स्मार्ट सिटी बनवानेवाली रघुवर सरकार के पास न दवा है न एंबुलेंस

जो सरकार बच्चों को एक रुपये की दवा तक न उपलब्ध करा सकें, उसे सत्ता में रहने का क्या अधिकार है? जी हां, ये हालात है झारखण्ड के। यहां की सरकार बड़े-बड़े दावे करती है, स्मार्ट सिटी बनाने की बात करती है, अपनी ब्रांडिग के लिए करोड़ों खर्च कर रही हैं, पर दुसरी ओर हमारे नौनिहालों को एक रुपये तक की दवा उपलब्ध कराने में ये सरकार असमर्थ है। आज गुमला में एक ऐसी घटना घटी है, जो हृदय को चीर देनेवाला है।

जो सरकार बच्चों को एक रुपये की दवा तक न उपलब्ध करा सकें, उसे सत्ता में रहने का क्या अधिकार है? जी हां, ये हालात है झारखण्ड के। यहां की सरकार बड़े-बड़े दावे करती है, स्मार्ट सिटी बनाने की बात करती है, अपनी ब्रांडिग के लिए करोड़ों खर्च कर रही हैं, पर दुसरी ओर हमारे नौनिहालों को एक रुपये तक की दवा उपलब्ध कराने में ये सरकार असमर्थ है। आज गुमला में एक ऐसी घटना घटी है, जो हृदय को चीर देनेवाला है। गुमला के ममरला स्कूल बसिया में पढ़ाई कर रहा पहली कक्षा का छात्र संजय अब इस दुनिया में नहीं है क्योंकि उसे तेज बुखार था और गुमला सरकारी अस्पताल के पास एक रुपये की दवा नहीं थी, जिससे संजय को बचाया जा सकें, यानी दवा के अभाव में आठ साल का संजय दम तोड़ दिया और उससे भी हृदयविदारक दृश्य यह कि उस बच्चे के शव को गमछे से अपने पीठ पर बांधकर, उसके पिता को अस्पताल से ले जाना पड़ा। क्या ये अमानवीय नहीं है?

यह कैसी विडम्बना है कि शुक्रवार को ही गुमला में स्वास्थ्य मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी स्वास्थ्य विभाग की उपलब्धियों पर अपनी पीठ थपथपा रहे थे, नियुक्ति पत्र बांट रहे थे और वहीं घोर अव्यवस्था के कारण एक आठ वर्ष की बच्चे की जान चली गई। यहीं नहीं अंत में उस बच्चे के शव को सहारा भी मिला तो उसके पिता का, क्या सचमुच सरकार और उनके अधिकारी संवेदनहीन हो गये है, इस दृश्य को देखकर तो कोई भी मर्माहत हो जायेगा, और सेवा के लिए आगे निकल पड़ेगा, पर यहां तो सरकार नाम की कोई चीज ही नहीं है।

मृतक छात्र संजय के पिता करण सिंह स्वयं अपने पीठ पर बांधकर अपने बेटे का शव श्मशान घाट तक लाये। लोग बताते है कि संजय के इलाज के लिए पहले उसे सिसई रेफरल अस्पताल लाया गया, जहां से उसे सदर अस्पताल गुमला रेफर किया गया। चूंकि करण सिंह के पास पैसे नहीं थे कि वे दवा ला सकें, इसलिए दवा के अभाव में संजय की जान चली गई। मृतक की मां देवकी देवी बताती है कि गरीबी के कारण वे लोग अपने बच्चे का बेहतर इलाज नही कर सकें और सदर अस्पताल गुमला में तो चिकित्सकों ने उसके बच्चे पर ध्यान ही नहीं दिया, अगर ध्यान दिया होता, उसे दवा उपलब्ध कराई होती तो उसके बच्चे की जान नहीं जाती।

कमाल की बात यह है कि जहां संजय की जान गई है, उस अस्पताल को पिछले वर्ष बेहतर व्यवस्था के लिए पुरस्कृत भी किया गया था, क्या यहीं बेहतर व्यवस्था है, जहां एक रुपये की दवा तक न हो, संजय को हुआ क्या था – तेज बुखार ही तो था, क्या एक मामुली बुखार की दवा उपलब्ध कराने में रघुवर सरकार असमर्थ है?

और जैसा कि होता है, इस समाचार के बाद कि बच्चे की दवा के अभाव में मौत हो गई और उसे एंबुलेंस तक उपलब्ध नहीं कराया गया, मुख्यमंत्री रघुवर दास ने जिला प्रशासन को 24 घंटे के अंदर जांच रिपोर्ट देने और दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने का निदेश दिया है, ये कड़ी कार्रवाई कैसी होगी?  आप इसी से जान लें कि शिव सरोज के आत्महत्या मामले में जिन्हें जांच करने को मिला है, वे जनाब अपने सभी पुलिस अधिकारियों को बचाने में एड़ी-चोटी एक कर दी और जिसने पुलिस व्यवस्था पर अंगूली उठाई, उसे ही कटघरे में लाकर खड़ा दिया। यकीन मानिये, यहां भी कुछ इसी प्रकार की स्थिति दिखाई पड़ेगी।

Krishna Bihari Mishra

One thought on “स्मार्ट सिटी बनवानेवाली रघुवर सरकार के पास न दवा है न एंबुलेंस

  1. मिश्रा जी,सरकार को इन सव वातों से कोई दरजार नहीं, कि कौन कहां दवाई के बिना मरता है, सरकार तो दारु वेचने में व्यस्त है। दवाई जहां जिंदा करती है,दारु वहीं अंधा करती है।ति कहां सड दिखेगा किसीका दवाई के बिना मरना।सरकार संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को पार कर गयि है।इसलिये मुख्यमंत्री बदलने की सुगबुगाहट हो रही है,सायद केन्द्र भी अब इस बात को महसूस कर रही है।

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