नीतीश के डर से थर-थर कांपते हैं पटना के अखबार और पत्रकार, बेइज्जत होने के बावजूद भी अपनी खबर नहीं छाप पाते

कल बिहार विधानसभा के सचिव के कक्ष में राम विलास पासवान का नामजदगी का पर्चा दाखिल करने में शामिल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, अचानक प्रेस-फोटोग्राफरों, कैमरामैनों पर भड़क उठे, फिर क्या था? उधर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भड़के और इधर पुलिसकर्मियों ने अपना काम कर दिया, धक्के मारकर तथा कुछ को गरदनिया देकर बिहार विधानसभा के सचिव के कक्ष से उन्हें निकाल बाहर कर दिया गया।

कल बिहार विधानसभा के सचिव के कक्ष में राम विलास पासवान का नामजदगी का पर्चा दाखिल करने में शामिल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, अचानक प्रेस-फोटोग्राफरों, कैमरामैनों पर भड़क उठे, फिर क्या था? उधर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भड़के और इधर पुलिसकर्मियों ने अपना काम कर दिया, धक्के मारकर तथा कुछ को गरदनिया देकर बिहार विधानसभा के सचिव के कक्ष से उन्हें निकाल बाहर कर दिया गया।

हम आपको बता दें कि ये प्रेस फोटोग्राफर और कैमरामैन कोई लखपति या करोड़पति नहीं, बल्कि सामान्य लोग हैं, जिनका जीविकोपार्जन इसी से चलता है। इनकी हालत ये है कि बार-बार बेइज्जत होने के बावजूद भी ये चूं तक नही बोलते, गर्दन झूकाकर अपना जमीर और इज्जत दोनों को घर के ताखे पर रखकर अपने काम को अंजाम देते रहते हैं।

आपको याद होगा कि कुछ साल पहले बिहार विधानसभा परिसर में ही नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के सुरक्षाकर्मियों ने एक चैनल के कैमरामैन की ठुकाई कर डाली थी, कुछ दिन पहले चुनाव के दिन ही तेज प्रताप यादव के लोगों ने एक पत्रकार की ठुकाई कर डाली थी, यानी आप कह सकते है कि बिहार में नेताओं और पत्रकारों के बीच कुश्ती चलती रहती है, नेता समय-समय पर पत्रकारों-कैमरामैनों को ठुकवाते रहते हैं और ये पेट व परिवार के लिए अपने जमीर को बेचकर, पत्रकारिता में लगे रहते हैं, हाल ही में सिवान में आपको ज्ञात होगा कि हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान के ही एक पत्रकार की हत्या कर दी गई थी, ये हत्या किसने करवाई और क्यों करवाई, सभी जानते हैं।

और अब बात कल की घटना की। नीतीश कुमार के स्वभाव के बारे में जो लोग जानते हैं, वे यह भी खूब जानते है कि उन्हें कोई सीख दें, उन्हें बर्दाश्त नहीं, चाहे वह पत्रकार ही क्यों न हो? उनको कोई ज्ञान दे, वह भी बर्दाश्त नहीं। उन्हें कोई राजनीतिक सीख दें, तो वे तो उसका जीना हराम कर दें। वे जिससे दुश्मनी रखते हैं, उन्हें किसी भी हालत में बिना सबक सिखायें रहते नहीं, भले ही उसमें नीतीश कुमार का शत प्रतिशत ही गलती क्यों न हो?

जरा देखिये, कल की घटना, चमकी बुखार के दौरान मरे 150 बच्चे और उस पर हुई मीडिया रिपोर्टिंग से खफा नीतीश एक मौका तलाश रहे थे कि वे मीडिया को सबक सिखाएं, उन्हें कल मौका भी मिला और वे सारा कसर निकाल लिये, वे सबसे पहले अपने तेवर दिखाकर, कैमरामैनों को मर्यादा में रहने का पाठ पढ़ाया, जैसे लगता हो कि उन्होंने कभी जिंदगी में मर्यादा तोड़ी ही न हो, और उन कैमरामैनों और छोटे फोटोग्राफरों को उस बात के लिए जलील करते हुए, गरदनिया देकर बाहर करवाया, जिनमें उनकी कोई गलती ही नहीं थी।

सवाल तो यह भी उठता है कि जिस नीतीश कुमार ने इन छोटे फोटोग्राफरों और कैमरामैनों पर अपना तेवर दिखाया, उनका तेवर उस वक्त कहा था जब आइसीयू में जाकर अजीत अंजूम और आजतक की एक महिला पत्रकार ने मेडिकल नियमों का उल्लंघन करते हुए रिपोर्टिंग ही नहीं की, बल्कि सेवारत डाक्टरों को उनके काम करने में बाधा पहुंचाई, होना तो यह चाहिए था कि उन्हें भी वे कानून का पाठ पढ़ाते, पर कहा जाता है न कि ज्यादातर लोग बकरियों और बकरों की ही बलि चढ़ाते हैं, कभी किसी ने सिंह की बलि पड़ते हुए देखी है।

इसलिए नीतीश कुमार चमकी बुखार के बाद मीडिया द्वारा जिस प्रकार उनके उपर कीचड़ उछाला गया, उसका बदला लेने के लिए वे आतुर थे, और उन्होंने इसका बदला इस रुप में लिया और नीतीश का भय अखबारों पर यह दिखा कि पटना से प्रकाशित किसी अखबार ने अपने ही भाइयों, अपने ही फोटोग्राफरों, अपने ही कैमरामैनों की हुई इस बेइज्जती का खबर तक नहीं बनाया और न ही नीतीश कुमार को कटघरे में रखने का प्रयास किया।

राजनीतिक पंडित बताते है कि पटना से प्रकाशित किस अखबार या पत्रकार में हिम्मत है कि नीतीश को आइना दिखाये, क्या उसे नौकरी प्यारी नहीं है, या उसे पटना में अखबार नहीं चलाना है। पटना से ज्यादा प्रकाशित अखबार नीतीश भक्ति में लगे हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे दिल्ली-मुंबई-हैदराबाद आदि नगरों से संचालित विभिन्न चैनल मोदी भक्ति में डूबे हैं, यहीं कारण है कि नीतीश के भय से थर-थर कांपते इन अखबारों और पत्रकारों ने रामविलास पासवान के नामजदगी का पर्चा दाखिल का खबर तो बनाया, पर अपने ही भाइयों की हुई बेइज्जती की खबर को जगह ही नहीं दी, और न ही नीतीश के खिलाफ एक शब्द मुंह से निकाला।

राजनीतिक पंडित तो यह भी बताते है कि कभी यही भक्ति, लालू के प्रति भी दिखती थी, जब लालू प्रसाद के आगे-पीछे ये अखबार और मीडिया के लोग गणेश परिक्रमा करते रहते थे, चूंकि अब लालू के सितारे गर्दिश में हैं, इसलिए उनकी न चलकर, अब नीतीश की चलती है, और नीतीश इसके बदले पटना के पत्रकारों को कभी-कभार अपने आवास पर बुलाकर चाय पिला देते हैं या कुछ हल्का-फुल्का काम करवा देते है, जिससे इन पत्रकारों-अखबारों को लगता है कि उनकी जीवन धन्य हो गया और रही बात इन छोटे पत्रकारों की तो इनकी इज्जत रहे या न रहे, कौन सा पहाड़ टूट जायेगा?

Krishna Bihari Mishra

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