जयंती पर भूल गये जयपाल सिंह मुंडा को राज्य के CM, पर विपक्ष नहीं भूला, भावभीनी श्रद्धांजलि दी

जयपाल सिंह मुंडा जी को श्रद्धांजलि देने में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता सुबोधकांत सहाय, थियोडोर किड़ो, ललित मुर्मू भी आगे हैं। झारखण्ड विकास मोर्चा के वरिष्ठ नेता बाबू लाल मरांडी हो या अन्य वाम दलों के नेता अथवा जनसंगठन सभी ने जयपाल सिंह मुंडा जी को श्रद्धाजंलि देकर, अपनी कृतज्ञता ज्ञापित की, पर राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने जयपाल सिंह मुंडा को श्रद्धांजलि देना तो दूर, उन्हें सोशल साइट के माध्यम से याद करना भी जरुरी नहीं समझा।

आज झारखण्ड के महान सपूत जयपाल सिंह मुंडा जी की जयंती है, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के वरिष्ठ नेता एवं नेता प्रतिपक्ष हेमन्त सोरेन ने उन्हें, उनके जन्मदिन पर याद किया है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी अपने सोशल साइट फेसबुक के माध्यम से जयपाल सिंह मुंडा जी को भावभीनी श्रद्धांजलि दी है।

जयपाल सिंह मुंडा जी को श्रद्धांजलि देने में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता सुबोधकांत सहाय, थियोडोर किड़ो, ललित मुर्मू भी आगे हैं। झारखण्ड विकास मोर्चा के वरिष्ठ नेता बाबू लाल मरांडी हो या अन्य वाम दलों के नेता अथवा जनसंगठन सभी ने जयपाल सिंह मुंडा जी को श्रद्धाजंलि देकर, अपनी कृतज्ञता ज्ञापित की, पर राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने जयपाल सिंह मुंडा को श्रद्धांजलि देना तो दूर, उन्हें सोशल साइट के माध्यम से याद करना भी जरुरी नहीं समझा। आखिर इसे क्या समझा जाये?

कमाल है, मुख्यमंत्री रघुवर दास ने महान समाज सुधारकर्तृ सावित्री बाई फूले को उनके जयंती पर याद किया, उन्हें नमन किया पर जयपाल सिंह मुंडा जो झारखण्ड की धरती पर जन्मे, जिन्होंने आदिवासियों के बेहतर जीवन स्तर के लिए संघर्ष किया, जिन्होंने भारतीय हॉकी टीम का कप्तान रहते हुए, ओलम्पिक में भारत को 1928 ई. में स्वर्ण दिलाया, उन्हें याद करना जरुरी नहीं समझा, क्या ये मुख्यमंत्री की छोटी मानसिकता का परिचय नहीं देता।

झारखण्ड या देश का कौन ऐसा व्यक्ति होगा, जो मरांग गोमके के नाम से विख्यात जयपाल सिंह मुंडा को नहीं जानता होगा। भारतीय हॉकी टीम के कप्तान, संविधान सभा के सदस्य, आदिवासी अस्मिता के प्रबल पैरोकार और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ के रुप में भला कौन उन्हें भूल सकता है? पर राज्य सरकार ने इन्हें भूला दिया है, और याद करिये जो भी देश, राज्य या समाज अपने पूर्वजों को भूल जाता है, उसकी सभ्यता और संस्कृति ही नहीं, बल्कि वह देश, राज्य व समाज भी नष्ट हो जाता है।

आखिर जयपाल सिंह मुंडा को राजनीति का शिकार क्यों बनाया जा रहा है? जो दिवंगत है, जो सबके लिए जिया, उनसे इतनी नफरत क्यों?  आखिर जिनके नाम पर रांची में एक जयपाल सिंह स्टेडियम भी था, उस स्टेडियम के आकार को भी क्यों छोटा कर दिया गया?  उस स्टेडियम में अटल स्मृति वेंडर मार्केट क्यों बना दिया गया? बनाना भी था तो जयपाल सिंह के नाम पर वेंडर मार्केट बनाया जा सकता था, क्योंकि स्टेडियम तो जयपाल सिंह के नाम पर था।

सरकार बदलते ही अटल स्मृति वेंडर मार्केट का नाम बदलकर जयपाल सिंह स्मृति वेंडर मार्केट हो जायेगा

कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता थियोडोर किड़ो तो साफ कहते है कि अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर तो बहुत सारी चीजें और भी कहीं बनाई जा सकती थी, पर जो जयपाल सिंह के नाम से पहले से ही स्टेडियम है, उस स्टेडियम में अटलजी के नाम पर वेंडर मार्केट खोलना, किसी भी प्रकार से सही नहीं ठहराया जा सकता, ये जो भी हुआ हैं, वो गलत है और उसका वे लोग प्रायश्चित करेंगे तथा सभी से सहयोग भी लेंगे। थियोडोर किड़ो का कहना था कि जिस दिन कांग्रेस सत्ता में आ गई, इस वेंडर मार्केट का नाम बदला जायेगा और उसका नाम होगा मरांग गोमके जयपाल सिंह स्मृति वेंडर मार्केट, क्योंकि जयपाल सिंह हमारे आन-बान-शान के प्रतीक है, और राज्य सरकार ने जयपाल सिंह के सम्मान से खेलने की कोशिश की है, जो गलत है।

ऐसे तो रांची में कई स्थानों पर जयपाल सिंह को उनके जन्म दिन पर लोगों ने याद किया, पर सीएम रघुवर दास द्वारा नहीं याद किया जाना, सरकार द्वारा उन्हें सम्मान नहीं देना, लोगों को खल गया, बुद्धिजीवियों का कहना था कि राजनीति खुब करिये, पर अपने पूर्वजों और जो खासकर दिवंगत हो गये, उनके साथ राजनीति करना शोभा नहीं देता, क्योंकि जो देश का होता है, वह सभी का होता है, जयपाल सिंह तो सभी के थे, शायद सीएम रघुवर दास को पता नहीं कि जब उनके नेतृत्व में भारतीय हॉकी टीम ओलम्पिक मे स्वर्ण जीती थी, तो उससे पूरे भारतवासियों का मस्तक गर्व से ऊंचा हो गया था।

Krishna Bihari Mishra

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हमारे राज्य के होनहार मुख्यमंत्री कितने दयालु हैं, कितने परोपकारी हैं, वे झारखण्ड की जनता पर कितना दया बरसाते हैं। देखिये न, आजकल कही भी वे जाते हैं तो बच्चों को गोद में ले लेते हैं। कहीं बुजुर्गों को देखते हैं, तो पांव छू लेते हैं। अपने लोगों को देखते हैं तो उनके साथ सेल्फी लेने लगते हैं। अपनी आरती उतारने को बेकरार पत्रकारों को जब वे देखते हैं तो वे उनके साथ चाय पर चर्चा करने लगते हैं।

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