी एक्ट में जबरन किये गये, संशोधन को व्यापक जनदबाव की वजह से राज्यपाल महोदया द्वारा हस्ताक्षर करने से इनकार करने और वापस कर दिये जाने के कारण सरकार को बैकफुट पर जाना पड़ा था।

उन्होंने कहा कि इसकी भरपाई और पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए ही रघुवर सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून संशोधन अधिनियम 2017 को विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद विधानसभा में आनन फानन में पास करा लिया था। 2013 में तत्कालीन यूपीए सरकार के द्वारा बनाये गये कानून की मूल आत्मा को ही परिवर्तित कर दिया गया था, इस संशोधन बिल में, सोशल इम्पैक्ट, ग्रामसभा की सहमति जैसे विषयों को नजरंदाज कर, आदिवासियों, मूलवासियों के हितों एवं भारत सरकार की नीतियों के विपरीत यह बिल लाया गया है।

सुबोधकांत के अनुसार, बार-बार किये जा रहे ऐसे प्रयासों से यह स्पष्ट हो गया है कि मुख्यमंत्री भू-माफियाओं एवं पूंजीपतियों से मिलकर आदिवासियों और मूलवासियों की जमीन को लूटवाना चाहते हैं। इसकी जांच होनी चाहिए। कांग्रेस पार्टी ने इन मुद्दों को लेकर क्षेत्रवार लंबी लड़ाई लड़ी है, सिर्फ आदिवासियों मूलवासियों को बेहतर मुआवजा एवं रोजगार मिले, इसके लिए कई वर्षों से लड़ाई जारी है। अकेले बड़कागांव में तीन गोलीकांड हुए।  लंबे संघर्ष का ही नतीजा है, कि मुआवजा राशि में सरकार को इजाफा करना पड़ा।

उन्होंने कहा कि गोला गोलीकांड भी ऐसी ही लड़ाई की हिस्सा थी। सरकार की बदनीयती देखिये, भैरव जलाशय योजना में 90 रुपये की दर से मुआवजा का प्रावधान रैयतों के लिए किया गया। मुआवजा, विस्थापितों का पुनर्वास और स्थानीय लोगों को रोजगार सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। गोड्डा जिले में अडानी को फायदा पहुंचाने के लिए यहीं कहानी दुहराई गई। रैयतों के आंदोलन को दबाया गया। जनप्रतिनिधियों को टारगेट कर उन्हें झूठे मुकदमें में फंसाया गया।

उन्होने कहा कि खनिजों की उपलब्धता की वजह से हर जिलें में भूमि अधिग्रहण होना है। ठोस खनिज नीति, विस्थापन एवं पुनर्वास नीति के अभाव में पहले ही लोग पलायन को मजबूर है। जिस राज्य में कृषि कार्य को बढावा देना चाहिए, जहां हार्टिकल्चर स्टेट के रुप में किसानों को प्रोत्साहित करने की योजना बनानी चाहिए, वहां ऐसी योजनाओं का अभाव है। जिसके कारण लोग पलायन को मजबूर है। कांग्रेस नेता पूर्व मंत्री 2005 से ही इस लड़ाई को लड़ रहे है तब जाकर सरकार रैयतों को 2 लाख से 18-20 लाख रुपये मुआवजा देने दिलवाने पर सहमत हुई है। सरकार जब डीसी कार्यालय में ग्राम सभा का आयोजन करवाने लगे ग्रामीणों को डरा धमका कर सहमति पत्र पर हस्ताक्षर ले तो आप हालात का अंदाजा लगा सकते है।

संघर्ष में योगेन्द्र साव को अपने कान का पर्दा गंवाना पड़ा हैं. बड़कागांव में तकरीबन 1600 एकड़ भूमि अधिग्रहण होना है। तीन-तीन बार गोलीकांड को अंजाम दिया जाता है। तीनों बार ये योगेन्द्र साव की गैरहाजिरी में हुए, बावजूद इसके प्रशासन के द्वारा केस में इनके नाम को शामिल दिखाया जाता है, जो निन्दनीय है। वहीं विधायक निर्मला देवी को सत्याग्रह कार्यक्रम से जबरन गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, दोनों के उपर लगे सारे आरोप निराधार झूठे और विद्वेष की राजनीति से किये गये है। यह प्रमाणित हो चुका है।

सरकार ने बेल रिजेक्ट करवाने के लिए हर हथकंडे का सहारा लिया, यहां तक कि पहली बार ऐसे केस में अटार्नी जनरल को पैरवी के लिए बहस करवाई। सुप्रीम कोर्ट से बेल मिलने पर राज्य में प्रवेश पर रोक लगवाकर भोपाल में रहने का आदेश होने पर रिहाई के पहले ही योगेन्द्र साव पर सीसीए लगवाने की अनुशंसा करवा देना, ये व्यक्तिगत विद्वेष नहीं तो और क्या है?

यह सब कुछ सिर्फ और सिर्फ राज्य सभा चुनाव में पांच करोड़ के प्रस्ताव ठुकराने एवं स्टिंग अंजाम देकर सरकार के भ्रष्ट चेहरे को बेनकाब करवाने का बदला मात्र है। चुनाव आयोग की अनुशंसा के बाद भी संलिप्त अधिकारियों पर आज तक कार्रवाई क्यों नही हुई? सीएनटी/एसपीटी एवं जमीन की लड़ाई में सरकार का बैकफुट पर जाना, हमारे संघर्ष का ही परिणाम है।  गैर-मजरुआ जमीनों की बंदोबस्ती रद्द कर वर्षों से रह रहे लोग, जो जोत-कोड़ के माध्यम से भरण-पोषण कर रहे है, उनको नोटिस भेजना सरकार के अन्याय की पराकाष्ठा है। भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के प्रावधानों से छेड़छाड़ पार्टी बर्दाश्त नहीं करेगी, जल्द ही इस बेहद संवेदनशील मुद्दे को लेकर बड़े संघर्ष की रुपरेखा घोषित की जायेगी।

Krishna Bihari Mishra

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