अपनी बात

संपादक कोई भी हो, अब उसे संपादक से ज्यादा ट्रोलर बनने में दिलचस्पी है, इसीलिए वो सोशल साइट्स पर ऐसे पोस्ट डालता है, ताकि उसके राजनीतिक आका उस पर प्रसन्न होकर मुंह मांगी मुराद उसके झोली में …

जरा भाषा देखिये वर्तमान संपादकों की और फिर अपना माथा पकड़ लीजिये। जब इनकी इस प्रकार की भाषा है, तो अपने संपादकीय काल में किस प्रकार का ये गुल खिलाते होंगे? भगवान ही मालिक है। लेकिन इनकी इस प्रकार की घटिया भाषा का इनके द्वारा इस्तेमाल किये जाने के बाद भी इनके प्रशंसकों की संख्या हजारों में हैं। इनकी स्तुति करनेवालों और इन्हें ‘वाह भइया’ कहनेवालों की संख्या सैकड़ों में हैं।

इनको अपने यहां बुलाकर, इनके साथ सेल्फी खिंचवानेवालों की संख्या भी बहुतायत है और अंत में इनके ‘हां’ में ‘हां’ मिलानेवाले तो आप हाथों पर गिनते रह जायेंगे। कम ही नहीं होंगे। लेकिन इसके बावजूद इन्हें शर्म नहीं आती, ये वे सब चीजें लिखते हैं, जो एक सामान्य औसत दर्जें का आदमी भी नहीं लिख सकता।

जरा देखिये, इन्होंने कल अपने फेसबुक पर क्या लिख दिया और जब लोगों ने जमकर इनकी खिंचाई की, तो इन्होंने ये पोस्ट ही डिलीट कर दिया। अब इन्हें कौन बताये कि आज के युग में जहां फोटो शॉट्स लेनेवालों की संख्या भी बहुतायत हैं, वहां उनके द्वारा पोस्ट को डिलीट कर दिये जाने के बावजूद भी इनके पास हवाओं में, सोशल साइट्स की दुनिया में तैरते रहते हैं और विद्रोही24 तक पहुंच ही जाते हैं। जरा देखिये, प्रभात खबर से हाल ही में अवकाश प्राप्त किये इस महाशय ने अपने फेसबुक पर कल क्या लिखा था –

‘कांग्रेसियों के राष्ट्रीय जीजा आजकल दिख नहीं रहे? भाजपाई भी लगता है भूल ही गये उन्हें…, वैसे भाजपाई तो उन्हें तो सिर्फ इलेक्शन में याद करते हैं!’ इन्होंने ये उटपुटांग और गैरजिम्मेदाराना पोस्ट लिख तो दिया और जब इन्हें लोग, इनके पोस्ट पर ही इनके खिलाफ गोले दागने लगे तो जनाब ने उसे जल्दी डिलीट कर दिया। डिलीट करने के बाद क्या लिखा – ‘मेरे एक पोस्ट की भाषा पर कई मित्रों की प्रतिक्रिया मिली। मुझे भी लगता है, भाषा पर संयम तो होना ही चाहिए। मैंने जिस भाषा का प्रयोग किया, उससे बचना चाहिए था। पोस्ट की भाषा के लिये क्षमायाचना। भाषा और शब्दों के प्रयोग पर संयम रखूँगा। वैसे उस पोस्ट को मैंने डिलीट कर दिया है।’

मतलब ये लिख दिये, बाद में जब इन्हें लताड़ा गया, लताड़ने से ज्ञान की प्राप्ति हुई, तो इन्होंने पोस्ट डिलीट कर दिया। लेकिन इससे होता क्या है? आगे देखिये… एक सज्जन ने तो इनके पोस्ट को शेयर करते हुए जो लिखा और जो इस पोस्ट पर श्रीमान संपादक के लिए जो विचार आये, वो इनके बुखार छुड़ाने के लिए काफी है। जरा उसे भी देखिये – ‘विजय पाठक जी बहुत काबिल संपादक रहे हैं। उन्होंने बहुतों को पत्रकारिता सिखाई है। हाल तक प्रभात खबर के संपादक थे। अभी रिटायर हुए है। रिटायरमेंट के बाद भी सक्रिय है। सर की भाषा देखकर अच्छा लगा। लगा कि सर ने पत्रकारिता के पेशे में अपना जीवन खपा दिया है।’

इनके ही पोस्ट पर पुष्पराज एस शास्त्री ने कमेन्ट्स किया कि प्रभात खबर के प्रधान संपादक मुझे छापते थे इसलिए फैक्स भेजने और छपने से पूर्व पाठक जी से फोन से औपचारिक संवाद होता था। राज्यसभा के उप सभापति महोदय के निजी सचिव का पाठक जी के स्वागत में पोस्ट दिखा तो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि अंदर -अंदर दाल पक रही है। लेकिन आपके इस पोस्ट से मालूम चला कि दाल पक चुकी है। जिनकी जितनी लंबी जीभ, उनको वैसी कुर्सी दे दो।

