फिलहाल अंधों की बस्ती में वह आइना बेचने का काम कर रही है, क्योंकि उसे भरोसा है एक दिन लोग जगेंगे

मेहनत कभी नहीं छोड़ना चाहिए, करते जाना चाहिए, ये भूलकर कि इसका अंजाम क्या होगा? जो लोग ऐसा सोचकर लगे रहते हैं। वे ही एक दिन कामयाब होते हैं। हम यहां बात कर रहे हैं, कमला की। जो धनबाद भाजपा की जिला मंत्री हैं। कहने को तो धनबाद का भाजपा जिलाध्यक्ष कह रखा है कि उसे पार्टी से निकाल दिया गया हैं, पर कमला को आज तक इसकी लिखित जानकारी या इस संबंध में शो काउज नहीं किया गया।

इधर कमला ने जिस पर यौन शोषण का आरोप लगाया है, उसे भाजपा ने टिकट दे दिया हैं, संभव हैं वह जीत भी जाय, क्योंकि उसके पास पावर है, पैसा है और उसके गलियारे ही नहीं, उसके घर में सत्ता ठूमके लगाती है, शायद यही कारण है कि कमला बार-बार वह लोकोक्ति को दुहरा रही है कि फिलहाल वह अंधों की बस्ती में आइना बेचने का काम कर रही हैं।

जबसे उसने उस दबंग व सीएम रघुवर के चहेते भाजपा विधायक पर यौन शोषण का आरोप लगाई हैं, उस विधायक का तो बाल बांका नहीं हुआ, पर कमला की हंसती-खेलती जिंदगी सब ने तबाह कर दी, न तो भाजपा के लोग कमला की बातों को सुन रहे हैं, न धनबाद की पुलिस सुनती है, विधानसभाध्यक्ष के पास गई, विधानसभा तक पहुंची, वहां भी उसकी बातों को अनसूना कर दिया गया, ले-देकर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाई, हाईकोर्ट ने कमला की प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया।

तब जाकर करीब साल होने को आये, उसकी प्राथमिकी दर्ज की गई, फिर प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पूरा मामला ही ठंडे बस्ते में चला गया, ये हैं भाजपा शासित राज्य, रघुवर शासित राज्य के कारनामें, यानी इतना अत्याचार अगर किसी के साथ हो तो जरा सोचिये उस पर क्या बीतती होगी? इधर कमला इन सबसे अलग, जन-जन तक अपनी बात पहुंचा रही हैं, वह लोगों से कह रही हैं कि इस बार बाघमारा से ऐसे व्यक्ति को चूने, जो सही मायनों में जन-प्रतिनिधि के लायक हो।

कोई उसकी बात सुन रहा हैं तो कोई उसकी बात को हवा में उड़ा दे रहा हैं, तो किसी को रघुवर और मोदी में खुदा नजर आ रहा हैं, और उसी के लिए मर-मिटने को तैयार हैं, पर कमला की बात सुनने के लिए किसी के पास समय नहीं। ये हैं धनबाद के बाघमारा-कतरास की कमला का हाल।

कमला के इस हाल को देखकर गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर की वो पंक्तियां बरबस याद आती है – एकला चलो रे। यानी जब कोई तुम्हारी बात नहीं सुनें तो बस तुम अकेले चलो, अपनी बात रखों, चाहे कोई माने या न माने, शायद इसी परम्परा का निर्वहण करते हुए कमला एकला चलो रे के नारे के साथ निकल पड़ी हैं, देखते हैं, जनता कितनी जगती हैं, लोकतंत्र किस प्रकार से झारखण्ड में कमाल दिखाता हैं।