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क्रिकेट के लिए दर्शक और अन्य खेलों में मुख्य अतिथि बनने को लेकर राज्यपाल पर उठे सवाल, अधिवक्ता अभय मिश्र ने पारंपरिक खेलों की उपेक्षा और क्रिकेट के बढ़ते व्यवसायिक वर्चस्व पर जताई चिंता

भारत में क्रिकेट की बढ़ती लोकप्रियता और उसके व्यवसायिक वर्चस्व को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता अभय मिश्र ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने राज्यपालों की क्रिकेट मैचों में दर्शक के रूप में मौजूदगी और फुटबॉल, तीरंदाजी सहित अन्य खेलों में मुख्य अतिथि के रूप में उनकी भूमिका की तुलना करते हुए खेलों के प्रति दोहरे दृष्टिकोण पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि जिस देश में क्रिकेट के लिए हजारों करोड़ रुपये का कारोबार हो रहा है, वहां भारतीय पारंपरिक खेलों को अपेक्षित महत्व नहीं मिल रहा है।

अभय मिश्र ने अपनी वेदना सोशल साइट पर शेयर किये हैं। अभय मिश्र ने अपने विचारों में झारखंड और उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों के राज्यपालों की क्रिकेट मैचों में मौजूदगी का उल्लेख करते हुए पूछा है कि आखिर ऐसा क्या बदलाव आया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे प्रमुख लोग क्रिकेट मैचों के दौरान दर्शक दीर्घा में बैठकर खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाते नजर आ रहे हैं?

क्रिकेट में दर्शक, दूसरे खेलों में उद्घाटनकर्ता

अधिवक्ता ने समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाले समाचारों के शीर्षकों का उदाहरण देते हुए क्रिकेट और अन्य खेलों के आयोजन में राज्यपालों की भूमिका के अंतर को रेखांकित किया है। उन्होंने कहा कि क्रिकेट मैचों के संदर्भ में अक्सर यह लिखा जाता है कि महामहिम राज्यपाल ने दर्शक दीर्घा से खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाया।

वहीं, फुटबॉल प्रतियोगिता के लिए यह शीर्षक सामने आता है कि मुख्य अतिथि राज्यपाल ने टूर्नामेंट का उद्घाटन किया। इसी तरह, तीरंदाजी प्रतियोगिता के दौरान राज्यपाल द्वारा तीर चलाकर उद्घाटन किए जाने की खबर प्रकाशित होती है। उनके अनुसार, इन उदाहरणों से यह सवाल पैदा होता है कि क्रिकेट को अन्य खेलों की तुलना में इतना अधिक महत्व क्यों मिल रहा है? क्या क्रिकेट के बड़े व्यावसायिक स्वरूप के कारण उसे विशेष प्राथमिकता दी जा रही है?

क्रिकेट के कारोबार में हजारों करोड़ रुपये का खेल

अधिवक्ता ने क्रिकेट के आर्थिक पक्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में क्रिकेट अब केवल मनोरंजन या खेल तक सीमित नहीं है, बल्कि एक विशाल व्यावसायिक उद्योग बन चुका है। इसमें इंडियन प्रीमियर लीग (आइपीएल), अंतरराष्ट्रीय मैच, टेलीविजन प्रसारण, डिजिटल स्ट्रीमिंग, विज्ञापन, प्रायोजन और खिलाड़ियों के प्रचार से जुड़ी गतिविधियां शामिल हैं।

उन्होंने WPP Media की Sporting Nation 2025  रिपोर्ट के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि वर्ष 2025 में भारत के खेल उद्योग का अनुमानित व्यावसायिक मूल्य 18,864 करोड़ रुपये था, जिसमें क्रिकेट की हिस्सेदारी करीब 89 प्रतिशत रही। उनके मुताबिक, क्रिकेट से जुड़े कारोबार का अनुमानित मूल्य लगभग 16,704 करोड़ रुपये है।

अधिवक्ता ने सवाल उठाया कि जब क्रिकेट से जुड़ी संस्थाएं इतने बड़े स्तर पर कारोबार कर रही हैं, तो आम जनता और अन्य खेलों के विकास के लिए उनका योगदान किस रूप में सामने आ रहा है? उन्होंने क्रिकेट के प्रति लोगों के जुनून और दूसरे खेलों के प्रति अपेक्षाकृत कम उत्साह को भी चर्चा का विषय बनाया।

