लोकसभा चुनाव 2019 को देख, कुछ दलों ने नफरत की राजनीति शुरु कर पूरे देश में गंध मचाया

हद हो गई, पूरे देश में सभी राजनीतिक दलों ने ऐसा गंध मचा रखा है, जिससे देश की एकता व अखंडता को खतरा पैदा हो गया है, मात्र क्षुद्र स्वार्थ की पूर्ति के लिए, अपनी पारिवारिक संतुष्टि के लिए इन्होंने देश तक को दांव पर लगा दिया है, आज नई-नई राजनीति में प्रवेश करनेवाली बालाएं हो या युवा अथवा पुराने घाघ राजनीतिज्ञ ही क्यों न हो, सभी ने मर्यादाएं लांघ दी हैं, ऐसा लग रहा है कि इस साल 2019 में देश में लोकसभा चुनाव नहीं,

हद हो गई, पूरे देश में सभी राजनीतिक दलों ने ऐसा गंध मचा रखा है, जिससे देश की एकता अखंडता को खतरा पैदा हो गया है, मात्र क्षुद्र स्वार्थ की पूर्ति के लिए, अपनी पारिवारिक संतुष्टि के लिए इन्होंने देश तक को दांव पर लगा दिया है, आज नईनई राजनीति में प्रवेश करनेवाली बालाएं हो या युवा अथवा पुराने घाघ राजनीतिज्ञ ही क्यों हो, सभी ने मर्यादाएं लांघ दी हैं, ऐसा लग रहा है कि इस साल 2019 में देश में लोकसभा चुनाव नहीं, एक दूसरे की पैंट उतारने की प्रतियोगिता आयोजित हो रही है।

इस पैंट उतारो प्रतियोगिता जैसी होनेवाली इस बार के लोकसभा चुनाव में देश की जनता किंकर्तव्यविमूढ़ हैं, क्योंकि उसने ऐसे देश की परिकल्पना नहीं की थी, यही नहीं जब से डिजिटल युग प्रारंभ हुआ है, राजनीति में रुचि रखनेवाले लोगों ने भी जमकर, अपनी भड़ास निकालने के नाम पर ऐसा गंध फैलाया कि सामाजिक समरसता ही समाप्त हो गई। हर कोई जातीयता सांप्रदायिकता में रंग गया हैं, स्थिति ऐसी है कि गांवों में जो लोग एक दूसरे के सुखदुख में साथ देने के लिए आतूर रहते थे, वहां भी जातीयता सांप्रदायिकता ने गजब की लकीर खींच दी है।

यानी हर जगह पेट्रोल छिड़क दिया गया हैं, केवल माचिस लगानी बाकी है। जो कल तक सीबीआई, इडी, आइबी, चुनाव आयोग को अपने इशारों में नचाते थे, उन्हें लग रहा है कि वर्तमान सरकार इसका दुरुपयोग कर रही हैं, जो पार्टियां निर्वाचित राज्य सरकारों को अपने ठोकरों पर रखती थी, और राष्ट्रपति शासन का हमेशा से दुरुपयोग किया, वे दूसरे को ताना दे रहे हैं, जिन पार्टियों के नेताओं का इंटरव्यू लेने में विभिन्न राष्ट्रीय चैनलों को पसीने छूटते थे, वे नेता वर्तमान प्रधानमंत्री पर आरोप लगा रहे है कि वे पत्रकारों के सवालों का सामना नहीं कर रहे हैं।

यहीं हाल सत्ता में बैठे लोगों का है, धारा 370, रामजन्मभूमि, समान नागरिकता, एक समान शिक्षा को लेकर बड़ीबड़ी बात करनेवाले इन सारी चीजों को लगभग भूल चूके हैं, और अपनी पार्टी के राष्ट्रीय कार्यालय को भव्य बनाने में ज्यादा रुचि दिखाने लगे है। सपने तो इतने इन्होंने दिखाए कि पूछिये मत, आज वहीं सपने इनके लिए सरदर्द भी बन चूके हैं।

पर इसका मतलब क्या कि नफरत की खेती की जाये, एक दूसरे पर कीचड़ उछाली जाये, प्रधानमंत्री को गालियां दी जाये, उनकी पत्नी के बारे में उनसे सवाल किया जाये, उन्हें नीच दंगाई कहा जाये, इस मामले में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने तो हद कर दी है, उन्होंने तो बंगाल में ऐसी नफरत फैला दी कि भाजपा के नेताओं को भाषण ही करने नहीं दे रही, उनकी रैलियों पर प्रतिबंध, उनके हेलिकॉप्टर उतरने पर प्रबंध, आखिर ये सब क्या है? इससे किसका भला होगा?

