मोदी की सभा से रांचीवासियों ने बनाई दूरी, आयुष्मान योजना को लेकर लोगों में संशय, भीड़ लाने का काम IAS के जिम्मे

अरे भाई, देश में तो भोजन का अधिकार लागू है, तो क्या… देश में लोग भूख से नहीं मर रहे। इसी मोदी सरकार ने मुद्रा योजना लागू किया, तो क्या… उस मुद्रा योजना का लाभ ले रहे परिवारों की किस्मत बदल गई, या वे बैंकों के अधिकारियों और राज्य सरकार के वित्त सेवा में लगे अधिकारियों/कर्मचारियों के गुलाम बनकर, अपने भविष्य को चौपट कर लिया

अरे भाई, देश में तो भोजन का अधिकार लागू है, तो क्या… देश में लोग भूख से नहीं मर रहे। इसी मोदी सरकार ने मुद्रा योजना लागू किया, तो क्या… उस मुद्रा योजना का लाभ ले रहे परिवारों की किस्मत बदल गई, या वे बैंकों के अधिकारियों और राज्य सरकार के वित्त सेवा में लगे अधिकारियों/कर्मचारियों के गुलाम बनकर, अपने भविष्य को चौपट कर लिया और इसका सही लाभ वे आईएएस अधिकारी और वे बैंक के अधिकारी ले लिये, जो व्यवस्था को कैसे धराशायी करना हैं, उसमें पारंगत हैं।

याद करिये, इसी सरकार ने नोटबंदी की थी और इस नोटबंदी के बड़े-बड़े फायदे बताये थे, प्रधानमंत्री ने गोवा की एक सभा में देशवासियों से सिर्फ पचास दिन मांगे थे, क्या हुआ, कौन सा फ्लैट सस्ता हो गया, कौन से आतंकी घटनाओं में कमी आ गई, कौन अधिकारी बैंकों की लाइन में लगा अपने नोट बदलवाने के लिए, जो भी थे वे सभी सामान्य मध्यमवर्गीय परिवारों के ही तो थे।

और अब आयुष्मान योजना की बात। हां भाई, ये बहुत ही अच्छी योजना है, जो इससे जुड़े भगवान करें, उनको इसका लाभ मिले, पर जहां सिस्टम में छेद ही छेद है, वहां इसका लाभ ही मिलेगा, इसकी क्या गारंटी, जरा पूछ लो उनसे जो उज्जवला योजना का लाभ ले रहे हैं, जरा उनसे यह भी पूछ लो कि उन्होंने कितनी बार गैस भरवाए हैं, अरे जो व्यक्ति एक रुपये प्रति किलो अनाज लेकर अपना पेट भरने को बाध्य हैं, वह नौ सौ रुपये का सिलिण्डर हर महीने कहां से भरवायेगा।

मैं कहता हूं कि आयुष्मान योजना की आवश्यकता ही क्यों? क्यों न ही आप गांव- गांव में बेहतर स्वास्थ्य केन्द्र खोल देते, क्यों नहीं हर जिले में एक ऐसे स्वास्थ्य केन्द्र खोल देते हो, जिसमें डाक्टरों की अच्छी टीम हो, स्वास्थ्य उपकरण व स्वास्थ्य सुविधाओं की जाल फैली हो, अच्छी और सस्ती दवाएं उपलब्ध हो, इसके बाद फिर आयुष्मान योजना के अंतर्गत बीमा की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

क्या हमें कोई बतायेगा कि दुनिया की कौन ऐसी बीमा कंपनी है, जो अपनी कंपनी को घाटे में डालकर, लोगों की सेवा के लिए आतुर होगी, क्या ये सही नहीं है कि इसका फायदा आयुष्मान से जुड़े लोगों को कम और इसमें जुड़े निजी  हास्पिटल ज्यादा उठायेंगे और गलत-गलत रिपोर्ट बनाकर, बीमा का लाभ उठायेंगे। क्या ये सही नहीं कि कुछ लोगों की इसमें दलाली भी चलेगी, और वे ऐसे लोगों को ग्रिप में लेंगे, जो बीमार भी नहीं, और बीमारी का नाटक कर, खुद और हास्पिटल दोनों का पेट भरेंगे, और बीमा कंपनियों से जुड़े अधिकारियों को भी लाभ दिलवायेंगे और ले देकर खामियाजा किसे भुगतना पड़ेगा, समझते रहिये।

रही बात बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की, वे तो आयुष्मान योजना की प्रशंसा करेंगे ही, क्योंकि वे फिलहाल एनडीए गठबंधन के प्रमुख नेताओं में से एक हैं, मजा तो तब आता जब वे महागठबंधन में होते और ये आयुष्मान योजना लागू हो रही होती, फिर देखते इनका बयान, कैसे बदला हुआ होता, हमारे देश के राजनेताओं के चरित्र तो गठबंधन के अनुसार बदलते रहते हैं। इसमें आश्चर्य कैसा?

