एक कैंसर पीड़ित पत्रकार के साथ विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका ने किया घोर अन्याय

हाँ तो हम बात कर रहे थे, न्यायालय और न्याय प्रक्रिया की, जिसके अधिष्ठाता जज होते हैं। उनके कार्य की कोई आलोचना नहीं की जा सकती, लेकिन ये तो बताया जा सकता है कि कार्य उन्होंने क्या किया? कि ये भी बताया नहीं जा सकता। 23/24 अप्रैल 2012 को रांची शहर के राजमार्ग पर सहजानंद चौक के पास एक उम्रदराज गरीब आदिवासी महिला के साथ सरे शाम दुष्कर्म हुआ

हाँ तो हम बात कर रहे थे, न्यायालय और न्याय प्रक्रिया की, जिसके अधिष्ठाता जज होते हैं। उनके कार्य की कोई आलोचना नहीं की जा सकती, लेकिन ये तो बताया जा सकता है कि कार्य उन्होंने क्या किया? कि ये भी बताया नहीं जा सकता। 23/24 अप्रैल 2012 को रांची शहर के राजमार्ग पर सहजानंद चौक के पास एक उम्रदराज गरीब आदिवासी महिला के साथ सरे शाम दुष्कर्म हुआ और उसे शराब की फूटी बोतल से बुरी तरह घायल कर दिया गया। रात भर खून बहता रहा। वहीं पड़ी रही। अगली सुबह 11 बजे अस्पताल ले जाते समय मर गई। रात भर सोई पुलिस बहादुर ने पहला काम किया – घटनास्थल पर बनी फूस की झोपड़ी उसी दिन मटियामेट कर सारे सबूत मिटा दिए।

जब इस घटना की रिपोर्टिंग मैं बतौर चैनल हेड, पूरी शिद्दत से न्यूज 11 में करा रहा था, तो डेस्क प्रभारी जफर ने चैनल मालिक अरूप चटर्जी का हुक्म सुनाया कि हरमू रेप केस की कोई खबर नहीं चलेगी, क्योंकि पुलिस की छवि खराब हो रही है, और इससे सीनियर SP बहुत नाराज हो रहे हैं। मैंने हाथ के कागज वहीं फेके और ये कह कर निकल गया कि जब हम एक गरीब औरत के साथ रेप, उसकी हत्या की खबर नहीं चला सकते तो ऐसी पत्रकारिता मुझे नहीं करनी। न्यूज 11 के ऑफिस छोड़ कर मैं घर चला गया। 

दो तीन घंटों में ये खबर भड़ास फॉर मीडिया पर चलने लगी कि खबर रोके जाने से नाराज चैनल हेड ने न्यूज 11 छोड़ा। कुछ देर में ही मालिक अरूप चटर्जी का फोन आया कि मैंने तो आपको कभी नहीं रोका, फिर ये भड़ास पर क्या चल रहा है। आप प्लीज वापस आइये और जो चलाना हो चलाइये। मैं अभी धनबाद में हूँ, वापस आकर ज़फर से पूछूँगा।
ये वे दिन थे जब हरि नारायण सिंह न्यूज 11 छोड़ चले गए थे और अरूप को उनकी जगह मेरी जरूरत थी।

मुझे तो खबर चलाने से मतलब था और नौकरी भी चाहिए ही थी, सो मैं वापस आ गया। दिल खोल कर ख़बरें चलाईं। अरूप ने मुझसे कुछ नहीं कहा, लेकिन मुझे वेतन देना, किसी न किसी बहाने से बंद कर दिया। सबकी आवे, मेरी बताए कि दस पंद्रह दिनों में मिल जाएगी, इस तरह चार महीने बीत गए. मेरे छः लाख उस पर बाकी हो गए, तब मैंने कहा, मुझे बकाया वेतन दे दीजिये, नौकरी नहीं करनी। उसने बहुत जोर डालने पर दस चेक दिए, औसतन पचास-पचास हजार के और एक लाख इनकम टैक्स के हिसाब के नाम पर काट लिए। भागते भूत की लंगोट भली, सोच मैं वे चेक लेकर चला गया।