राज्यपालों की मौजूदगी को लेकर उठाए सवाल

अधिवक्ता ने अपने विचारों में यह सवाल भी उठाया कि क्या विभिन्न राज्यों के राज्यपालों की क्रिकेट मैचों में बढ़ती मौजूदगी के पीछे कोई साझा पहल या निर्देश है? उन्होंने झारखंड और उत्तर प्रदेश सहित कुछ राज्यों के राज्यपालों की क्रिकेट मैच देखते हुए तस्वीरों का उल्लेख किया है।

उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के सार्वजनिक जीवन का जिक्र करते हुए पूछा कि क्रिकेट के प्रति शीर्ष राजनीतिक और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की यह सक्रियता अचानक इतनी अधिक क्यों दिखाई देने लगी है? हालांकि, उन्होंने किसी केंद्रीय निर्देश के होने का सवाल उठाया है, लेकिन इसके समर्थन में किसी आधिकारिक आदेश या दस्तावेज का उल्लेख नहीं किया है।

भारतीय पारंपरिक खेलों की उपेक्षा का आरोप

अधिवक्ता ने कबड्डी, खो-खो, तीरंदाजी, तलवारबाजी, निशानेबाजी और हॉकी सहित विभिन्न खेलों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय खेल परंपरा बेहद समृद्ध रही है। इसके बावजूद क्रिकेट के बढ़ते प्रभाव के बीच दूसरे खेलों को उतना व्यावसायिक समर्थन, प्रचार और लोकप्रियता नहीं मिल पा रही है, जितनी मिलनी चाहिए। उनका मानना है कि खेलों के विकास का आकलन केवल उनकी लोकप्रियता या उनसे होने वाली कमाई के आधार पर नहीं होना चाहिए। देश के पारंपरिक खेलों, स्थानीय प्रतिभाओं और खेल संस्कृति को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

अंग्रेजों के खेल से जुड़ी मानसिकता पर भी सवाल

अधिवक्ता ने क्रिकेट के औपनिवेशिक इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में क्रिकेट का प्रसार अंग्रेजों के शासनकाल में हुआ था। आजादी के बाद इस खेल ने देश में असाधारण लोकप्रियता हासिल की और एक बड़े उद्योग का रूप ले लिया। उन्होंने क्रिकेट के प्रति बढ़ते आकर्षण को सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी देखने की जरूरत बताई। उनके अनुसार, किसी राष्ट्र की पहचान उसकी सभ्यता, संस्कृति और अपनी परंपराओं को सुरक्षित रखने की क्षमता से भी जुड़ी होती है। अधिवक्ता ने चिंता जताई कि यदि विदेशी मूल के खेल को लगातार प्राथमिकता मिलती रही और भारतीय पारंपरिक खेलों की उपेक्षा होती रही, तो इसका असर देश की खेल संस्कृति पर पड़ सकता है।

खेलों में संतुलित प्रोत्साहन की जरूरत

अधिवक्ता के विचारों का केंद्रीय प्रश्न यह है कि क्या क्रिकेट की लोकप्रियता और उसके व्यावसायिक वर्चस्व के बीच दूसरे खेलों के लिए पर्याप्त अवसर और संसाधन उपलब्ध हैं? क्या संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की उपस्थिति सभी खेलों को समान रूप से प्रोत्साहित करने का माध्यम बन सकती है?

उनका कहना है कि क्रिकेट के प्रति लोगों का उत्साह अपनी जगह है, लेकिन भारतीय खेलों की विविधता और पारंपरिक विरासत की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। देश में खेल संस्कृति को मजबूत बनाने के लिए क्रिकेट के साथ-साथ कबड्डी, खो-खो, हॉकी, तीरंदाजी, फुटबॉल और अन्य खेलों को भी व्यापक समर्थन मिलना जरूरी है। अधिवक्ता ने अपने विचारों के अंत में कहा कि किसी भी राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान उसकी अपनी परंपराओं और विरासत से जुड़ी होती है। ऐसे में भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि क्रिकेट की लोकप्रियता के बीच उसके पारंपरिक खेल हाशिये पर न चले जाएं।

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