तो क्या ऐसी स्थिति हो गई कि अब भगवान भी झारखण्ड को नहीं सुधार सकते

जब नेता, कवियों और साहित्यकारों की भाषा बोलने लगे, तो सामान्य व्यक्ति को आश्चर्य लगना स्वाभाविक है। झारखण्ड में सभी जानते है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास और खाद्य आपूर्ति मंत्रालय संभाल रहे सरयू राय के बीच छत्तीस का आंकड़ा है। कोई ऐसा सप्ताह नही बीता है, जब सरयू राय, खुद की सरकार को अपने बयान से कटघरे में न खड़ा किया हो, हालांकि उनके मंत्रालय का भी चेहरा कोई साफ नहीं रहा है।

जब नेता, कवियों और साहित्यकारों की भाषा बोलने लगे, तो सामान्य व्यक्ति को आश्चर्य लगना स्वाभाविक है। झारखण्ड में सभी जानते है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास और खाद्य आपूर्ति मंत्रालय संभाल रहे सरयू राय के बीच छत्तीस का आंकड़ा है। कोई ऐसा सप्ताह नही बीता है, जब सरयू राय, खुद की सरकार को अपने बयान से कटघरे में न खड़ा किया हो, हालांकि उनके मंत्रालय का भी चेहरा कोई साफ नहीं रहा है। संतोषी की भूख से हुई मौत के बाद, वे स्वयं को भी बेदाग घोषित करना चाहे, तो यह संभव नहीं है।

इन दिनों वे सोशल साइट पर कुछ दार्शनिक अंदाज में बाते लिख रहे हैं, जिसे पढ़कर सामान्य लोगों को समझते देर नहीं लग रही कि उनका निशाना किस ओर है। हाल ही में उन्होंने अपनी एक किताब का लोकार्पण बिहार जाकर, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथों कराया, जबकि उनके किताब का लोकार्पण झारखण्ड में ही शानदार तरीके से हो सकता था, पर झारखण्ड में रहकर भी, उनका बिहार प्रेम तथा नीतीश कुमार के प्रति समर्पण की भावना स्पष्ट रुप से झलकता है।

जो लोग बिहार की राजनीति में दिलचस्पी रखते है, वे सरयू राय के बिहार प्रेम को नजरंदाज नहीं कर सकते। उन्होंने हाल ही में रघुवर सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सुधारने के साथ-साथ सुधरने का भी अभ्यास हो, तभी बात बन सकती है, प्रसिद्ध उक्ति है – करत-करत अभ्यास ते, जड़मत होत सुजान, रसरि आवत-जात ते, सिल पर पड़त निशान, अर्थात् दिन-प्रतिदिन के अभ्यास से एक अल्पज्ञानी भी विद्वान हो सकता है, ठीक उसी प्रकार लगातार पत्थर पर रस्सियों के रगड़ खाने से पत्थर पर भी दाग पड़ जाते हैं।

सरयू राय का सर्वाधिक मारक बयान है, जो उन्होंने अपने सोशल साइट पर लिखा है, वे कहते हैं कि अतार्किक फरमान, असंबंध बयान, अवैज्ञानिक सोच, अनावश्यक दिखावा में से कोई भी एक न्यस्त स्वार्थी तत्वों का पृष्ठ पोषण करने तथा शासन व्यवस्था को पंगु एवं गैरजिम्मेदार बनाने के लिए पर्याप्त है, ये सभी यदि कहीं एक साथ मिल जायें तो भगवान भी सुधार में मददगार बनने के लिए पहले सौ बार सोचेंगे। इसका मतलब है कि झारखण्ड इस हालात में पहुंच गया कि अब भगवान भी झारखण्ड को नहीं सुधार सकते।

अगर ऐसी स्थिति है, तो इसे मार्ग पर लाने की जिम्मेवारी किसकी है? सरयू राय यह भी बता देंते, तो ज्यादा अच्छा रहता, या इस स्थिति में झारखण्ड को लानेवाला कौन है? ये भी बता देते तो झारखण्ड की जनता आनेवाले लोकसभा व विधानसभा चुनाव में चेत जाती, पर ये केवल बयान दे देने से न तो सरयू राय का भला हो सकता है और न ही झारखण्ड का, ऐसे में सरयू राय बताये कि कैसे झारखण्ड को भगवान मदद करेंगे? क्योंकि उनके बयान काफी मायने रखते है, झारखण्ड के लिए, क्योंकि वे राज्य में संसदीय मंत्रालय को भी संभाल रहे हैं। उनकी बात को नजरंदाज तो कोई कर ही नहीं सकता, और अगर कर रहा हैं, तो ये दुर्भाग्य है।

Krishna Bihari Mishra

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साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी जानबूझकर किया गया नाटक था : अशोक वाजपेयी

Mon Dec 4 , 2017
वरीय साहित्यकार अशोक वाजपेयी बहुत अच्छा नाटक कर लेते हैं, हम सभी को उनके नाटकों से सीख लेना चाहिए कि कौन सा नाटक कब और कैसे करना चाहिए?  खासकर साहित्यकारों को तो जरुर सीख लेनी चाहिए कि वे नाटकों का कैसे सदुपयोग कर सकें। खुद अशोक वाजपेयी ने रांची में एक अखबार और टाटा कंपनी द्वारा आयोजित झारखण्ड लिटरेरी मीट में स्वीकार किया कि साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी जानबूझकर किया गया नाटक था।

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