सभी चेक एक-एक हफ्ते पर भुगतेय थे। लेकिन सभी दस चेक बाउंस हो गए। मैंने काफी दबाव डाला, तो शुरू के तीन चेकों की राशि उसने मेरे खाते में जमा की। बाकी सात गतालखाते, मैंने चेक बाउंस के दो केस किये। तीन चेकों का मामला समय से दायर नहीं होने से खारिज हो गया। बचे चार, केस मजबूत था। मगर अरूप को उम्मीद थी कि ये कैंसर पेशेंट, गरीब पत्रकार कब तक जियेगा? कब तक लडेगा? वह कोर्ट में हाजिर ही नहीं होता था ताकि मामला लम्बा खिचे। दो-दो बार कोर्ट ने उसके खिलाफ वारंट, फिर गैर जमानती, फिर कुर्की जब्ती आदेश दिए, लेकिन रांची पुलिस ने एक बार भी कोर्ट के आदेशों को तामील नहीं किया। शिकायत करने पर जज कहते, मैंने तो कुर्की जब्ती आदेश दिया है, लेकिन पुलिस तामील नहीं करती तो मैं क्या करुं? अगली डेट। 

2012 से 2018 आ गया। अब उसके वकील ने दो पॉइंट रखे, पहला कि मैंने कंपनी को आरोपी नहीं बनाया जबकि 2014 का सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि चेक बाउंस में कम्पनी को भी आरोपी बनाना जरुरी है। मेरा केस 2012 का था। अब कम्पनी को आरोपी बनाया नहीं जा सकता था, चूँकि ऐसा चेक बाउंस होने के सिर्फ डेढ़ महीने के भीतर ही किया जा सकता है। मैंने इलाहाबाद हाई कोर्ट का 2016 के एक आदेश का हवाल दिया कि अगर कम्पनी का मालिक, कर्ता-धर्ता और डायरेक्टर एक ही व्यक्ति हो तो सिर्फ इस तकनीकी आधार पर केस खारिज नहीं किया जा सकता की कंपनी को अलग से पार्टी नहीं बनाया गया है। लेकिन जज साहब ने मेरे तर्क को किनारे कर दिया।

(यहाँ बात माननीय सुप्रीम कोर्ट के ध्यान देने की है कि अब वे लोग क्या करें जिन्होंने उसके आदेश के पहले चेक बाउंस केस किये थे लेकिन तब कंपनी को पार्टी नहीं बनाया था और अब बना नहीं सकते, यानी उसके एक आदेश से पहले से चल रहे हजारों सही मुक़दमे भी खारिज!) दूसरा बचाव अरूप के वकील ने एकदम फर्जी आधार पर किया। उसने चार कैश वाउचर मेरे फर्जी दस्तखत के साथ पेश किये कि उन चारों चेकों के बदले मैं कैश ले चुका हूँ। मैंने दावा किया चारो वाउचर फर्जी हैं और ये कहने का आधार है।

