तनाव यानी मन की ऐसी अवस्था जो चिन्ताओं को जन्म देती हैं, हमारे संपूर्ण जीवन को प्रभावित कर देती हैं, इससे बचें – स्वामी सदानन्द

तनाव दरअसल मन की ऐसी अवस्था है, जो चिन्ताओं को जन्म देती हैं। इन चिन्ताओं पर जब हम विजय नहीं पाते, तब हम तनाव के शिकार हो जाते हैं और ऐसा तभी होता है, जब हम माया के प्रभाव में होते हैं। यह तनाव तीन प्रकार का होता है – मनोवैज्ञानिक, भौतिकीय और भावनात्मक। उक्त बातें स्वामी सदानन्द ने योगदा सत्संग मठ के ध्यान केन्द्र में आयोजित योगदा साप्ताहिक सत्संग के दौरान कहीं।

उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ लोगों के लिए अपने कामों को गति देने के लिए समय का नहीं होना भी एक प्रकार का तनाव का कारण बन जाता है, जब वे अपने कामों को समय पर पूरा नहीं कर पाते तो वे तनाव के शिकार हो जाते हैं। चूंकि आज का विषय ही तनाव था, इसलिए उनका पूरा साप्ताहिक सत्संग तनाव की इर्द-गिर्द घुमता रहा, जो सत्संग में भाग ले रहे लोगों के लिए उत्सुकता से भरा था।

स्वामी सदानन्द ने कहा कि जितने लोग उतने प्रकार का तनाव और यह तनाव डर के कारण होता है। किसी को परीक्षा का डर, किसी को नौकरी जाने का डर, किसी को नौकरी नहीं मिलने के बाद घर कैसे चलेगा उसका डर, किसी को मौत का डर, मतलब ये डर हर लोगों के लिए अलग-अलग हैं, जो लोगों को तनाव में ले आता है, यह सभी जानते भी हैं, जिसको जानते हुए भी लोग विभिन्न बिमारियों के शिकार हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि अपने गुरुदेव परमहंस योगानन्द जी कहते हैं कि आप किसी से नहीं डरें, क्योंकि आप अनन्त ब्रह्माण्ड के एक सदस्य हैं, प्रतिरुप है, आप ईश्वर की संतान है, तनाव के गुलाम नहीं बनें, सदियों के गुलामी के विचारों को त्याग दें, हमेशा याद रखें कि हम ईश्वर के संतान है और हमें कोई पराजित नहीं कर सकता।

उन्हें कहा कि आप एक आत्मा है, जो ईश्वर का ही एक प्रतिरुप है। अगर किसी बात को लेकर मनोदशा खराब हो जाये, तो आप लोगों से दूर रहें, न किसी बात को लेकर दुसरे का खीझ, आप अन्य पर उतार दें। मनोदशा खराब होने पर गुरु की शरण में जायें, अपना कष्ट उन्हें बतायें। उन्होंने यह भी कहा कि कभी-कभी इच्छाओं की पूर्ति नहीं होने पर भी तनाव उत्पन्न हो जाता है, पर आप ये क्यों भूल जाते हैं कि ईश्वर आपकी इच्छा की पूर्ति के लिए आपको बार-बार मौका देते हैं, पर सारी इच्छाओं की पूर्ति के बावजूद भी तनाव से व्यक्ति नहीं निकल सकता, यह भी जान लीजिये, इसलिए अच्छा रहेगा कि आप अपनी इच्छाओं पर विजय पायें।

स्वामी सदानन्द के अनुसार तनाव को रोकने के लिए हमें इन्द्रियों पर भी ध्यान देना आवश्यक है, क्योंकि कुछ मामलों में हमारी इन्द्रियां भी तनाव का कारण होती है, इसलिए इन्द्रियों के सुख से बाहर निकलें। उन्होंने लोगों से अहं का त्याग करने को भी कहा। उन्होंने कहा कि अहं का टकराव भी तनाव को जन्म देता है। तनावग्रस्त जीव को अपनायेंगे तो जीवन बिमारियों का घर बनेगा, समझने की कोशिश कीजिये, ये तनाव हमारे-आपके जीवन के लिए धीमा जहर है। तनाव के प्रति सचेष्ट रहे, तनाव को अपनी जिंदगी से उखाड़ फेंके।

उन्होंने कहा कि हमेशा याद रखें, ईश्वर ने आपको अपना पुत्र बनाया है, भिखमंगा नहीं। इसलिए आपका अपना निर्णय ही आपको तनाव में लाकर रख दिया है, आप खुद चिन्तन करें कि आपने ऐसा क्यो किया? हं-सः व ओम् तकनीक को अपनाएं, आप स्वयं देखेंगे कि आप तनाव से मुक्त होते चले गये। फिर भी तनाव सताएं तो नींद का सहारा लें, इसके बाद आप जब उठेंगे तो आप स्वयं को थोड़ा तनाव मुक्त पायेंगे, बेहतर स्थिति में पायेंगे। उन्होंने सभी से कहा कि अच्छा रहेगा कि तनाव पर विजय पाने के लिए स्वयं को हंसमुख बनाइये।

उन्होंने कहा कि दरअसल जब आप चिन्ता कर रहे होते हैं, तनाव में आ रहे होते हैं, तो आप अपनी अंत्येष्टि कर रहे होते हैं, आप क्यों नही समझते कि आपका जीवन बहुमुल्य हैं, यह ईश्वर को प्राप्त करने के लिए हैं, इसे बेकार के तनाव में गवां देना मूर्खता के सिवा कुछ नहीं, इसलिए आप अपने जीवन को तनावमुक्त-चिन्तामुक्त बनाइये और परमहंस योगानन्द जी के बताये मार्ग पर चलते चलिये।

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