लो कर लो बात, बाबा वैद्यनाथ को भी अखबारों ने नहीं बख्शा, विवादों में लपेटा

देवघर में सदियों से महापंडित रावण के नाम से जाने जानेवाले अपने बाबा रावणेश्वर वैद्यनाथ को क्या पता था कि आनेवाले समय में उन्हें भी रामजन्मभूमि-बाबरीमस्जिद की तरह विवादों में ला दिया जायेगा, ये तो यहां अपने भक्तों के बीच झार-झंखार में पड़े हुए थे, और मस्ती में प्रतिदिन भांग-धूतरे, जंगलों में नाना प्रकार के फूल-फल प्राप्त कर अपने भक्तों के साथ समाधि में लीन रहा करते थे।

देवघर में सदियों से महापंडित रावण के नाम से जाने जानेवाले अपने बाबा रावणेश्वर वैद्यनाथ को क्या पता था कि आनेवाले समय में उन्हें भी रामजन्मभूमि-बाबरीमस्जिद की तरह विवादों में ला दिया जायेगा, ये तो यहां अपने भक्तों के बीच झार-झंखार में पड़े हुए थे, और मस्ती में प्रतिदिन भांग-धूतरे, जंगलों में नाना प्रकार के फूल-फल प्राप्त कर अपने भक्तों के साथ समाधि में लीन रहा करते थे। अपने बाबा वैद्यनाथ को न रसगुल्ले की चाहत और न ही महलों की सुख-सुविधा की चाह, जैसे उनके भक्त, वैसे बाबा वैद्यनाथ, हर दम मस्त रहनेवाले। बोल बम का नारा सुनकर ब्रह्मानन्द में डूब जानेवाले, इन दिनों रांची से प्रकाशित दो अखबारों के पाटन में पीसे जा रहे हैं।

पता नहीं कहां से, रांची से प्रकाशित दैनिक भास्कर को क्या पता चल गया, कि वह महाशिवरात्रि के दिन अपने पहले पृष्ठ पर ही वैद्यनाथ पर विवाद होने की बात का समाचार झारखण्डियों के जनमानस पर लाकर पटक दिया और लीजिये इधर आज का दिन हैं कि प्रभात खबर भी बाबा वैद्यनाथ पर आज आलेख लाकर पटक दिया। अब सवाल यह है कि ये दोनों अखबार बाबा भोलेनाथ पर इतनी श्रद्धा क्यों लुटा रहे हैं?  ऐसा कौन सा बवाल हो गया कि बाबा वैद्यनाथ पर बड़े-बड़े शोध की आवश्यकता पड़ गई।

भावनाओं पर शोध नहीं चलता, यह अखबारों को मालूम होना चाहिए। जिन्हें महाराष्ट्र के परली में वैद्यनाथ दिखाई देते हैं या ज्योतिर्लिंग दिखाई देता हैं, आप उन्हें चुनौती कैसे दे सकते हैं और जिन्हें देवघर के बाबा भोलेनाथ में ज्योतिर्लिंग या सब कुछ दिखाई देता हैं, उसे आप चुनौती कैसे दे सकते है? श्रद्धा व भाव को लेकर अगर कोई तराजू-बटखारे लेकर बैठता हैं और उसकी दुकानदारी करने लगता हैं तो सचमुच में ऐसे लोगों पर हमें तरस आता हैं, और जो ऐसे लोगों के चक्कर में पड़कर नाना प्रकार के ग्रंथों का हवाला देने लगते हैं तो उनकी विद्वता पर हमें शक होने लगता है।

जरा वैद्यनाथधाम में ही रह रहे विद्वानों से सवाल हैं, जिनके बयान इनके अखबारों में छपे हैं, क्या बिहार या झारखण्ड या अन्य राज्यों या विदेशों से जो भक्तों का भारी जन सैलाब वैद्यनाथधाम सालों भर पहुंचता हैं, वह क्या पुराणों व वेदों को पढ़कर आता हैं या उनके हृदय में विराजमान भक्ति और श्रद्धा का समन्वय यहां तक खींच लाता हैं, और जिन्हें वैद्यनाथ के ज्योतिर्लिंग होने पर शक होता हैं, उनकी संख्या कितनी है?  ऐसे लोगों की संख्या तो अंगुलियों पर गिननेलायक तक नहीं है, पर आपने ऐसे लोगों को जवाब देकर, चिरकुटों का सम्मान बढ़ा दिया, उन्हें पाइपलाइन में लाकर खड़ा कर दिया और अब वे बाबा वैद्यनाथ को भी विवादित बना रहे हैं, अरे कौन नहीं जानता कि जहां महाशक्ति का हृदय गिरा हैं, जो चिताभूमि है, वह झारखण्ड में विद्यमान बाबा वैद्यनाथ हैं, कौन इन्हें चुनौती दे सकता हैं? पर जब आप ही चुनौती देनेवालों का मनोबल बढ़ा रहे हैं, बिना किसी विवाद के विवाद को जन्म देने की चाह रख रहे हैं तो अखबारवालें तो ये चाहते ही हैं कि नित्य नये विवाद उत्पन्न होते रहे और वे इसकी आड़ में अपनी दुकानदारी चलाते रहे।

हैं किसी की हिम्मत, इस ब्रह्माण्ड में, कि बाबा वैद्यनाथ से ही सीधे सवाल करें या है किसी की हिम्मत, जो बाबा वैद्यनाथ के भक्तों व सिद्धगणों तक पहुंच पाये, अगर नहीं तो ये सवाल करनेवाले और इन सवालों के जवाब देनेवाले कौन है? बाबा वैद्यनाथ को उनके हाल पर छोड़ियें, उन्होंने कभी नहीं कहा कि हम असली है या परली वाले असली, वे तो भक्तों के प्रेम के आगे वशीभूत हैं, और जहां प्रेम होता हैं, वहां शास्त्रार्थ गौण हो जाता हैं, वहां शंकराचार्य की भी नहीं चलती, वहां तो सिर्फ भक्त और भगवान होता हैं, कहां पड़े हैं चक्कर में, वैद्य़नाथ जैसे योगी को योगी रहने दीजिये, उन्हें सभी को चिकित्सा करने दीजिये, वह सभी का इलाज करना जानते हैं, सभी अभी से सुधर जाये, नहीं तो शिव ने अपना त्रिनेत्र खोला और उसका कोपभाजन कौन बनेगा, ये अखबारवाले और मठाधीश भी नहीं जानते, इसलिए बाबा वैद्यनाथ को वैद्यनाथधाम में आराम से पड़े रहने दीजिये और अपने निश्छल भक्तों के हाथों भोग प्राप्त करने दीजिये। बम-बम भोले करते रहिये, वैद्यनाथ का दर्शन करिये।

Krishna Bihari Mishra

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