आखिर, इतनी सुंदर योजना, उसका शुभारम्भ रांची से, फिर भी रांची की जनता कहीं नहीं, रांची के उपायुक्त को मुहर्रम के नाम पर निजी स्कूलों को बंद करवाने का ढोंग करना पड़ा, उनकी बसों को 22 सितम्बर को ही प्रशासन के जिम्मे सौपने को कहा गया, प्रशासन बड़े ही प्रेम से भाजपा कार्यकर्ताओं/नेताओं की तरह, बसों में ठूंस-ठूंसकर भीड़ इकट्ठे किये, ताकि पीएम की यह सभा ऐतिहासिक बन जाये, राज्य के विभिन्न जिलों के उपायुक्तों ने भी यहीं किया, बस लोगों को उपलब्ध कराये, खाने-पीने की व्यवस्था की गई, ताकि सीएम रघुवर का कोपभाजन न बनना पड़ जाये।

पीएम और सीएम ने भी लोकसभा चुनाव को नजर में रखते हुए, अपना भाषण जारी रखा, आई भीड़ भी बस सेवा और खाने-पीने की अच्छी व्यवस्था का नमक अदा की। इस भीड़ में, वे लोग थे, जो किसी न किसी प्रकार से, सरकारी योजनाओं से जुड़े हैं या उसका लाभ ले रहे हैं, इन्होंने भीड़ के रुप में उपस्थिति दर्ज कराई और कभी-कभी ताली बजा दिया और क्या? और फिर निकल गये। राज्य में बहुत दिनों के बाद देखा कि कई भाजपा कार्यकर्ता अपने घरों में बंद नजर आये, वो बातें नहीं दिखी, जो पहले हुआ करती थी, ज्यादातर लोगों का मोदी के प्रति अब नजरिया बदल रहा है, टीवी और रेडियो पर आंखो देखा हाल सुनानेवाले-दिखानेवाले अपना काम कर रहे थे, पर इनकी सुनने और देखने में किसी ने भी दिलचस्पी नहीं लिया।

नेताओं का दल मंच और मंच के नीचे से चिल्ला रहा था, इस योजना के बारे में कह रहा था कि देश ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में इस योजना की जय-जयकार हो रही है, पर जहां इसका शुभारम्भ हो रहा था, वहां के लोगों को ही इससे कोई मतलब नहीं दिखा। अखबार और चैनलवाले, राज्य और केन्द्र द्वारा मिले विज्ञापनों की भीख का कर्ज अदा कर रहे थे, कई अखबार तो आज मोदी के आगे साष्टांग दंडवत्  करते नजर आये तो कई चैनलों ने कहा कि मोदी तू हैं तो हम हैं, तू नहीं तो फिर हम कहां।

इधर कुछ अखबार जिन्हें संस्कृत की एबीसीडी नहीं मालूम, वे भवः और भव का मतलब ही नहीं समझ रहे थे, उन्हें लग रहा था कि जहां पाये, वहां विसर्ग लगा दो, संस्कृत हो गया, ठीक उसी प्रकार मोदी हो या रघुवर, जनता को आयुष्मान योजना का लाभ मिले या न मिले, बस इवेंट्स करानेवालों के माध्यम से पैसे लहका दो, और क्या चाहिए।

पचास लाख का हैलीपेड बना ही दिया गया, करोड़ों विज्ञापन में फूंक ही दिया गया, उपायुक्तों ने भाजपा कार्यकर्ताओं की तरह बस से भीड़ ला ही दिया और खाने-पीने की व्यवस्था कर ही दी, करोड़ों के पंडाल और कुर्सियों में जनता के पैसे फूंक ही दिये, हो गया आयुष्मान योजना। अब आयुष्मान योजना भी अन्य योजनाओं की तरह आम जनता का तेल निकाल दें, उससे और किसी को क्या मतलब?

Krishna Bihari Mishra

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