RIMS तुम्हारा जवाब नहीं, तुम आज भी लाखों गरीबों-वंचितों के तारणहार और जीवनदायिनी हो

जब भी रांची के अखबारों का पन्ना पलटा, यहीं पाया कि रांची के रिम्स की हालत ठीक नहीं, वहां गंदगी रहती हैं, किसी का इलाज सही नहीं होता। डाक्टरों, जूनियर डाक्टरों की लापरवाही बराबर देखने को मिलती है। लोगों को दवाएं नहीं मिलती,सही उपचार नहीं होता। आम-तौर पर सरकारी अस्पतालों का बराबर यहीं दृश्य अखबारों व मीडिया के लोगों ने दिखाया है। 

जब भी रांची के अखबारों का पन्ना पलटा, यहीं पाया कि रांची के रिम्स की हालत ठीक नहीं, वहां गंदगी रहती हैं, किसी का इलाज सही नहीं होता। डाक्टरों, जूनियर डाक्टरों की लापरवाही बराबर देखने को मिलती है। लोगों को दवाएं नहीं मिलती,सही उपचार नहीं होता। आमतौर पर सरकारी अस्पतालों का बराबर यहीं दृश्य अखबारों मीडिया के लोगों ने दिखाया है। 

पर सच पूछिये, हम जब भी सरकारी अस्पताल पहुंचे या रिम्स गये, तो मुझे कभी भी ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला। मुझे जब भी कोई बीमारी हुई या आपरेशन कराना हुआ। मैंने सरकारी अस्पतालों को प्राथमिकताएं दी और मुझे एकदो घटनाओं को छोड़कर कही से कोई शिकायत नहीं मिली।

ऐसे लोग कहेंगे कि आप पत्रकार हैं, तो पत्रकारों पर डाक्टर कृपा लूटाते ही हैं। मैं बड़ी विनम्रता से कहूंगा कि ऐसी कोई बात नहीं, सर्वप्रथम मैंने कहीं कोई अपना परिचय नहीं दिया कि मैं पत्रकार हूं, सामान्य जनता की तरह गया और जैसे सामान्य जनता पंक्तिबद्ध होकर अपने काम को कराती हैं, वैसा ही में भी करता चला गया और मुझे कहीं कोई शिकायत नहीं मिली।

ताजा घटना, जरा ध्यान से पढ़िये। मेरे दाहिने हाथ के केहुनी के पास एक बहुत बड़ा ट्यूमर जो धीरेधीरे बढ़ता जा रहा था,पर उससे मुझे कोई दिक्कत नहीं, जैसे उसमें दर्द नहीं था।एक दिन जब भाकपा माले कार्यालय गया, तो वहां शुभेन्दु सेन मिल गये, उनकी नजर जब हमारे केहुनी पर पड़ी तो उन्होंने कहा कि ये क्या हैं? और इसे पाल कर क्यों रखे हैं? इसे जल्दी निबटाइये।

उसके बाद एक आर्थो के डाक्टर से बरियातु में मिला, उनका कहना था कि ऑपरेशन में कम से कम 20 हजार रुपये लगेंगे और ब्लड जांच तथा अन्य जांचों के लिए अलग से करीब पांच हजार रुपये खर्च होंगे। यानी दवा आदि लेकर खर्च 30 हजार रुपये रहा था और पॉकेट में एक धैला नहीं। इधर फिर एक शाम भाकपा माले कार्यालय गया तो वहां भुवनेश्वर केवट मिले। उनका कहना था कि अरे इसको जल्दी निकलवाइये, कुछ हो गया तो फिर लेने के देने पड़ेंगे और हम नहीं चाहते कि आप जैसे लोग जल्दी खिसके, उनकी बातों में व्यंग्य था, साथ ही मेरे लिए शुभकामनाएं भी।

मैं मंगलवार 20 अगस्त 2019 को रिम्स पहुंचा, पांच रुपये का निबंधन कराया और स्लिप लेकर सर्जरी के ओपीडी में चला गया। वहां लंबी लाइन थी, कई डाक्टर सभी मरीजों को देख रहे थे, जब मेरी बारी आई तो डा. आर जी बाक्सला के मैं सामने था। डा. आर. जी. बाक्सला ने बड़े ही आत्मीय भाव से मुझसे बातचीत की, मेरे दाहिने हाथ के ट्यूमर को देखा और कुछ रक्त की जांच लिख दी। 

