रांची के चुटिया में श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ एवं पंचकुंडीय महायज्ञ संपन्न

रचना है तो रचनाकार है और वो आधार परब्रह्म हैं। जितने भी संसार में अणु हैं और जो एक दूसरे को आकर्षित करते हैं, वे कृष्ण के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। श्रीमद्भागवत कहता है कि श्रीकृष्ण आनन्द को ही कहते है। वहीं एकमात्र सच्चिदानन्द स्वरुप हैं। श्रीकृष्ण ही आकर्षण के केन्द्र है। संसार में कोई भी व्यक्ति हो या वस्तु, सभी को प्रेम और आनन्द चाहिए। प्रेम राधा है तो श्रीकृष्ण आनन्द।

रचना है तो रचनाकार है और वो आधार परब्रह्म हैं। जितने भी संसार में अणु हैं और जो एक दूसरे को आकर्षित करते हैं, वे कृष्ण के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। श्रीमद्भागवत कहता है कि श्रीकृष्ण आनन्द को ही कहते है। वहीं एकमात्र सच्चिदानन्द स्वरुप हैं। श्रीकृष्ण ही आकर्षण के केन्द्र है। संसार में कोई भी व्यक्ति हो या वस्तु, सभी को प्रेम और आनन्द चाहिए। प्रेम राधा है तो श्रीकृष्ण आनन्द। इन्हीं प्रेम और आनन्द से दुनिया चल रही है, अगर प्रेम और आनन्द को हटा दिया जाये, तो यह दुनिया रहेगी ही नहीं, क्योंकि प्रेम और आनन्द के बिना सृष्टि चल ही नहीं सकती। ये बातें रांची के चुटिया अयोध्यापुरी स्थित वृंदावनधाम में श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिन भागवताचार्य संत मणीषभाई जी महाराज ने भगवान के भक्तों को कही।

उन्होंने कहा कि आज प्रबंधन की बात होती है, उसकी पढ़ाई खुब चल रही है, यह व्यवसाय खुब चल रहा है, पर सच पुछो तो ये प्रबंधन की बाते तो श्रीमद्भागवत ने हजारों वर्ष पहले सीखा दी है। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत के पन्नों को पलटिये, महाराज युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ कर रहे है। भगवान श्रीकृष्ण युद्धिष्ठिर को आगंतुकों को स्वागत करने, अर्जुन को सुरक्षा, भीमसेन को खान-पान, दुर्योधन को कोषाध्यक्ष, नकुल को प्रत्येक व्यक्तियों से संपर्क करने तथा उनकी आवभगत करने, सहदेव को आवासन का काम, यज्ञ के दौरान सौंप रहे हैं और स्वयं आगंतुकों के पादुकाओं को रखने, उनके चरणो को धोने तथा पत्तलों को उठाने का काम स्वयं अपने पास रखते हैं, ये चीजें भगवान श्रीकृष्ण से सबको सीखनी चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसा कर सीख दी कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता, और सबसे बड़ा कार्य अगर कोई है तो वह सेवा है, और इससे बढ़कर कुछ दुसरा हो ही नहीं सकता, प्रबंधन की इससे अच्छी सीख और कहां मिल सकती है।

उन्होंने सभी से कहा कि आप अपने बच्चों को रामायण, गीता, श्रीमद्भागवत पढ़ने को कहें, क्योंकि इन्हीं से संस्कार मिलेगा, इन्हीं से वे सुसंस्कृत होंगे, और फिर ये देश की सेवा करते हुए, अच्छे आदमी बनेंगे और इनकी यश-कीर्ति फैलेंगी। उन्होंने कहा कि अपनी वाणी को वीणा बनाएं, न कि बाण। वाणी को वीणा बनायेंगे तो सम्मान पायेंगे और बाण बनायेंगे तो इसमें सभी का नुकसान ही नुकसान है।

उन्होंने आज बर्बरीक की कथा, भगवानश्रीकृष्ण के महाप्रयाण और महाराज परीक्षित के मोक्ष की कथा सुनाकर श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का समापन किया और इस समापन के अवसर पर सभी से अपील की, अपने जीवन को सार्थक करने का प्रयास करें, यह जीवन तभी सार्थक होगा, जब आप हरिस्मरण करेंगे, जब आप भगवान के बताये मार्ग पर चलेंगे, जब आप स्वयं को सुधारने का प्रयास करेंगे। उन्होंने सभी से कहा कि संसार में जो आशा लगाता है, वहीं दुख पाता है और जो संसार को तज कर हरि में स्वयं को लगा देता है, वह अपने जीवन को धन्य कर लेता है।

श्रीमद्भागवत कथा के समापन के बाद गत् 15 मई से चल रहे पंचकुंडीय महायज्ञ का समापन हुआ। भागवत सेवा समिति के सदस्यों ने भागवताचार्य संत मणीषभाई जी महाराज द्वारा अभिसिंचित मंत्रों से यज्ञ में अंतिम आहुति दी और उसके बाद भंडारे का आयोजन किया। जिसमें हजारों की संख्या में भागवत भक्तों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और भगवान का प्रसाद ग्रहण कर, अपने जीवन को धन्य कर दिया।

Krishna Bihari Mishra

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