आम जनता को तो भला होनेवाला नहीं, और ये सब किसलिए? कि कही बंगाल में बीजेपी जाये, अरे जब बीजेपी को आना होगा बंगाल में, तो वो ही जायेगी, चाहे आप कितना जोर लगा लें, ऐसे भी भाजपा को पहली बार निमंत्रण बंगाल में आप ने ही दिया था , तो फिर अब दिक्कत क्यों रही है, वो इसलिए कि ममता बनर्जी को पता चल गया है कि उनकी अगली लड़ाई वामपंथियो से हैं और ही कांग्रेस से, उनकी असली दुश्मन तो भाजपा है, पर राजनीतिक दुश्मनी को नफरत की दुश्मनी में बदल देने से देश को जो नुकसान हो रहा है, उसका अंदाजा शायद इन नेताओं को नहीं हैं।

कल तक जो चंद्रबाबू नायडू बीजेपी के साथ गलबहियां डाले घूमते थे, आज उन्हें भी भाजपा और मोदी में छेद ही छेद नजर रहे है। दो वर्ष पहले तक जिस बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नरेन्द्र मोदी में सांप्रदायिक व्यक्ति दिखाई पड़ता था, आज उन्हें उनमें गजब का सैद्धांतिक व्यक्तित्व दिखाई पड़ रहा है, यानी ये लोग आम जनता को कितना बेवकूफ समझते हैं, इसे समझने की जरुरत हैं, और ऐसे भी जनता तो बेवकूफ तो हैं ही, तभी तो अपने ढंग से दलबदल करने/कराने, टिकट बेचने/बिकवाने वाले नेताओं के चक्कर में जातीयता का स्वाद चखकर, अपनी मर्यादा को लांघ जाती हैं और देश बर्बादी के कगार पर चलता जा रहा है।

यहीं हाल झारखण्ड में हैं, झारखण्ड का मुख्यमंत्री एक जाति विशेष से इतनी नफरत करता है कि वह गढ़वा में खूलेआम उक्त जाति के खिलाफ विषवमन करता है, और वहां के लोग इसके खिलाफ मुख्यमंत्री के खिलाफ अदालत में केस भी दायर करते हैं, यही नहीं नफरत इतनी कि सदन में यह व्यक्ति नेता प्रतिपक्ष को भी गालियों से नवाजता है, ये इतने अपने आपको महान समझते है कि इनके मंत्रिमंडल में ही शामिल एक मंत्री, खूलेआप स्टेटमेंट देता है कि उसे इनके साथ कैबिनेट मीटिंग में बैठने में शर्मिंदगी महसूस होती है, ऐसे में ये नफरत लोगों को कहा ले जायेगी, समझिये।

जैसेजैसे चुनाव की तिथि की घोषणा का समय नजदीक आता जा रहा है, सभी राजनीतिक दलो के नेता एक दूसरे पर व्यक्तिगत प्रहार कर रहे हैं, उनके परिवारों के बारे में जमकर छीछालेदर कर रहे हैं, कोई किसी से कम नहीं, कोई ये नहीं पूछ रहा है कि आप ने पांच वर्षों में क्या किया? या कोई ये नहीं बता रहा कि वे सत्ता में रहे तो इन पांच वर्षों में उन्होंने देश को क्या दिया? और ही जनता की इसमें रुचि हैं, सभी का ध्यान इसी ओर हैं कि कौन कितना, किसको और कैसे गाली दे रहा हैं, जबकि बुद्धिजीवियों का दल इन सारी घटनाओं से महसूस कर रहा है कि आनेवाला भविष्य भारत के लिए दुखद हैं, भारत की एकता अखंडता को चोट पहुंचानेवाला है। 

याद करिये कभी  कांग्रेस भारत की एकता अखंडता बरकरार रखने के लिए ही वोट मांगी थी, आज वह भी अपने रास्ते से भटक रही हैं, वह यह कह रही है कि उसे इडी और सीबीआइ के माध्यम से फंसाया जा रहा है, और ये क्यों हो रहा है, सभी जानते है, जबकि सच्चाई यह है कि जब आप गलत नहीं है, तो इन सब से डरते क्यों हैं? सामना करिये और सत्य, सत्य होता है, वो एक एक दिन सामने आयेगा, पर हर चीज में नफरत की खेती, किसके लिए भाई, आखिर आपसे क्यों नहीं पूछा जाये, कि आपने इतनी अकूत संपत्ति कहां से अर्जित कर ली, क्या आपके पास अलादीन का चिराग हैं, और अगर ऐसा हैं तो थोड़ा उस अलादीन के चिराग का करिश्मा आम जनता तक भी पहुंचाइये, ये क्या केवल आप और केवल आप का परिवार और देश तथा देश की जनता गई भाड़ में।

Krishna Bihari Mishra

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