  1. चारो वाउचर बुक से फाड़ कर जहाँ तहां से पेश किये गए हैं।
  2. बुक कहाँ है कि वेरीफाई किया जा सके कि आगे पीछे क्या तारीखें थीं।
  3. वाउचर पर मेरे दस्तखत के नीचे कोई तारिख मैंने नहीं लिखी थी।
  4. वह कालम भी खाली था, जिसमे प्राप्त रकम मुझे लिखनी थी।
  5. जिस गवाह ने वे वाउचर कोर्ट में पेश किये थे, मान चुका था कि कोई लेन देन उसके सामने नहीं हुआ और कि वह तो सिस्टम ऐडमिनिस्ट्रेटर है, उसका एकाउंट्स से कोई लेना देना नहीं है।
  6. जिस कथित लेखाकार के दस्तख्त वाउचर पर थे, वह कभी गवाही के लिए आया ही नहीं।
  7. बीस हजार से ज्यादा का पेमेंट नियमानुसार कैश वाउचर पर नहीं किया जा सकता।
  8. अगर पेमेंट किया गया तो TDS कब कहाँ कितना काटा गया? कहाँ जमा किया गया?कोई जवाब नहीं।ये भी कहा गया कि न्यूज 11 की होल्डिंग कम्पनी ने पिछले नौ वर्षों से अपना हिसाब बैलेंस शीट रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज के यहाँ जमा ही नहीं किया है और न मुझे फॉर्म 16 दिया है। अगर दिया होता तब तो जांच होती। नहीं दिया ये भी अपराध है। जज ने मेरे दस्तखत की फॉरेंसिक जांच कराए बिना, और मेरे तमाम तर्कों को नजर अंदाज कर के चारो फर्जी वाउचर को सही मानते हुए 31 जनवरी को मेरा पांच वर्षों से चल रहा केस खारिज कर दिया।
    मैंने कोर्ट को लिखित-मौखिक कई बार बताया था कि मैं कैंसर पेशेंट हूँ। जीवन का ठिकाना नहीं है और मेरे बार-बार रांची आने में बहुत दिक्कत है और ये भी कि ये मेरे वेतन के पैसे हैं, जिन्हें पाने के लिए मैं उनसे ज्यादा खर्च केस में कर चुका हूँ। लेकिन वाह रे न्याय व्यवस्था, जब जज ने अपने मन मुताबिक़ फैसला कर दिया, तब मैंने तय किया मैं हाई कोर्ट नहीं जाऊँगा, इसलिए नहीं कि केस कमजोर है बल्कि इसलिए कि मेरे पास न्यायालय में और डुबाने के लिए न तो पैसा हैं और न स्वास्थ्य। जज साहब जहाँ रहे, प्रसन्न रहे, मेरी बददुआ के बावजूद उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा. और न अरूप का कुछ बिगड़ेगा।
    मेरे पास उसकी एक और कम्पनी केयरविजन का भी ब्रोशर है जिसमे उसने बताया है कि उसकी कम्पनी नोआमुन्डी में कोयला खान, जमशेदपुर में एयरलाइन्स, डेयरी, और न जाने क्या-क्या उद्यम चलाने जा रही है और क्या-क्या चला रही है, उसके लेकिन फर्जी दावों के खिलाफ कोई कुछ नहीं करेगा, चूँकि उसी ब्रोशर में वह तबके मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, तब के डीजीपी रथ साहब और न जाने किस-किस के साथ है। वह दस बरस या सौ बरस भी रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज के पास बैलेंस शीट न जमा करे, तो भी न्यायालय, इनकम टैक्स, CBI कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ेगा और न रांची के पत्रकार ही कोई सवाल करेंगें उससे। क्या जाने कब संकट में वह नौकरी दे दे। उसके खिलाफ चेक बाउंस के मामले में मुंबई मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के गैर जमानती वारंट, वर्षों पड़े रहे हैं, आगे भी पड़े रहेंगे। लेकिन कोई बात नहीं। रांची पुलिस कप्तान के चरण कमल जिंदाबाद। मुख्यमंत्री रघुवर दास को भी मैंने कुर्की तामील करने को लिखा था। मेरे पास सबूत है, लेकिन, रघुवर दास उसके यहाँ पार्टी खाने गए तो उनकी पुलिस कैसे जाती अरेस्ट करने? 
    नेक्सस मजबूत है। अपराधी, न्यायालय, वकील, मंत्री – वो किसकी कविता थी ? शायद स्व. हरिवंश राय की – एक दिन इंसान को संघर्ष करना पडा था, जंतुओं से जो नेता, जननायक, विधायक का स्वांग भर निकलते हैं, संसद, सचिवालय, न्यायालय की मांदों से, …..किसी को मालूम हो तो कृपया यही कविता मुझे भेजें, बाकी जीवन काम आएगी। अरूप को इस जीत के लिए मुबारकबाद!

(जीवन में नैतिक मूल्यों के लिए समर्पित वरिष्ठ पत्रकार श्री गुंजन सिन्हा जी के फेसबुक वॉल से साभार

Krishna Bihari Mishra

One thought on “एक कैंसर पीड़ित पत्रकार के साथ विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका ने किया घोर अन्याय

  1. ये है असली चेहरा,लोकतंत्र के रहनुमाओं का,
    सही में…झारखंड में भी,सत्ता सत्ताधीश,चोट्टा नेता,मूक न्यूज़ मीडिया के मालिकों पत्रकारों के घृणित नपुंसकता,और छद्म नौटंकी से मन ग्लानित हो रहा है..।
    लगता है,राष्ट्र धृतराष्ट्र हो गया है,और धर्म ग्लानित
    अब तो, लगता है महाभारत ही हों और इसके लिए कृष्ण तत्व का हम आह्वान करते हैं।।

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