कल लालू से नैन मटका, अब मोदी से प्यार भयो, अब नीतीश गायेंगे मोदी भजन

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने आज सायं राजभवन जाकर राज्यपाल को इस्तीफा सौप दिया। जैसा कि सर्वविदित भी था कि जिस प्रकार से तेजस्वी के इस्तीफे को लेकर जिच चल रही थी, उससे इस बात की भी पुष्टि हो गई थी कि तेजस्वी के इस्तीफे न देने की स्थिति में वे स्वयं अपना इस्तीफा सौप देंगे और आज वहीं हुआ।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने आज सायं राजभवन जाकर राज्यपाल को इस्तीफा सौप दिया। जैसा कि सर्वविदित भी था कि जिस प्रकार से तेजस्वी के इस्तीफे को लेकर जिच चल रही थी, उससे इस बात की भी पुष्टि हो गई थी कि तेजस्वी के इस्तीफे न देने की स्थिति में वे स्वयं अपना इस्तीफा सौप देंगे और आज वहीं हुआ। सूत्र बताते हैं कि नीतीश कुमार की भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं से इस बात के संकेत मिल गये थे कि महागठबंधन से हटने के बाद भाजपा अपने पूर्व के सारी मनमुटाव को भूलकर अंततः नीतीश को अपना समर्थन दे देगी और इस प्रकार नीतीश एक बार फिर एनडीए में आकर, एनडीए की ओर से बिहार के मुख्यमंत्री पद का शपथ लेंगे, बस इसकी औपचारिकता ही बाकी रह गयी है। ऐसे भी जैसे ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे का समाचार आया, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट कर नीतीश कुमार की नैतिकता की जमकर प्रशंसा की। ऐसे भी बिहार के भाजपा नेताओं का मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बार-बार अनुरोध किया जा रहा था कि वे महागठबंधन से अलग हो, भाजपा उन्हें समर्थन करेगी। हाल ही में एक जातीय सम्मेलन में पटना भाग लेने गये झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी नीतीश कुमार से कुछ ऐसा ही गुहार लगाया था।

मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद इतना जरुर तय हो गया कि राजद और जदयू में एक लंबी लकीर फिलहाल खींच गई है, जो फिलहाल मिटनेवाली नहीं है। ये लंबी लकीर उसी प्रकार की है, जो तीन-चार साल पहले नीतीश की भाजपा से खीचनी शुरु हुई थी, जो समय-समय पर विकराल होती गई और लोकसभा चुनाव के बाद बिहार विधानसभा का चुनाव आते – आते ऐसी स्थिति हो गई कि वे भाजपा और भाजपा नेताओं को देखना तक पसन्द नही करते थे।

इसी दरम्यान नीतीश कुमार ने ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ा, जिसमें भाजपा नेताओं को उन्होंने अपमानित न किया हो। भाजपा के पटना में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन में आये नेताओं को अचानक दिये जानेवाला भोज को स्थगित कर देना तो चरम था, फिर भी राजनीति में तो ये सब चलता ही रहता है, लोग एक दूसरे को एक समय खुब गालियां देते है और फिर कुछ दिनों के बाद उन्हीं के साथ गलबहियां डाले घुमते है। कल तक महागठबंधन की दुहाई देनेवाले आज महागठबंधन को ही गाली दे रहे है। ऐसा नहीं कि लालू प्रसाद या उनके परिवार पर भ्रष्टाचार का आरोप पहली बार लगा है। लालू प्रसाद तो भ्रष्टाचार के पर्याय है, यह बिहार की जनता भी जानती है, पर अचानक लालू और तेजस्वी के खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार कर लेना, नैतिकता की दुहाई देने की बात करना, साफ बताता है कि अचानक नीतीश का भाजपा प्रेम नहीं जगा है। नीतीश जान चुके है कि बड़े भाई लालू प्रसाद जो समय-समय पर टीका लगाकर अभय दान देते है, उस अभय दान में, उनका परिवार के प्रति समर्पण भी छुपा रहता है, जो बताता है कि उन्हें हर हाल में लालू प्रसाद के परिवार का संरक्षण करना है। यानी प्राथमिकता बिहार का विकास नहीं, प्राथमिकता लालू के परिवार का संरक्षण है, गर ये मानेंगे तो सत्ता में रहेंगे और नहीं तो जान लीजिये क्या होगा?

