जानिये रक्षाबंधन को, भद्रा को, इस बार पड़ रहा हैं विशेष चूड़ामणि योग

कहा भी जाता है श्रावण शिव जी का माह है और जब श्रावण में सोमवार और पूर्णिमा दोनो साथ हो, जिस चंद्र को शिव जी धारण करते हो, तो उसकी महत्ता कितनी बढ़ जाती है, ये समझने की आवश्यकता है। याद रखे, यह चूड़ामणि योग तभी बनता है, जब सोमवार को चंद्रग्रहण लगता है, और यहां तो वैशिष्ट्यता का अंबार है, इसलिए यह सुखद है, मंगल को देनेवाला है। विद्वान बताते है कि ऐसा संयोग दुर्लभ है, क्योंकि बहुत कम के जीवन में ऐसा दुर्लभ योग चूड़ामणि योग का संयोग देखने को मिलता है।

क्या है भद्रा?

भारतीय पंचाग में तिथियों का बड़ा महत्व हैं, पंचांग के पांच अंगों में एक तिथि भी आता है, और यहीं तिथि के आधे भाग को करण कहते है। करण की कुल संख्या 11 है। जिसमें विष्टिकरण को भद्रा भी कहा जाता है। चूंकि एक महीने में 30 तिथियां होती है, इसलिए भद्रा हर महीने में आठ तिथियों को होती है। हर पूर्णिमा के पूर्वार्द्ध में भद्रा होती है, इसलिए रक्षा बंधन में भी भद्रा होता है, जो इस वर्ष पूर्वाह्न 11 बजे तक है। ऐसी मान्यता है कि भद्रा में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए, भद्रा में कोई भी शुभ कार्य करने से शुभ फल की प्राप्ति नहीं होती, इसलिए लोग भद्रा परित्याग करते है।

शास्त्र कहते है –    

स्वर्गे भद्रा, धनं धान्यं, पाताले धनागमः। मृत्युलोके यदा भद्रा कार्यसिद्धि स्तदा नहि।।

स्वर्ग में भद्रा धन-धान्य, और पाताल में धन के आगमन तथा जब मृत्युलोक में भद्रा चल रहा होता है तो कार्य सिद्धि में बाधा उत्पन्न हो जाती है। सार्वभौम शाकद्वीपीय ब्राह्मण महासभा के मंत्री गोपाल पाठक बताते है कि अगर शास्त्रों की बात करें तो इस साल सूर्योदय से लेकर दोपहर 2 बजे तक रक्षाबंधन करने में कोई दोष ही नहीं है।

रक्षाबंधन और चंद्रग्रहण

चूंकि दोपहर 2 बजे से ही चंद्रग्रहण का सूतक दोष लग जाता है, इसलिए 2 बजे के बाद इस साल रक्षाबंधन मनाना निषेध है, क्योंकि ग्रहण का सूतक लग जाने पर कोई भी शुभ कार्य नहीं किये जाने का विधान है।

क्या कहता है निर्णय सिन्धु

इदं रक्षाबंधनं नियतकालत्वात भद्रावर्ज्य ग्रहणदिनेपि कार्यं होलिकात्वात्। ग्रहणसंक्रत्यादौ रक्षानिषेधाभावात्।।

अर्थात् रक्षाबंधन नियत काल में होने से भद्रा को छोड़कर ग्रहण के दिन भी होली के समान मनाना चाहिए, चूंकि ग्रहण का सूतक अनियतकाल के कर्मों में लगता है जबकि राखी श्रावण शुक्लपक्ष पूर्णिमा को ही मनाया जाता है, न कि दूसरे दिन, इसलिए नियत कर्म होने के कारण इसमें ग्रहण दोष नहीं लगता।

रक्षाबंधन के दिन चूड़ामणि योग

21 वीं सदी का यह पहला चूड़ामणि योग हैं। कहा जाता है…

रविग्रहः सूर्य्यवारे सोमे सोमग्रहस्तथा।  चूड़ामणिरिति ख्यातसत्दा अन्नतफलं भवेत्।।

कहा भी जाता है श्रावण शिव जी का माह है और जब श्रावण में सोमवार और पूर्णिमा दोनो साथ हो, जिस चंद्र को शिव जी धारण करते हो, तो उसकी महत्ता कितनी बढ़ जाती है, ये समझने की आवश्यकता है। याद रखे, यह चूड़ामणि योग तभी बनता है, जब सोमवार को चंद्रग्रहण लगता है, और यहां तो वैशिष्ट्यता का अंबार है, इसलिए यह सुखद है, मंगल को देनेवाला है। विद्वान बताते है कि ऐसा संयोग दुर्लभ है, क्योंकि बहुत कम के जीवन में ऐसा दुर्लभ योग चूड़ामणि योग का संयोग देखने को मिलता है।

सर्वप्रथम रक्षासूत्र या राखी किसने बांधी?

सर्वप्रथम रक्षासूत्र या राखी किसने बांधी, इसकी बड़ी ही सुंदर कथा है। जब राजा बलि से वामन ने तीन पग में सब कुछ माप लिया, तब भगवान वामन ने राजा बलि को पाताल लोक में भेज दिया। भगवान वामन राजा बलि की दानवीरता से अति प्रसन्न थे, तभी राजा बलि ने भगवान वामन से कहा कि आप भी हमें एक वचन दें, वामन ने कहा दिया वचन मांगों, क्या मांगते हो राजा बलि। राजा बलि ने कहा कि जब भी सोने जाउं और नींद से जगूं तो मैं जिधर भी देखूं, बस आप ही आप नजर आये। भगवान वामन को यह जानते देर नहीं लगी कि राजा बलि ने उन्हें जीतने के बावजूद भी हरा दिया और अपना पहरेदार बना दिया। जब लक्ष्मी को नारद द्वारा इस बात की जानकारी मिली तो उन्होने वामन रुपी नारायण को राजा बलि से छुडाने के लिए, राजा बलि को अपना भाई बनाया, रक्षासूत्र बांधी और इस प्रकार राजा बलि से अपने पति वामन रुपी नारायण को छुडाने में सफल हो पाई। शायद यहीं कारण है कि आज भी कलावा बांधते समय एक मंत्र सभी ब्राह्मण बोलते है…

येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः । येन त्वामि रक्षाप्रतिबद्धनामि रक्षे मा चल, मा चल।।

Krishna Bihari Mishra

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