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राजनीतिक दल नहीं चेतें, तो वोट की राजनीति बिहार ही नहीं देश को भी बर्बाद कर देगा

बिहार के अररिया में राजद की मिली जीत से बौराये अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ लोगों द्वारा “पाकिस्तान जिंदाबाद” और “भारत तेरे टूकड़े होंगे” के लगे नारे और उधर दरभंगा में नरेन्द्र मोदी चौक बनवाने वाले एक शख्स की भीड़ द्वारा गर्दन काट कर मौत की नींद सुला देने की घटना बदलते बिहार की एक नई कहानी बयां कर रही है।

हो सकता हैं लालू प्रसाद यादव इस जीत से बहुत खुश हो जाये और उनकी पार्टी के कार्यकर्ता फूले नहीं समा रहे हो, पर देश को दांव पर लगाकर, देश की समरसता को प्रभावित करके अगर कोई खुशियां मनाता हैं, तो वह सबसे बड़ा देशद्रोही हैं, और उसे ऐसे ही छोड़ देना देश के लिए खतरा है।

बिहार में किसी की भी सरकार हो, या केन्द्र में किसी की भी सरकार हो, या आनेवाले समय में किसी की भी सरकार बन जाये, देश की एकता व अखंडता से जो सौदा करें, वह पार्टी या वह नेता, उतना ही बड़ा गुनहगार है, जितने बड़े दोषी देश को बर्बाद करने में लगे आतंकवादी है।

आश्चर्य की बात है कि इतनी बड़ी घटना घट गई पर राजद के किसी भी जिम्मेदार नेता की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, इसका मतलब क्या समझा जाये, देश की जनता व राज्य की जनता जानना चाहती हैं, उत्तर प्रदेश व बिहार के कुछ अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में इस प्रकार की घटनाएं होना अब सामान्य सी बात है, पर इसको ढील देना किसी भी प्रकार से ठीक नहीं।

देश के नेताओं को यह समझ लेना चाहिए कि देश जब रहेगा तभी वे वोट की राजनीति भी कर लेंगे, जब देश नहीं रहेगा, तो फिर वोट की राजनीति करनेलायक भी वे नहीं रहेंगे, अगर नहीं भरोसा हैं तो कम से कम बांगलादेश व पाकिस्तान घुमकर थोड़े दिन के लिए चले आइये।

जो बिहार के सीमावर्ती इलाकों की स्थितियां हैं, उससे साफ लगता है कि आनेवाले समय में इन इलाकों में जिस प्रकार की परिस्थिति जन्म ले रही हैं, वहां से आनेवाले समय में भाजपा को छोड़ ही दीजिये, राजद और जदयू के लोग भी जीत के लिए तरस जायेंगे और फिर यहीं नेता और इनके परिवार नाक रगड़ते नजर आयेंगे और फिर कुछ नहीं कर पायेंगे और वहां वहीं होगा, जो ये मुट्ठी भर देशद्रोहियों का दल फिलहाल अभी नारा लगाकर ही संतोष कर ले रहा हैं।

खुशी इस बात की है, राज्य सरकार हरकत में आई और इससे संबंधित दो लोगों को गिरफ्तार कर ली हैं, पर अभी भी बिहार की जनता राजद के प्रबुद्ध नेताओं की ओर टकटकी लगाकर नजर रखी हैं कि वे इस मुद्दे पर क्या बोलते हैं, अगर ये नहीं बोलते हैं तो हमें नहीं लगता कि बिहार की जनता इतनी मूर्ख हैं, जो इनके मौन स्वीकृति लक्षणम् को नहीं पहचान रही होगी।