प्रियंका अब दुनिया में नहीं, पर उसने शाकद्वीपियों से सवाल पूछे हैं, जिसका जवाब किसी के पास नहीं

भास्कर दिल्ली की ओर से हमें 6 जून को सूचना मिली कि प्रियंका अब दुनिया में नहीं है। जैसे ही यह सूचना प्रसारित हुई, हम जैसे सैकड़ों लोग जो प्रियंका से कुछ महीने से भावनात्मक रुप से जुड़े हुए थे, जो ईश्वर से दिन-रात प्रार्थना कर रहे थे, कि वो जल्द ठीक हो जाये, फिर से अपने जीवन को गति दे सकें, उन्हें ऐसा लगा कि किसी ने उनके दिल पर बहुत बड़ा आघात किया हो।

भास्कर दिल्ली की ओर से हमें 6 जून को सूचना मिली कि प्रियंका अब दुनिया में नहीं है। जैसे ही यह सूचना प्रसारित हुई, हम जैसे सैकड़ों लोग जो प्रियंका से कुछ महीने से भावनात्मक रुप से जुड़े हुए थे, जो ईश्वर से दिन-रात प्रार्थना कर रहे थे, कि वो जल्द ठीक हो जाये, फिर से अपने जीवन को गति दे सकें, उन्हें ऐसा लगा कि किसी ने उनके दिल पर बहुत बड़ा आघात किया हो। प्रियंका को बचाने के लिए शाकद्वीपीय समाज ने क्या नहीं किया? जिससे जो बन पड़ सका, किया। किसी ने सिर्फ धन से, तो किसी ने मन से तो किसी ने तन, मन, धन तीनों से उसकी खुलकर सेवा की। दिल्ली की भास्कर संस्था ने तो प्रियंका को बचाने के लिए तन, मन, धन ही नहीं, अपना एक-एक समय उस प्रियंका के लिए कुर्बान किया।

हमें ये कहने में कोई दिक्कत नहीं कि जो दिल्ली के भास्कर संस्था के लोगों ने प्रिंयका को बचाने के लिए किया, वो कोई नहीं कर सकता था, क्योंकि हमारे आंखों के सामने ऐसे-ऐसे कई दृश्य गुजरे हैं,  जहां कुछ लोगों ने, संस्थाओं ने आर्थिक मदद की, पर अपनी सेवा नहीं दी, पर भास्कर संस्था के लोगों ने तो इससे उपर जाकर मदद की। मैं ईश्वर से प्रार्थना करुंगा कि भास्कर संस्था के लोगों में इसी प्रकार करुणा, दया और मानवीय मूल्य भर दें ताकि जब कोई व्यक्ति सेवा के लिए पुकारे, तो ये लोग इसी उदारता से सेवा के लिए निकल पड़ें।

मैं जानता हूं कि हवन करने में हाथ भी जलते हैं। सेवा करने में कई दिक्कतें आती है, समाज में बैठे कुछ निठल्ले लोग अपने-अपने दृष्टिकोण से इस सेवा को भी मापते हैं, और अनुचित कमेंट्स कर देते हैं, पर उस घृणात्मक कमेंट्स के बावजूद भी अगर किसी ने सेवा के लिए इतनी जागरुकता दिखाई तो हम इतने भी कृतघ्न नहीं कि उनकी इस सेवा को स्वीकार न करें, और सम्मान न दें। मैं तो कहूंगा कि दिल्ली के भास्कर वालों आपकी होली और आपकी सेवा तथा दूसरे जगह जाकर अपने बंधुओं को आगे बढ़ाने की जो सोच हैं, उसकी मुकाबला कोई नहीं कर सकता। आपको कोटिशः बधाई।

7 जून को ही पता चला कि भास्कर संस्था के अहम् सदस्य श्री गोपालाचारी भाई, उर्फ अनिल मिश्र जो एक अच्छे उद्ममी व व्यवसायी है, उन्होंने तीसरी कक्षा पास प्रियंका के भाई को पन्द्रह हजार रुपये मासिक पगार पर उसे नौकरी दे दी, आज के जमाने में भी भामाशाह सदृश लोग अपने यहां विद्यमान है, ये क्या कम हैं? भास्कर संस्था के प्रणव कुमार मिश्र की छलकती आंखे और शशि रंजन मिश्र द्वारा प्रियंका को स्वस्थ हो जाने के बाद उसकी रिहैबिलिटेशन की सोच तथा विवेकानन्द मिश्र द्वारा बार-बार प्रियंका के स्वास्थ्य संबंधी जानकारी का आदान-प्रदान, ये बताने के लिए काफी था कि भास्कर के लोगों ने मानवीय मूल्यों के लिए क्या किया? ये अलग बात है कि आज प्रियंका इस दुनिया में नहीं है, और उसकी रिहैबिलिटेशन की बात धरी की धरी रह गयी।

