सस्टेनेबल नहीं, ‘सनातन विकास’ मॉडल से ही अगली पीढ़ी की भलाई संभवः सरयू राय
जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने पहले पहाड़ और नदियों को बचाने, फिर विकास करने की बात कही है। उन्होंने कहा कि आज का मॉडल थोड़ा दूसरे किस्म का है। आज विकास खूब किया जा रहा है और कभी संभव हुआ तो पहाड़ और नदियों को बचाने की बात की जा रही है। दरअसल, आज वाला विकास का मॉडल विनाश का मॉडल है। उन्होंने माना कि विकास का काम जरूरी है लेकिन वो ऐसा विकास हो, जो चरैवेति चरैवेति के सिद्धांत पर हो। पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहे और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाधन छोड़े। इस विकास के मॉडल को उन्होंने ‘सनातन विकास’ का नाम दिया।
यहां मोतीलाल नेहरु पब्लिक स्कूल के ऑडिटोरियम में राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन के समापन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने कहा कि कई लोगों ने जानना चाहा कि इतने कानून होते हुए नए कानून की जरूरत क्या है। पुराने कानून लागू क्यों नहीं होते। हम लोग रोज इस स्थिति से दो-चार होते हैं। पर्यावरण की छोड़िए, सामान्य प्रसासन में जो कानून पहले से बने हुए हैं, वो लागू नहीं होते। जो लागू होते हैं, वो कानून की मूल भावना के विपरीत भावना से ही लागू होते हैं। ये विडंबना है।
सरयू राय ने कहा कि सरकार ने भारी भरकम कानून बनाए हैं। उन्हीं के आलोक में विकास और पर्यावरण के संबंधों की हम लोग मीमांसा करते हैं। कुछ दिन पूर्व भारत के मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी कर दी कि पर्यावरण का काम करने वाले बताएं कि उन्होंने विकास का कहां समर्थन किया। ऐसी टिप्पणियों पर जनमानस के बीच में हमें सफाई भी देनी चाहिए। जो पर्यावरण की बात करते हैं, वो विकास के दौरान होने वाली ऐसी घटनाएं होती हैं जो समाज में प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, जिस नाते कानून बनाए गए हैं, कानून के असली उद्देश्य पूर्ण हों।
उन्होंने कहा कि विकास हो, लेकिन एकांगी न हो। इन दिनों सस्टेनेबल डेवलपमेंट की बात हो रही है। भारत सरकार ने 2030 तक सस्टेनेबल डेवलपमेंट का लक्ष्य रखा है। इतने दिनों में डेवलपमेंट को सस्टेनेबल बनाने के लिए कुछ होता दिख नहीं रहा। हमें लगता है कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट के बदले अगर सनातन डेवलपमेंट की बात करें तो बेहतर होगा। सनातन का अर्थ क्या है-नित्य नूतन, चिर पुरातन। शुरुआती दौर से जो विकास के कार्य हो रहे हैं, हमें उन्हें आगे बढ़ाना है। उसमें कोई खामी दिखे तो उसे दूर करना है। इस तरह से विकास की धारा चलती रहती है। विकास में दिशा में कोई अचानक परिवर्तन न करे।
श्री राय ने कहा कि सनातन विकास की बात इसलिए आई क्योंकि शुरुआती दौर से चले आ रहे विकास कार्य को अनंत काल तक चलाना है। पुरातन विचार भी यही है। उन्होंने कहा कि पहले वन विभाग के लोग उन्हें अवसर विशेष पर बुलाते थे और वह जाते भी थे। जब से उन्होंने पूछना शुरु किया कि हमारा-आपका इस दिवस विशेष के प्रति कर्तव्य क्या है, उन्होंने बुलाना ही बंद कर दिया।
उन्होंने कहा कि पहले के कानून लागू नहीं हो रहे हैं और नया कानून हम लोग बनाने के लिए प्रयासरत हैं। नए कानून से कुछ और नहीं होगा तो जनता के हाथ में एक और हथियार आ जाएगा। वो न्यायालय का दरवाजा तो खटखटा सकते हैं। हम भी विकास चाहते हैं। लेकिन हम जो विकास चाहते हैं, वो ऐसा विकास हो जिससे प्राकृतिक संसाधनों के अस्तचित्व पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े।
माई कह कर कमाई करेंगे तो न नदी बचेगी, न पहाड़ः राजेंद्र सिंह
मैग्सेसे पुरस्कार विजेता जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा है कि माई कह कर कमाई करेंगे तो न नदी बचेगी, न पहाड़। नदी और पहाड़ को इकोनॉमिक इन्फ्रास्ट्रक्चर मानना गलत है। दुर्भाग्य ये कि आज भारत के विकास में प्राकृतिक संसाधनों को इसी नजरिये से देखा जा रहा है।
यहां मोतीलाल नेहरु पब्लिक स्कूल के ऑडिटोरियम में राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन के समापन समारोह में बतौर अध्यक्ष उन्होंने कहा कि भारत सरकार का एजेंडा है रेयर मैटेरियल को ज्यादा से ज्यादा निकालना। हम लोग जिस कानून को लेकर चल रहे हैं, वह कहता है कि यह काम नहीं करना है। हमें समझ लेना चाहिए कि भारत सरकार का रास्ता और हमारा रास्ता क्या है?
राजेंद्र सिंह ने कहा कि आज जमशेदपुर घोषणा पत्र जारी हो गया है। अब आपको अपने घर, मोहल्ले आदि में इसके संबंध में लोगों से चर्चा करनी है ताकि कानून बनवाने में मदद मिले। हम लोगों से मिलेंगे। आप भी लोगों से मिलें। ड्राफ्ट भर बना देने से कानून नहीं बन जाएगा। जलपुरुष ने कहा कि कल (रविवार) वह बेगलुरू जा रहे हैं। वहां उन्होंने एक सम्मेलन बुलाया है। उस सम्मेलन में इसी कानून पर चर्चा की जाएगी। उसमें कई विधायकों को भी आमंत्रित किया गया है।
उन्होंने कहा कि इस कानून के लिए एक माहौल बनाने की जरूरत है। इसके लिए हमें सोशल मीडिया, मीडिया का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए। संवाद बनाएं। सांसदों-विधायकों से भी संवाद करें। इस कानून के लिए लोग यात्राएं कर सकते हैं। शिक्षण संस्थानों के लोग इसमें ज्यादा प्रभावी हो सकते हैं। वो विद्यार्थियों को मोटिवेट कर सकते हैं। गांवों में, पंचायतों में जाएं लोग। वह भी जाएंगे। अब उनका कोई एजेंडा नहीं है, सिवाय इस कानून को बनाने का।
श्री सिंह ने कहा कि एक तरफ पर्यावरण और हमारा भविष्य है। दूसरी तरफ हमारा देश, संस्कृति और प्रकृति है। इन दोनों के रिश्तों को जबसे हमने समझना छोड़ दिया है, तब से हम नीचे की तरफ जा रहे हैं। भारत में जब तक संस्कृति और प्रकृति के योग से विकास हो रहा था, तब भारत का जीडीपी 32 प्रतिशत था। यह मात्र 200 साल पुरानी बात है। जब से विकास का यह नया मॉडल आया है, हमारे ज्ञान का विस्थापन हो गया है। इस विकास में विनाश है।
