राजनीति

तो क्या झाविमो सुप्रीमो बाबू लाल मरांडी महागठबंधन को तोड़ने का महापाप करने को तैयार है?

राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं, क्योंकि आज की राजनीति न तो सत्य पर आधारित है और न ही जनसेवा पर आधारित है, आज की राजनीति पूर्णतः ले-दे की संस्कृति पर आधारित है, कहीं कोई त्याग नहीं, कही कोई जनहित की बात नहीं पूर्णतः स्वार्थ पर आधारित। अगर झारखण्ड की वर्तमान राजनीति पर सरसरी निगाहें डालें तो साफ है कि झारखण्ड की जनता वर्तमान भ्रष्ट एवं कनफूकवां सरकार से आजिज हो चुकी हैं और एक नया विकल्प चाहती हैं, वह चाहती है कि हाथी उड़ानेवाली वर्तमान सरकार को साइड थमाया जाय, पर यह तभी होगा, जब उसके सामने एक मजबूत विपक्ष खड़ा होगा।

ऐसे तो भाजपा की राजनीति विपक्ष के अस्तित्व को पूरी तरह से समाप्त करने से प्रारम्भ होती हैं और उसी पर समाप्त होती है। याद करिये झारखण्ड की रघुवर सरकार को जैसे ही पता चला कि उसे 2014 में पूर्ण बहुमत नहीं मिला, उसे आजसू की वैशाखी पर चलना होगा, उसने अपने आपको मजबूत करने के लिए उस समय की बाबू लाल मरांडी की पार्टी झारखण्ड विकास मोर्चा के दलबदलू विधायकों पर डोरे डालने शुरु किये, उसे सफलता भी मिली, झाविमो के कुछ दलबदलू विधायकों ने चुपके से भाजपा का दामन थाम लिया।

जिनमें कुछ दलबदलू विधायकों को मंत्री पद मिले और कुछ को उनके वायदों के अनुसार वह चीज मिल गई, जिसकी उन्हें चाहत थी और लीजिये राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने यह कहना शुरु कर दिया कि राज्य में पहली बार बहुमत की सरकार आई हैं, जबकि यह बहुमत की सरकार न होकर आला दर्जे के दलबदलूओं के टेक पर टिकी सरकार थी, जो पांच साल चली भी और इसके लिए अगर श्रेय किसी को जायेगा, तो वह केन्द्र में भाजपा की मजबूत सरकार का, नहीं तो केन्द्र में अगर भाजपा की मजबूत सरकार नहीं होती, तो यहां भी उसका प्रभाव पड़ता, रघुवर दास कब के मुख्यमंत्री पद से विदा हो चुके होते, यह शत प्रतिशत सत्य है।

जनता की बात करें, तो जनता का साफ कहना है कि बाबू लाल मरांडी की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वे अपने विधायकों को साथ नहीं रख पाते, अंत-अंत तक जो विधायक उनके पास बचे भी थे, वे भी भाजपा में जाकर पवित्र स्नान कर ही लिये और भाजपा के नेताओं से अपने किये गलती की माफी मांगी कि उन्हें भी पूर्व के दलबदलू विधायकों की तरह पहले ही भाजपा में शामिल हो जाना चाहिए था, अगर वे भाजपा में पहले ही चले जाते तो वे भी मालपूए जरुर खाते, पर भाग्य में शायद मालपुआ खाना नहीं था, अब भाजपा का टिकट मिला, और जीते तो मालपूए खायेंगे। ये हैं यहां के माननीयों का कैरेक्टर, जिसे झारखण्ड की जनता अच्छी तरह जानती है।

हालांकि भाजपा ने झामुमो को भी बहुत तोड़ने की कोशिश की, पर झामुमो से जानेवालों की संख्या एक या दो ही थी, जबकि झाविमो की बात करें तो झाविमो फिलहाल पूरी तरह साफ हैं, केवल एक प्रदीप यादव है, जो यौन-शोषण के आरोप को झेल रहे हैं, उनका भविष्य क्या होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। हम आपको बता दें कि यौन शोषण के आरोपी केवल प्रदीप यादव ही नहीं, बल्कि एक भाजपा विधायक ढुलू महतो भी हैं, पर प्रदीप यादव का दोष इतना है कि वे विपक्ष में हैं, और ढुलू महतो का सुंदर पक्ष यह हैं कि वह भाजपा में हैं, इसलिए भाजपा में रहनेवाले या भाजपा में जानेवालों पर कोई दोष नहीं रहता, इसलिए भाजपा के लोग ढुलू महतो पर कृपा लूटाते हैं, उसकी जय-जयकार करते हैं।

फिलहाल सच्चाई यह है कि भाजपा ने अपने यहां विभिन्न दलों से इतने कूड़े-कर्कट बटोर लिये हैं कि भाजपा में ही काफी खलबली मची हुई हैं और टिकट के बंटवारे होते-होते भाजपा में शामिल कितने लोग, कब और किस पार्टी में जाकर फिर से अपनी उपस्थिति दर्ज करायेंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता।

शायद बाबू लाल मरांडी को लगता है कि ऐसे हालात में उनकी पार्टी में शामिल हुए लोग कमाल दिखा सकते हैं और अलग से चुनाव लड़ते हैं तो पूर्व की तरह आठ से दस सीटें जीत सकते हैं, पर उन्हें पता नहीं कि 2014 और 2019 में काफी अन्तर आ गया है, उनकी एक गलत सोच, उनके ही भविष्य के लिए खतरे का संकेत भी बन जायेगी, इसलिए अच्छा रहेगा कि वे एक बेहतर राजनीतिज्ञ की तरह सोच रखते हुए, वैसे निर्णय लें, जो राज्य की जनता के हित में हो, क्योंकि भाजपा चाहती है कि राज्य में विपक्ष में बिखराव हो, क्योंकि विपक्ष में बिखराव ही भाजपा को मजबूती देगा, तो क्या बाबू लाल मरांडी चाहेंगे कि उनकी गलतियों का फायदा भाजपा उठा लें, हमें तो ऐसा नहीं लगता।

राजनीतिक पंडितों की मानें, तो इसमें कोई दो मत नहीं कि झारखण्ड की राजनीति में बाबू लाल मरांडी को नजरंदाज करना वर्तमान हालत में ठीक नहीं, उनके सभी विधायकों के भाजपा में शामिल होने के बावजूद भी वे एक मजबूत राजनीतिक स्तम्भ हैं, उनके मुख्यमंत्रित्वकाल में किये गये कार्य उन्हें आज भी एक बहुत अच्छे प्रशासक के रुप में प्रतिष्ठित करते हैं, जिसका लाभ उन्हें समय-समय पर मिलता रहा हैं, ऐसे में बाबू लाल मरांडी को चाहिए कि वे ऐसा निर्णय लें, जिसमें राज्य का भला हो, राज्य की जनता का भला हो, तथा वर्तमान सरकार से निजात पाने की इच्छुक जनता को उसका लाभ मिल सके।