इधर लालू प्रसाद जो कल तक नीतीश के पक्ष में हरिकीर्तन गा रहे थे, उन्हें कहीं से एक नीतीश के खिलाफ केस मिल गया है, शायद किसी के मर्डर का है, वे खुब आज संवाददाता सम्मेलन में लहरा रहे थे, यानी कल तक नीतीश बहुत बढ़िया और आज शाम से खराब। हद हो गई, बिहार की राजनीति और हद है बिहार के राजनेता। दोनों स्वार्थी, एक नंबर के स्वार्थी। कल तक राजद से नैन मटका और अब आज से भाजपा से नैन मटका।

इधर महागठबंधन में पड़ी कांग्रेस क्या करें? उसे समझ नहीं आ रहा। लालू के साथ गई तो भ्रष्टाचार ले डूबेगी और इधर नीतीश के साथ जाने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि नीतीश कुमार के अंदर तो भाजपा प्रेम जाग गया। बेचारे कल तक जो कांग्रेस के नेता मंत्री सुख पा रहे थे, वह भी हाथ से गया। यानी दोनो हाथ में लडडू की जगह, अब बटेर हाथ लग गये, क्या करें? उन्हें समझ नहीं आ रहा, ले-देकर वहीं बयान – जो कहे आलाकमान, जैसा रहेगा आदेश। इसी को भज रहे है। इधर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया है। आइये देखिये कि उन्होंने इस्तीफा देने के बाद संवाददाताओं से क्या कहा?

इस्तीफा देने के बाद क्या कहा नीतीश ने…

हर संभव गठबंधन धर्म का पालन करने की कोशिश की।

मैंने अंतरात्मा की आवाज सुनी।

हमने राहुल गांधी से भी बात की, पर रास्ता नहीं दीख रहा था।

यह संकट आया नहीं, स्वयं लाया गया।

सरकार अब तक चलाया, अब वे ऐसे हालात में सरकार चलाने की स्थिति में नहीं है।

लालू प्रसाद और तेजस्वी पर जो आरोप लगे, उन आरोपों का जवाब जनता के सामने उन्हें एक्सप्लेन करना जरुरी था, जो उन्होंने नहीं किया। बार-बार वे यह कहकर बचने की कोशिश करते रहे कि उन्हें फंसाया जा रहा है, जो गलत है।

जनता के बीच इस बात को लेकर गलत मैसेज जा रहा था।

मैने किसी से इस्तीफा नहीं मांगा।

सरकार में रहकर सात निश्चयों को जमीन पर उतारने की कोशिश की।

बुनियादी ढाचों को मजबूत करने का काम किया।

जितना संभव हुआ 20 महीने में काम किया, पर ऐसे माहौल में काम करना संभव नहीं।

हमने नोटबंदी का समर्थन किया क्योंकि यह देश के लिए जरुरी था।

हमने बेनामी संपत्ति पर भी चोट करने की केन्द्र से अपील की थी।

धन-संपत्ति गलत ढंग से अर्जित करना किसी भी प्रकार से ठीक नहीं।

लोग जान ले, कफन में जेब नहीं होता।

हमने राष्ट्रपति के लिए रामनाथ कोविंद को समर्थन किया, चूंकि वे बिहार के राज्यपाल थे, इसलिए ये बिहार के लिए गौरव की बात थी।

मैंने बहुत झेला, पर ऐसा वातावरण बन गया कि अब संभव नहीं।

सोच का दायरा अलग है, रिएक्शन एजेंडा से काम नहीं चलेगा।

अंतरात्मा की आवाज मैंने सुनी, मेरे जैसे व्यक्ति के लिए अब सरकार चलाना ठीक नहीं।

कोई विकल्प ही नहीं था, इस तौर तरीके से काम भी नहीं चलेगा, इसलिए हमने अपने आपको अलग कर लिया।

आगे क्या होता है, अभी नहीं कह सकते, जब तक नई व्यवस्था नहीं हो जाती, काम करता रहूंगा।

और लीजिये हुआ वहीं, भाजपा विधायक दल की बैठक में फैसला ले लिया गया, भाजपा ने नीतीश कुमार को समर्थन का फैसला लिया। भाई इतना हक तो नीतीश कुमार का बनता ही था, जब उन्होंने राष्ट्रपति पद के एनडीए प्रत्याशी को समर्थन किया, नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी का समर्थन किया तो भला ऐसे हालात में भाजपा, नीतीश का समर्थन नहीं करती तो गलत ही संदेश जाता। वाह री भाजपा और वाह रे नीतीश…

Krishna Bihari Mishra

One thought on “कल लालू से नैन मटका, अब मोदी से प्यार भयो, अब नीतीश गायेंगे मोदी भजन

  1. 26 जुलाई को कारगिल जवानों की शहादत के लिए याद किया जाता है, आज से उन शहीदों में लालू के भी दो जवान शामिल हो गये

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इधर नीतीश कुमार ने राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंपा, उधर महागठबंधन टूटा, देखते ही देखते भाजपा विधायक दल की बैठक हुई, नीतीश कुमार को समर्थन देने की बात की घोषणा कर दी गयी। देखते ही देखते यूपीए का नेता एनडीए में शामिल हो गया, एनडीए विधायक दल की फिर बैठक हुई और नीतीश कुमार एनडीए विधायक दल के नेता चुन लिये गये और इस प्रकार भारत संघमुक्त बन गया,

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