अपनी बात

इधर मुख्यमंत्री के रूप में हेमन्त सोरेन ने पद एवं गोपनीयता की शपथ क्या ले ली, भाजपाइयों के पेट में दर्द होना शुरू

लीजिये, इधर झारखण्ड में मुख्यमंत्री के रूप में हेमन्त सोरेन ने पद एवं गोपनीयता की शपथ क्या ले ली, भाजपाइयों के पेट में दर्द शुरु हो गया। वे खुब अब चम्पाई सोरेन को लेकर दुखड़ा रो रहे हैं, जैसे कि चम्पाई सोरेन के अब तक के शासनकाल से वे संतुष्ट रहे हो। जबकि सच्चाई यही है कि ये ही भाजपाई चम्पाई सोरेन के खिलाफ (जब वे मुख्यमंत्री पद पर विराजमान थे) खुब विषवमन कर रहे थे। अब चूंकि हेमन्त सामने आ गये, तो ये करेंगे क्या, वही लोकोक्ति चरितार्थ कर रहे हैं – खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे!

मतलब साफ है कि हेमन्त सोरेन को ये पांच महीने से ज्यादा जेल में नहीं रख सकें और जिस आधार पर हेमन्त सोरेन को जमानत मिली, वो आधार ही बताने के लिए काफी है कि हेमन्त सोरेन के साथ जो कुछ हुआ वो गलत हुआ। आज झारखण्ड के हर चौक-चौराहे पर यही चर्चा है और इस चर्चा में खुलकर यही निकल रहा है कि भाजपा ने हेमन्त सोरेन को झूठे केस में फंसवाकर जेल में डलवा दिया, ऐसे में जेल से निकलकर मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर हेमन्त सोरेन ने अपने विरोधियों को करारा जवाब दिया है।

सच्चाई यही है कि जब से हेमन्त सोरेन सत्ता में आये हैं। हेमन्त सोरेन को उनके विरोधियों ने काम ही करने नहीं दिया। बोलने को तो ये सकारात्मक व रचनात्मक विपक्ष की भूमिका में रहने का दंभ भरते हैं, लेकिन कभी सकारात्मक व रचनात्मक विपक्ष की भूमिका में जनता ने नहीं देखा। जो बाबूलाल मरांडी 2019 में भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़कर सत्ता में आये थे, वे कुछ दिनों के बाद ही भाजपा में जाने को छटपटाने लगे और देखते ही देखते नेता प्रतिपक्ष के दावेदार और अब प्रदेश अध्यक्ष हैं।

लेकिन जनता ने देखा है कि हेमन्त सोरेन के साथ ऐसा नहीं हैं। हेमन्त सोरेन शुरु से ही भाजपा के खिलाफ जनता के बीच में रहे। जनता को भी हेमन्त सोरेन के रूप में अच्छा विकल्प मिल गया और जनता ने हेमन्त सोरेन को हाथो-हाथ लिया और सत्ता सौंप दी। हेमन्त ने जैसे ही सत्ता संभाला इधर विश्वव्यापी कोरोना बीमारी ने दस्तक दे दी और इस दौरान जो हेमन्त सोरेन की भूमिका रही, उस भूमिका की सभी ने प्रशंसा की।

झारखण्डी जहां भी रहे, जिस अवस्था में रहे, उन्हें अपने घर और परिवार से मिलाने का प्रयास किया। भारत-चीन सीमा स्थित लद्दाख तक की जगहों से झारखण्डियों को अपने प्रांत बुलवा लिया गया। पहली बार रांची के सारे के सारे पुलिस थाने होटल का रूप ले लिये थे। सुबह-दोपहर व रात का भरपेट भोजन का प्रबंध वो भी मुफ्त गरीबों के लिए कर दिया गया। यानी जिन भाजपाइयों के शासनकाल में सब कुछ रहते हुए जहां लोग भूख से मरे। हेमन्त सोरेन के शासनकाल में कोई भूख से नहीं मरा।

इसके बाद शुरु हुआ, झारखण्ड के राज्यपाल की राजनीति। राज्यपाल भी राजनीति से बाज नहीं आये। ऐसी-ऐसी राजनीति और संवाद सुनने और देखने को मिले, जिसे सुनकर हंसी भी आती और आश्चर्य भी होता। लेकिन राज्यपाल की राजनीति को भी हेमन्त सोरेन जैसे व्यक्तित्व ने खूब झेला। लेकिन इसी बीच वे जनता के द्वारा किये वायदे को भी नहीं भूले। अपने राज्यकर्मियों को ओल्ड पेंशन स्कीम की सुविधा दी। पुलिसकर्मियों को 13 माह का वेतन थमाया। सरना धर्म कोड सदन से पास करवाया। यहीं नहीं कई ऐसे-ऐसे काम किये, जिसकी चर्चा देश भर में होती रही। लेकिन भाजपाइयों को इन सभी में भ्रष्टाचार ही सूझता था। वो कहते हैं न…

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मीलिया कोय।

जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय।।

राजनीतिक पंडितों की मानें तो भारी-भरकम हाथी उड़ानेवाले लोग, मोमेंटम झारखण्ड के नाम पर मस्ती लूटनेवाले लोग हेमन्त सोरेन पर छीटाकशीं करते हैं तो आश्चर्य होता है। अरे पहले अपना गिरेबां तो देख लो। आज भी जनता की नजरों से दूर हो। आदिवासियों ने पहले ही नकार रखा है। कुर्मियों ने भी दूरी बना ली। नये-नये नेता बने युवकों ने आपकी जीत को प्रभावित करने में बड़ी भूमिका निभा दी। लोकसभा की सबक से अगर सबक नहीं लिये तो विधानसभा में साफ होने के लिए तैयार रहिये। क्योंकि हेमन्त सोरेन आज भी तीर-धनुष लेकर अडिग है। उन्हें पता है कि जनता उनके साथ है। उन्हें ऐसे माहौल में क्या करना चाहिए।

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