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जब रक्त की जांच रिपोर्ट और एक अन्य जांच हो जाये, जिसकी जांच में कम से कम दो से तीन दिन लगते है, उस जांच को लेकर शनिवार यानी 24 अगस्त को एसओटी वन में मिले। इधर मैं रक्त तथा अन्य जांच के लिए 150 रुपये की रसीद कटाई, फिर पंक्तिबद्ध होकर अपना रक्त जमा कराया, तथा फिर फ्लोर नंबर तीन के रुम नं. सात में भी एक जांच के लिए पंक्तिबद्ध हुआ। लंबी लाइन दोनों जगहों पर थी। 

पर कही भी दिक्कते नहीं। नाम पुकारा जाता, जिनका नाम आता और वे जाते तथा अपने शरीर की बीमारियों से संबंधित वस्तुओं की जांच के लिए सामग्रियां उपलब्ध कराते। इधर जैसे ही मैं इन सभी जांच रिपोर्टों को लेकर 24 अगस्त को एसओटी वन में डा. आर जी बाक्सला से मिला, उन्होंने जांच रिपोर्ट देखी और 26 अगस्त को साढ़े नौ बजे आपरेशन के लिए बुला लिया।

26 अगस्त को मैं नियत समय पर ऑपरेशन के लिए पहुंचा हुआ था, डा. बाक्सला देखते ही मुस्कुरा दिये, गये। मैंने कहा कि आपके आदेशानुसार, उपस्थित हूं और वे सीधे ऑपरेशन थियेटर में मुझे लेकर बर्थ पर सोने को कह दिया, वहां काफी संख्या में मेडिकल की पढ़ाई करनेवाले स्टूडेंट भी थे, डा. बाक्सला ने उन जूनियर डाक्टरों से बातचीत के क्रम में, कब हमारा ऑपरेशन कर दिया, मुझे पता ही नहीं चला, सच पूछिये तो इंजेक्शन लगने का दर्द तक नहीं पता चला और पता चला कि कब वो ट्यूमर निकल गया। जब ऑपरेशन खत्म हुआ, तो मुझे कुछ दवाएं लिखी गई और फिर एक हफ्ते बाद आने को कहा गया है, मैं जाऊंगा भी।

कहने का मतलब है कि हम झारखण्ड के उन तमाम गरीब, वंचित समुदाय के लोगों से कहूंगा कि आप निजी अस्पतालों में इलाज की अपेक्षा, सरकारी अस्पतालों जैसे रांची के रिम्स पर भरोसा रखिये, वहां उम्दा किस्म का इलाज और उम्दा किस्म की सर्जरी होती है, वह भी मुफ्त और प्रेमसद्भावना के साथ।

लाखों लोग यहां आकर इलाज करा,स्वस्थ होकर अपने घर जा रहे हैं। अगर कोई कहता है कि यहां इलाज ठीक नहीं होता या यहां दलाल सक्रिय है, तो उसे मत मानिये, अपने आप पर भरोसा रखिये। पांच रुपये का निबंधन कराइये, जैसे डाक्टर बोले, उनकी बातों को मानिये, जहां लाइन लगना है, वहां लाइन लगिये, अगर लाइन लंबी हो, तो घबराइये नहीं, वो लाइन बहुत जल्द ही खत्म हो जाती है, क्योंकि काम बहुत तेजी से और ईमानदारीपूर्वक होता है। 

इसलिए कोई कहता है कि बहुत भीड़ हैं, हम आपका काम करवा देंगे, तो इस गलतफहमी में नहीं पड़े, जहां जो पैसा लगना है, उसकी रसीद आपको मिलती है, इसका ध्यान रखे, आपका रिम्स है आप इसका लाभ लें, जैसे हमने लिया, और मैं ठीक भी महसूस कर रहा हूं। एक बार मैं अपनी ओर से, अपनी बेहतर इलाज के लिए डा. आर जी बाक्सला की टीम को मुबारकबाद देना जरुर चाहूंगा। थैंक्स डाक्टर।

Krishna Bihari Mishra

Next Post

‘तुम्हारे लातेहार में बाकी दोनों लौंडे को मिल गया है सैलरी’ क्या IPRD के बोलचाल की यही भाषा है?

Mon Aug 26 , 2019
अखबारों और चैनलों पर अपने चेहरे चमकाने के लिए रघुवर सरकार के पास पैसे हैं, पर ठेके पर रखे गये आइपीआरडी में कार्यरत एपीआरओ, सोशल मीडिया पब्लिक ऑफिसर, रिसेप्शनिस्ट, कम्प्यूटर ऑपरेटर, साउंड ऑपरेटर को मासिक वेतन देने के लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं। पिछले साढ़े चार महीने से ये सारे लोग वेतन के लिए तरस रहे हैं, पर वेतन का भुगतान नहीं हो रहा।

You May Like

Breaking News