अजीत राजपुरी ने लिखा कि अभी कुछ दिन पहले जी, कई लोग इनको पत्रकारिता का भीष्म पितामह बता रहे थे। इतना जल्दी ये अपना असली रंग दिखायेंगे, ये अंदाजा नहीं था। आशीष झा ने इनकी अच्छी क्लास ली, कहा कि इस देश में कोई रियायर्ड होना नहीं चाहता, नेता की तो बात छोड़ दीजिये। नौकरशाह रिटायर्ड होना नहीं चाहता। जस्टिस रिटायर्ड होना नहीं चाहते। फिर पत्रकार अगर रिटायरमेंट के बाद कुछ पाने की कोशिश कर रहा है, तो बुराई क्या है? मतलब इस कमेन्ट्स में सारा सार छुपा हुआ है कि ऐसे पोस्ट विजय पाठक द्वारा क्यों लिखे गये?

हाल ही में जनाब दिल्ली जाकर अपने महागुरु की परिक्रमा भी कर चुके हैं। प्रभात खबर में तो जो काम किया है। अगर वो किसी राजनीतिक दल के शीर्षस्थ नेता के चरणवंदन की कला में निपुण है, तो वो रिटायरमेंट के बाद कुछ न कुछ तो राजनीतिक दल के शीर्ष नेताओं के आशीर्वाद से कुछ न कुछ बन ही गया है। उदाहरण अनेक हैं। केवल वर्तमान से अतीत की ओर जाना है। सब कुछ देखने को मिल जायेगा।

अब तो ये रही वर्तमान की बात। इनकी भाषा की चर्चा तो उस वक्त भी हुई। जब भारत और वेस्टइंडीज टी20 मैच के दौरान झारखण्ड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन के स्टेडियम में भिड़ रहे थे। जनाब जब मैच का ब्रह्मानन्द लेकर घर लौटे तो उन्होंने एक पोस्ट लिख दिया, क्या लिखा, उस पर जोर डाले -भारत-वेस्टइंडीज टी-20 मैच के आयोजन के लिए JSCA अध्यक्ष अजयनाथ शाहदेव, सौरभ तिवारी, संजय पांडेय और अन्य पदाधिकारियों को बधाई… बेहतरीन आयोजन था…व्यवस्था भी ठीक… सिर्फ़ एक आग्रह, बड़े अफ़सरों को पास देने से बचें… बॉडीगार्ड, ड्राइवर, घर के नौकर उनके पास पर मैच देखने पहुंचते हैं।

इस पोस्ट पर भी कई संभ्रांत नागरिकों/पत्रकारों ने इनके इस पोस्ट की धज्जियां उड़ाते हुए लिखा था कि अधिकारियों के घर काम करनेवाला गरीब, नौकर मैच देख लेता है, तो क्या दिक्कत है सर। ये तो और अच्छी बात है। इस कमेन्ट्स को इनके ही पोस्ट पर सर्वाधिक 12 लाइक्स मिले हैं।

एक पहले के संपादक थे। जिनकी लिखी हुई बातों पर, बोली हुई वक्तव्यों पर कोई कमेन्ट्स करने का जुर्रत तक नहीं करता था। क्योंकि उनसे गलतियां ही नहीं हुआ करती थी। लोग उनसे सीख लेते थे। बड़े-बुजुर्ग तो कहा करते थे कि अपनी भाषा सुधारनी है तो संपादकीय पृष्ठ पढ़ो। अब आप बताएं जहां ऐसे-ऐसे संपादक हो, जिनको बोलने और लिखने तक की तमीज नहीं हो, उससे आगे की आनेवाली पीढ़ी या वर्तमान पीढ़ी क्या सीखेंगी?

हाल ही में एक दैनिक भास्कर ने ऐसी हेंडिग लगा दी कि मां गंगा को राक्षसी के रूप में पेश कर दिया। उसके संपादक ने सोशल साइट पर माफी भी मांगी। लेकिन अखबार में माफी मांगने से इनकार कर दिया। तो अंत में भाइयों, जहां ऐसे-ऐसे चिलगोजे टाइप के संपादक होंगे। उनसे आप बेहतरी की कामना कैसे कर सकते हैं? वे तो ऐसा लिखकर अपने राजनीतिक आकाओं, जिनसे उन्हें आगे चलकर लाभ लेना है। उसी की शान में लिखकर, ट्रोलर बनने को लालायित हैं। अब तो आपको चिन्तन करना है कि अपने बच्चों को संपादक बनाना है या ट्रोलर? आज के संपादक को आप ट्रोलर संपादक कहें, तो ज्यादा बेहतर होगा। इससे ज्यादा वे कुछ भी नहीं।

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