रांची के पत्रकार भूल गये, राष्ट्रीय प्रेस दिवस को, नये पत्रकारों ने याद दिलाया फिर भी…

और अब सवाल उनलोगों से, जो स्वयं को पत्रकारिता का धुरंधर मानते हैं, जिन्हें लोग आजकल पत्रकारिता के भीष्म पितामह कहने लगे हैं, जो पत्रकारिता के ही क्षेत्र में पद्मश्री प्राप्त कर चुके हैं, जो रांची प्रेस क्लब के अध्यक्ष हैं, क्या उन्हें आज के दिन को लेकर सजग नहीं होना था, क्या एक कार्यक्रम आयोजित नहीं करा सकते थे। पहले तो बात थी कि जगह नहीं हैं, अब तो जगह भी हैं, अब क्या दिक्कत हैं? किसका इंतजार था।

रजत कुमार गुप्ता एक अखबार के संपादक हैं और पत्रकारों का एक यूनियन भी चलाते हैं। बहुत संघर्षशील है, कई मुद्दों पर सड़कों पर भी उतरे हैं, उनका वक्तव्य है कि देश में करीब 20 हजार पत्रकारों की नौकरी चली गई, ऐसे में क्या आयोजन हो? पर मेरा मानना है कि ऐसे में तो राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर एक विशेष कार्यक्रम के आयोजन की आवश्यकता और बढ़ जाती है, ताकि उसमें चिन्तन हो, वैचारिक बातें खुलकर आये, तथा नये लोग उससे कुछ सीख सकें कि ऐसे हालात में जब पत्रकारिता के क्षेत्र में नौकरियों पर तलवार लटक रहे हो, तो पत्रकारों को क्या करना चाहिए? हम ये कहकर भाग नहीं सकते कि 20 हजार पत्रकारों की नौकरी चली गई, इसलिए राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर कोई भी कार्यक्रम करने की आवश्यकता नहीं। सबको मालूम होना चाहिए कि कोई भी दिवस इसीलिये मनाया जाता हैं ताकि आप उस दिन कम से कम उस विषय पर चर्चा करें, सीखे-सीखाएं।

वरिष्ठ पत्रकार गिरिजा शंकर ओझा का ये कहना कि मैने तो नहीं सोचा, बाकी की नहीं जानता। ऐसे भी मुझे काम से फुरसत नहीं। आप जैसे वरिष्ठ पत्रकार, जिससे आनेवाली पीढ़ी कुछ सीखेंगी, आप भी ये कहकर निकल नहीं सकते, क्योंकि आपसे नये पत्रकारों को ज्यादा आशाएं हैं, क्योंकि जहां कुछ लोग नैतिकता को बाजार में बेच आये हैं, वहां आप जैसे लोग भी हैं, जिनमें कुछ नैतिकता बची हुई हैं। अनुपम जी ने बड़ी ही ईमानदारी से स्वीकारा कि उन्हें आज पता चला कि आज राष्ट्रीय प्रेस दिवस हैं

और अब सवाल उनलोगों से, जो स्वयं को पत्रकारिता का धुरंधर मानते हैं, जिन्हें लोग आजकल पत्रकारिता के भीष्म पितामह कहने लगे हैं, जो पत्रकारिता के ही क्षेत्र में पद्मश्री प्राप्त कर चुके हैं, जो रांची प्रेस क्लब के अध्यक्ष हैं, क्या उन्हें आज के दिन को लेकर सजग नहीं होना था, क्या एक कार्यक्रम आयोजित नहीं करा सकते थे। पहले तो बात थी कि जगह नहीं हैं, अब तो जगह भी हैं, अब क्या दिक्कत हैं? किसका इंतजार था। हमें तो लगता है कि आज के दिन रांची प्रेस क्लब का दरवाजा तक नहीं खुला होगा, इससे बड़े दुख की बात और क्या हो सकती है?

एक नया नया बच्चा जो पत्रकारिता में कदम रखा हैं? भोला-भाला, चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लिए, नाम हैं – संजय रंजन। उसने रांची के पत्रकारिता में कई सालों से जमें मठाधीशों से सवाल पूछा है कि प्रेस क्लब में प्रेस दिवस पर कोई कार्यक्रम भी है क्या?  किन्हीं के पास कोई जानकारी हो तो प्लीज शेयर करें। उत्तर आता हैं – रांची की जानकारी नहीं।  हां पटना में जरुर है। जबकि पटना में अभी भी प्रेस क्लब नहीं है, और रांची में राज्य सरकार ने बनाकर इन पत्रकारिता में स्वयं को मठाधीश कहनेवाले लोगों को सौंप दी है।

यहीं नहीं, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग ने भी राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर कोई कार्यक्रम राजधानी रांची में आयोजित नहीं किया। हां, मुख्यमंत्री रघुवर दास के सोशल साइट पर राष्ट्रीय प्रेस दिवस से संबंधित कुछ बातें लिखी हुई हैं, जो परंपरागत हैं, जो हर मुख्यमंत्री के आगे-पीछे चलनेवाले लोग, जो इसी काम के लिए नियुक्त होते हैं, समय आते ही, लिख देते हैं।

मेरा मानना है कि, जब आपको अपने विशेष दिवस की, दिन और तारीख तक मालूम न हो, तब आप ऐसे में अपनी लड़ाई, अपने हक की लड़ाई कैसे लडेंगे, आप किसे धोखा दे रहे हैं? खुद से पूछिये, पता चलेगा, हमें लगता है कि अभी भी आपलोगों के शरीर में आत्मा विद्यमान हैं, पूछिये उससे आपने कितनी बड़ी गलती कर दी हैं, पर आप तो आप हैं, क्यों गलती स्वीकार करेंगे, आप तो उसी पर बरस जायेंगे, जो आपको आइना दिखायेगा?

Krishna Bihari Mishra

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