जिस दिन प्रियंका गुजरी, उसी दिन उसकी अंतिम क्रिया के लिए पांच हजार रुपये भास्कर संस्था द्वारा उसके परिवार को प्रदान करना तथा श्मशान घाट तक उसकी सेवा में शामिल रहना, उच्च कोटि के मानवीय मूल्यों को दर्शाता है। प्रियंका को बचाने से लेकर अंतिम यात्रा तक भास्कर संस्था ने जो किया, भला ऐसा करने का दावा भी कोई नहीं कर सकता। जब प्रियंका अपने इलाज के लिए सफदरजंग अस्पताल में जीवन-मौत से जूझ रही थी, तभी शाकद्वीपीय सहायतार्थ केन्द्र से जुड़े रामकृष्ण मिश्र और उनकी टीम, भास्कर संस्था नई दिल्ली, संज्ञा समिति गया, कोलकाता की शाकद्वीपीय संस्था, सार्वभौम शाकद्वीपीय ब्राह्मण महासभा झारखण्ड, राकेश कुमार मिश्र की सूर्य पूजा परिषद तथा अन्य कई शाकद्वीपीय संस्थाओं ने प्रियंका को बचाने के लिए आर्थिक मदद की, जिसकी सभी ने प्रशंसा की।

कौन जीवित रहेगा, या कौन मरेगा, इस पर किसी संस्था या व्यक्ति कोई दावा नहीं कर सकता पर बचाने का प्रयास तो कर ही सकता है, किसी ने कहा भी है कि मारनेवाला से बचानेवाला ज्यादा महान होता है, हम ऐसे दयालुओं शाकद्वीपीयों का भी अभिनन्दन करते हैं, जिन्होंने मानवीय मूल्यों को आज भी बचा कर रखा हैं, पर दुख इस बात का भी इस मानवीय मूल्यों के बीच कुछ ऐसे मुट्ठी भर अपने यहां असामाजिक तत्व भी है, जो इस सेवा में भी खोट निकालने में पीछे नहीं रहे, ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे, इससे ज्यादा मैं क्या कह सकता हूं?

मैं प्रियंका को कैसे भूल सकता हूं? बिहार के अखबारों के माध्यम से पता चला कि वह एसिड अटैक की शिकार हुई है, जल्द ही ये खबर आग की तरह फैली और देखते ही देखते सारे शाकद्वीपीय समाज में प्रियंका को बचाने के लिए लोग निकल पड़ें। भास्कर संस्था की सारी टीम उसी दिन से लग गई जब उन्हें इस बात की जानकारी मिली। ये लोग प्रतिदिन जाते, और प्रियंका का हाल चाल पुछते, सफदरजंग अस्पताल के डाक्टरों और नर्सों से भी उसकी बेहतर इलाज के लिए गुहार लगाते, पटना सूर्य पूजा परिषद के राकेश दत्त मिश्र की इस वक्त निभाई भूमिका को भला कौन भूल सकता है, उन्होंने केन्द्रीय मंत्री के पीए से बुलवाकर प्रियंका को बेहतर इलाज उपलब्ध हो, इसके लिए प्रबंध किया। बाद में जैसे-जैसे समय बीता, डाक्टरों द्वारा दिया गया बयान और फिर छन-छनकर आती कुछ बयानों से हृदय रो उठा, किस पर विश्वास करें और किस पर विश्वास न करें, शायद उसी दिन हमें लग गया था कि शायद प्रियंका के भाग्य में जीवन की रेखा समाप्त होने के कगार पर है।

आज प्रियंका नहीं है, पर प्रियंका ने अपने समाज से कुछ प्रश्न किया है, वह प्रश्न है कि आखिर ससुराल में बहुएं ही क्यों गरम पानी या एसिड अटैक की शिकार होती है, और दूसरा कोई क्यों नहीं होता? आखिर जो समाज आर्थिक मदद देने में इतनी रुचि दिखाता है, उसी समाज में ऐसी घटना क्यों घटती है? आखिर बेटियों-महिलाओं के साथ इतना बड़ा अन्याय क्यों? अगर भास्कर जैसी कोई संस्था सेवा कर रहा है, उस पर लांछन क्यों? जब आप खुद कुछ अच्छा काम नही करते और दूसरा कोई अच्छा काम कर रहा हैं, तो आप उसे गालियों से क्यों नवाजते? आखिर अपने समाज में जिस कोख से लोग जन्म लेते है, उसी कोख को गालियों से क्यों नवाज रहे हैं, आखिर अपने समाज में बेटियों और महिलाओं को सम्मान कब मिलेगा? क्या इन ज्वलंत प्रश्नों के जवाब अपना समाज कभी दे पायेगा?

Krishna Bihari Mishra

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