बदल गई बिहार के गांवों-मुहल्लों-शहरों में भोज-भात की व्यवस्था, पुराने आयटम पूरी तरह समाप्त

पहले बिहार के गांवों-कस्बों, मुहल्लों और शहरों में, किसी के घर में छट्ठी, अन्नप्राशन, मुंडन, जनेऊ, सत्यनारायण की पूजा, विवाह अथवा श्राद्ध होता, तो हर घर में एक ही प्रकार का आयटम दिखाई देता और सभी मिलकर जेवनार का आनन्द लेते, कोई भेदभाव नहीं, कोई ज्यादा दिखावा नहीं, बस सभी को पता है कि जहां जीमने जा रहे है, वहां किस प्रकार के भोजन उपलब्ध होंगे।

पहले बिहार के गांवों-कस्बों, मुहल्लों और शहरों में, किसी के घर में छट्ठी, अन्नप्राशन, मुंडन, जनेऊ, सत्यनारायण की पूजा, विवाह अथवा श्राद्ध होता, तो हर घर में एक ही प्रकार का आयटम दिखाई देता और सभी मिलकर जेवनार का आनन्द लेते, कोई भेदभाव नहीं, कोई ज्यादा दिखावा नहीं, बस सभी को पता है कि जहां जीमने जा रहे है, वहां किस प्रकार के भोजन उपलब्ध होंगे। जीमनेवाले जब भोजन जीमने पहुंचते, उसके पूर्व ही मुख के अंदर बसने वाले एंजाइम्स अपना काम कर चुके होते, और फिर शुरु होता भोजन का स्वादानुसार  ग्रहण करना और फिर उसे ग्रास नली होते हुए आमाशय तक पहुंचा देना।

हमें याद है, क्या बड़ा, क्या छोटा। सभी के घरों में पुड़ी, कचौड़ी, बुंदिया, आलूदम, बैगन-पालक की मिक्स सब्जी, कद्दू का रतवा, टमाटर की चटनी और अंत में एक छोटी सी प्याली में दही का प्रबंध हो जाता। जिनके घर में भोज का आयोजन होता, वहां पहले से ही दक्षिण बिहार (अब झारखण्ड) से आनेवाले पत्तों के बने पत्तल का प्रबंध कर लिया जाता। कुम्हार के घर से पानी पीने के लिए चुक्कर (कोई-कोई रामकोरवा भी कहते), आलूदम चलाने के लिए बड़ी प्याली और दही चलाने के लिए छोटी प्याली आ जाया करता। जैसे – जैसे समय बदला, सबसे पहले कुम्हार के यहां से आनेवाले चुक्कर, आलूदम और दही चलाने के लिए प्याली बाजार से गायब हो गये और उनके स्थान पर प्लास्टिक के बने प्यालियां और ग्लास ने स्थान ले लिये।

इसी प्रकार बदलाव का ऐसा बयार बहा कि सबसे पहले कचौड़ी को पत्तल से हटाया गया और उसके जगह पर पुलाव ने स्थान बना लिया, हालांकि पूर्व में बिहार में कच्ची-पक्की सिस्टम के तहत भात या पुलाव का प्रचलन हिन्दू समुदाय में न के बराबर होता था। भात केवल लोग अपने गोतियों में ही खाते और खिलाते, पर पुलाव ने सारे सिस्टम को ही धत्ता बता दिया। इसी प्रकार आलू दम की जगह मिक्स भेज और बैगन-पालक की जगह पनीर की सब्जी ने स्थान ले लिया। मैंदे की बुंदिया सदा के लिए समाप्त हो गई और उसका स्थान रसगुल्ले और गुलाबजामुन ने ले लिया, दही से बनी रायता और टमाटर की चटनी दूर की कौड़ी हो गई और फिर इन सभी के जगह पर आइसक्रीम, चाट और पानी-पुड़ी ने ले लिया और इस प्रकार बिहार का प्रचलित आलूदम, बैगन-पालक की मिक्स सब्जी, कचौड़ी, बुंदिया और रायता सदा के लिए विलुप्त हो गये और लोग भूल गये, बिहार के इस लोक भोज को, जो सब के दिलों पर राज किया करती थी।

जब किसी के घर में भोज के आयोजन होते तो पुआल के छोटे-छोटे या चादरों के दोहरे-चोहरे करके बैठने के लिए व्यवस्था की जाती। बड़े प्रेम से गांव-मुहल्ले के लोग अपने चाहनेवालों के आगे पत्तल बिछाते, और भोजन की सामग्रियों को बड़े प्रेम से परोसते। स्थिति ऐसी हो जाती कि जिनको खाना था मात्र दो पुड़ी, वे प्रेम और आनन्द में चार से छ-पुड़िया कैसे अंदर घुसा लिये? पता ही नहीं चलता। यहीं नहीं छोटे-छोटे बच्चों का समूह हाथ में जल भरे जग को लेकर चलता और बोलता – गंगाजल, गंगाजल। लोग बडे प्रेम से बच्चे को बुलाते और चुक्कर में उस सामान्य से विशेष हो गये गंगाजल को बडे प्रेम से ग्रहण करते और इस प्रकार प्रेम का रस ऐसा घुलता कि उस प्रेम में सभी आत्म विभोर हो उठते, पर आज काफी बदलाव आया है।

भोज आज भी आयोजित होते है, जिन्होंने भोज का आयोजन किया, उन्हें भी इस बात का मतलब होता नहीं कि किसने खाया या किसने नहीं खाया, उन्होंने खाने-पीने की व्यवस्था कर दी, बस उनका काम हो गया, इधर जो लोग आये, वे आयोजनकर्ता को लिफाफा थमाया, जरुरत पड़ा तो खाये और नहीं तो चलते बने, कहीं कोई प्रेम नहीं, बस सिर्फ और सिर्फ दिखावा। अगर किसी घर वाले ने पूछ लिया कि खाना कैसा बना? तो आगंतुक बड़े ही नाटकीय ढंग से दांत निपोरते हुए कहते कि खाना बहुत अच्छा बना है, पर सच्चाई तो दोनों जानते है, कि खाना कैसा बना है?

कुल मिलाकर देखे तो अब हमारा समाज दिखावेपन पर चला गया, न तो प्रेम भोजन कराने में दिखता है और न ही भोजन ग्रहण करने में, ऐसे में प्रेम कैसे पनपेगा? रिश्ते कैसे बढ़ेंगे? सोचने और चिन्तन करने की जरुरत है? देश बदल रहा है, गांव-मुहल्ले बदल रहे है, समाज बदल रहा है, पर इतना भी मत बदल जाइये कि आप क्या है? परिवार क्या है? समाज क्या है? इसकी अवधारणा ही समाप्त हो जाये? क्योंकि बीते हुए दिन लौटते नहीं और जो बदल गये, उन्हें फिर से समाज में आरोपित करना, इतना आसां नहीं, इसलिए ध्यान रखिये कि बदलने के चक्कर में कहीं खुद को न खो दें?

Krishna Bihari Mishra

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