महाराष्ट्र के किसानों के इस अहिंसक आंदोलन से सब को सबक लेना चाहिए

आखिर किसानों ने अपना आंदोलन वापस ले ही लिया। पूरे देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की नजर किसानों के इस आंदोलन की तरफ थी। किसानों के इस शांतिप्रिय आंदोलन को सभी का समर्थन प्राप्त था। ज्यादातर महाराष्ट्र के लोगों ने इसमें रुचि दिखाई, किसानों का जत्था जैसे-जैसे मुंबई की ओर बढ़ रहा था, महाराष्ट्र के लोगों का समर्थन उन्हें मिलता चला गया, कई जगहों पर स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों व नागरिकों ने उनके लिए खाने-पीने तक की व्यवस्था कर दी।

आखिर किसानों ने अपना आंदोलन वापस ले ही लिया। पूरे देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की नजर किसानों के इस आंदोलन की तरफ थी। किसानों के इस शांतिप्रिय आंदोलन को सभी का समर्थन प्राप्त था। ज्यादातर महाराष्ट्र के लोगों ने इसमें रुचि दिखाई, किसानों का जत्था जैसे-जैसे मुंबई की ओर बढ़ रहा था, महाराष्ट्र के लोगों का समर्थन उन्हें मिलता चला गया, कई जगहों पर स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों व नागरिकों ने उनके लिए खाने-पीने तक की व्यवस्था कर दी, जिससे केन्द्र ही नहीं राज्य सरकार को भी लगा कि इस आंदोलन को दबाना बूते से बाहर हैं। अच्छा रहेगा कि किसानों से वार्ता की जाये और उनकी सभी जायज मांगों को मान लिया जाये।

और सरकार ने वही किया भी, इसलिए ऐसे में किसानों और महाराष्ट्र सरकार दोनों की प्रशंसा करनी होगी, एक पक्ष की प्रशंसा इसलिए करनी होगी, कि उसने हिंसा का सहारा न लेकर अपने मांगों के लिए अहिंसक आंदोलन चलाया और दूसरे पक्ष की प्रशंसा इसलिए करनी होगी कि उसने इनकी मांगों को लेकर प्रतिबद्धता दिखाई, नहीं तो ज्यादातर मामलों में इस प्रकार के आंदोलन हिंसा की भेंट चढ़ जाते हैं  और न तो आंदोलन करनेवालों को फायदा होता हैं और न सरकार कुछ कर पाती हैं, हां इतना जरुर होता हैं कि अखबारों व चैनलों में ये खबरें सुर्खियां जरुर बन जाती हैं।

हम आपको बता दे कि किसानों ने 7 मार्च से अपना आंदोलन शुरु किया था जो 12 मार्च को खत्म हो गया। खुशी इस बात की है कि किसानों की समस्या खत्म करने की पहल स्वयं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस ने की, उनकी अध्यक्षता में महाराष्ट्र सरकार और किसानों के प्रतिनिधिमंडल के बीच बैठक हुई और किसानों की सारी बातें मान ली गई। मुख्यमंत्री ने एक लिखित पत्र भी जारी किया। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रुप से कहा कि वे आंदोलन के समय से ही किसानों से टच में थे, और सम्मानपूर्वक सभी समस्याओं के हल निकालने के पक्ष में थे। राज्य सरकार ने किसानों से वादा किया है कि अगले छः महीने में ही सारी मांगों को मूर्त्तरुप दे दिया जायेगा। इधर आंदोलन समाप्त हुआ और नासिक से निकले इन किसानों को वापस लौटने के लिए एक स्पेशल ट्रेन भी चलाया गया।

हालांकि इस किसान आंदोलन को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की गई थी, पर किसानों ने अच्छा किया कि इसे राजनीतिक रंग नहीं लेने दिया, वरिष्ठ पत्रकार अनिल सिन्हा ने अपने फेसबुक पर इस किसान लांग मार्च के बारे में लिखते हुए कहा है कि किसानों के लांग मार्च ने सच में इतिहास बना दिया। उन्होंने लोकतंत्र और अहिंसा की ताकत दिखा दी। छह दिनों तक अनुशासित ढंग से की गई उनकी यात्रा का ऐसा असर हुआ कि मुंबई के लोग उनकी सेवा में जुट गये। मुंबई में मोर्चे तो आते रहते हैं और महानगर के लोग उन पर शायद ही ध्यान देते हैं, लेकिन इस यात्रा ने उनका दिल जीत लिया। लोगों के इस समर्थन को मुख्यमंत्री फड़णवीस ने पहचानने में देर नहीं की और उनकी ज्यादातर मांगे मान ली। अखिल भारतीय किसान महासभा को बधाई। बस्तर और देश के दूसरे हिस्सों में हथियारबंद आंदोलन में लगे लोगों को एक बार जरुर सोचना चाहिए कि इतने सालों में उन्होंने क्या हासिल किया।

और अंत में अखिल भारतीय किसान महासभा, मार्क्सवादी कम्यूनिष्ट पार्टी की किसानों से संबंधित एक इकाई हैं, और कई जगहों पर ये इकाई मृतप्रायः हैं, पर महाराष्ट्र के इस इकाई ने वह कर दिखाया, जिसका अंदाजा किसी को नहीं था, क्या और इकाइयां इस आंदोलन से सबक लेगी, या केवल बोर्ड टांगकर किसानो की समस्या से मुक्ति पा लेने का ढोंग करेंगी।

Krishna Bihari Mishra

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