चंपक वन का राजा लुप्तेन्द्र सियार और घास का पकौड़ा

बहुत दिनों की बात हैं, चंपक नामक लोकतांत्रिक वन में एक लुप्तेन्द्र नामक सियार रहा करता था, उसकी दिली इच्छा थी कि वह चंपक वन का राजा बने तथा वर्षों तक शासन करता रहे। लुप्तेन्द्र में वाकपटुता थी ही, वह जहां भी भाषण देता।

बहुत दिनों की बात हैं, चंपक नामक लोकतांत्रिक वन में एक लुप्तेन्द्र नामक सियार रहा करता था, उसकी दिली इच्छा थी कि वह चंपक वन का राजा बने तथा वर्षों तक शासन करता रहे। लुप्तेन्द्र में वाकपटुता थी ही, वह जहां भी भाषण देता, लोग उसकी भाषण के कायल हो जाते और उस पर विश्वास करने लगते। देखते ही देखते चंपक वन में लुप्तेन्द्र सियार की लोकप्रियता बढ़ गई और एक दिन ऐसा आया कि उसके सपने पूरे होने के दिन आ गये।

उसने अपनी वन पशु पार्टी को मजबूत बनाने के लिए, अपने आइटी से जुड़े चालाक सियारों को सोशल साइट पर लगा दिया और चालाक सियार लगे हाथों सोशल साइट के माध्यम से पूरे चंपक वन में लुप्तेन्द्र सियार के प्रचार-प्रसार में लग गये। इधर चंपक वन में कई अखबारों के चतुर संपादक सियारों ने लुप्तेन्द्र की महिमामंडन करने में रुचि दिखाई, और देखते ही देखते, लुप्तेन्द्र सियार की वन पशु पार्टी सत्ता में आ गई। इस प्रकार, चारों ओर लुप्तेन्द्र सियार की जय-जय होने लगी।

लुप्तेन्द्र सियार राजा जहां जाता, उसके वन पशु पार्टी के चालाक सियार कार्यकर्ता, सभा में शामिल हो जाते, और जोर-जोर से लुप्तेन्द्र, लुप्तेन्द्र, लुप्तेन्द्र, लुप्तेन्द्र…. चिल्लाते। लोगों को लुप्तेन्द्र, लुप्तेन्द्र चिल्लाते हुए देख लुप्तेन्द्र नामक सियार बना राजा फुला नहीं समाता। इधर चंपक वन में हीही टीवी, पीपी टीवी, हिल गया टीवी, उड़ गया टीवी, आया टीवी, गया टीवी, भौका टीवी, हांका टीवी, कल तक टीवी, परसो तक टीवी, अब आयेगा टीवी, अब जायेगा टीवी चैनलों की बहुतायत थी। बेचारे चैनलवाले लुप्तेन्द्र की जहां सभा होती, पैसों के लिए हांफते-कूदते दौड़ लगाते और लुप्तेन्द्र सियार राजा की आंखों में नजर से नजर मिलाकर कैमरा तैयार कर देते, और इसी तरह लुप्तेन्द्र सियार राजा पूरे चंपक वन में छा गया।

इधर वन पशु पार्टी के सत्ता में आने से, लुप्तेन्द्र सियार राजा के सत्ता पर छा जाने से चंपक वन का विरोधी खेमा परेशान था, पर चंपक वन में रहनेवाले पशु-पक्षी इन विरोधी खेमा पर ध्यान ही नहीं देते, उन्हें लगता कि लुप्तेन्द्र नामक सियार राजा से बढ़कर कोई चंपक वन का हितैषी हैं ही नहीं…

समय बीतता गया। लुप्तेन्द्र सियार राजा चंपक वन के वन्यप्राणियों को पशुभाइयों और पशुबहनों कहकर मूर्ख बनाता और अजब-गजब की हरकत करने लगा। कभी चंपक वन में चलनेवाले नोटों को बदल देता, तो कभी चंपक वन की सीमा पर पहरा देते वन्यप्राणियों के राशनमनी एलाउंस बंद करा देता, कभी वन्य प्राणियों के हंसने पर टैक्स लगा देता, तो कभी रोने पर टैक्स लगा देता। कभी दिन में जगने पर टैक्स लगा देता, तो कभी रात में जगने पर टैक्स लगा देता। कभी उड़ने पर टैक्स लगा देता, तो कभी चलने पर टैक्स लगा देता। कभी खड़े-खड़े खाने पर टैक्स लगा देता, तो कभी बैठकर खाने पर टैक्स लगा देता। ऐसे में उसके इस टैक्स लगाने की प्रवृत्ति से चंपक वन के वन्यप्राणी बड़ी दुखी हुए। उन्होंने सोचा कि क्या सोचा था, क्या निकला?

लुप्तेन्द्र सियार राजा के अच्छे दिनों की आगाज, पूरे वन्य प्राणियों के चेहरे से सदा के लिये खुशियां छीन ली थी। जो पशु हंसने-हंसाने के लिए जाने जाते थे, वे कहीं टैक्स न लग जाये, इसलिए हंसना-हंसाना छोड़ दिये, जो पक्षी उड़ने के लिए जाने जाते थे, कहीं टैक्स न लग जाये, इसलिए उन्होंने उड़ना बंद कर दिया था। ऐसे में सभी चंपक वन के वन्यप्राणियों का समूह फिर से चुनाव आने का इंतजार करने लगे।

इधर बेरोजगार खरहे, हिरणों का समूह, चंपक वन में उपजे बेरोजगारी से परेशान होने लगे। चंपक वन में वन्यप्राणियों के बीच पनप रही बेरोजगारी को लेकर एक दिन हीही टीवी ने लुप्तेन्द्र सियार को अपने स्टूडियों में बुलाया और चर्चाएं शुरु हुई।

हीही टीवी के एंकर सूट्टा हाथी ने लुप्तेन्द्र सियार राजा से पूछा कि महाराज वन प्रदेश में बहुत गरीबी और बेरोजगारी हैं, इस पर क्या कहेंगे?  लुप्तेन्द्र सियार राजा ने कहा कि चंपक वन के बेरोजगार वन्यप्राणियों को अपने सोच में बदलाव लाना चाहिए और घास के पकौड़े का रोजगार शुरु करना चाहिए, इससे घास का सहीं इंतजाम हो जायेगा, और लोगों को बेरोजगारी से मुक्ति भी मिल जायेगी। इधर घास के पकौड़े से बेरोजगारी दूर करने के लुप्तेन्द्र सियार राजा के सुझाव सुन कर वन्य प्राणी हैरान हो गये, पर लुप्तेन्द्र सियार के आइटी तथा सोशल साइट से जुड़े सियारों ने इसे भी ब्रांड बनाना शुरु किया और गाना गाने लगे…

चंपक वन में हुआ ऐलान

बेचो पकौड़ा सीना तान

लुप्तेन्द्र राजा ने दिया बयान

घास पकौड़ा खुले दुकान

बेकारी मिटाना हुआ आसान

बेचो पकौड़ा सीना तान

रोज बेचो सौ टका पकौड़ा

हिरण खरहे तोता मैना

चलो-दौड़ों या करो उड़ान

बेचो पकौड़ा सीना तान

और इस प्रकार लुप्तेन्द्र सियार बने राजा की चंपक वन में फिर से जय-जय होने लगी, चारो ओर यहीं शोर सुनाई देने लगा।

Krishna Bihari Mishra

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