गांधी की प्रतिमाओं को फूल-मालाओं से लादने से अच्छा है कि उनके चरित्र को आज के नेता आत्मसात् करें

मैं जब कभी उस राह से गुजरता हूं, जहां महात्मा गांधी की प्रतिमा होती है, मुझे लगता है कि महात्मा मुझसे कुछ कहना चाहते है, कभी-कभी उनकी बाते सुनने की कोशिश करता हूं, और जो मुझे सुनाई देता है, वह चाहता हूं कि अपने बच्चों तथा अपने चाहनेवालों तक पहुंचा दूं। महात्मा गांधी उच्चकोटि के धार्मिक व आध्यात्मिक व्यक्ति थे, श्रीमद्भगवद्गीता के प्रति उनकी निष्ठा, सत्य का निरन्तर अन्वेषण और ईश्वर पर अटूट विश्वास उन्हें सामान्य से महात्मा की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया।

मैं जब कभी उस राह से गुजरता हूं, जहां महात्मा गांधी की प्रतिमा होती है, मुझे लगता है कि महात्मा मुझसे कुछ कहना चाहते है, कभी-कभी उनकी बाते सुनने की कोशिश करता हूं, और जो मुझे सुनाई देता है, वह चाहता हूं कि अपने बच्चों तथा अपने चाहनेवालों तक पहुंचा दूं। महात्मा गांधी उच्चकोटि के धार्मिक व आध्यात्मिक व्यक्ति थे, श्रीमद्भगवद्गीता के प्रति उनकी निष्ठा, सत्य का निरन्तर अन्वेषण और ईश्वर पर अटूट विश्वास उन्हें सामान्य से महात्मा की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया।

उनका सत्य, स्वच्छता व आग्रह किसी चहारदिवारी में कैद नहीं था, ठीक उसी प्रकार जैसे सूर्य की किरणें, हवा और जल किसी से भेदभाव नहीं करती, वे भी किसी भी भेदभाव के आजीवन विरोधी रहे हैं, उनका मानना था कट्टरता हमें हिंसक बनाती है और सत्य, स्वच्छता व सत्य के लिए आग्रह हमें मानवता के उच्च बिंदू तक ले जाती है।

कभी-कभी सोचता हूं कि लोग महात्मा गांधी को उनके जन्मदिन पर ही क्यों याद करते हैं, उन्हें तो निरन्तर याद करना चाहिए, कभी-कभी ये भी सोचता हूं कि महात्मा गांधी की प्रतिमा पर जो लोग माल्यार्पण करते है, वे खुद ही महात्मा गांधी बनने का प्रयास क्यों नहीं करते, उनके पदचिन्हों पर चलने की कोशिश क्यों नहीं करते, ताकि आनेवाले समय में लोग यह कह सके कि महात्मा गांधी के बाद, अगर कोई दूसरा महात्मा हुआ तो यही है, यही है, यहीं है।

सच्चाई यही है कि आज कोई व्यक्ति या परिवार का सदस्य महात्मा गांधी बनना ही नहीं चाहता और न ही अपने बच्चों को महात्मा गांधी बनाना चाहता है, शायद उसे अपने बच्चों को सूट-बूट में देखना, शानो-शौकत की जिंदगी जीना, दिखावे के लिए वो हर काम करना, जिसे सत्य या ईश्वर इजाजत नहीं देता, ज्यादा पसन्द आने लगा है, और जब ये ही चीजें पसन्द आयेंगी तो फिर वहीं होगा, जो आज हम देख रहे हैं।

इन दिनों स्वच्छता का शोर है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में कहा था कि 2019 में जब हम महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रहे होंगे तब हम पूरे भारत को स्वच्छ बना सकें, ऐसा प्रयास कर, स्वच्छ भारत का सपना सच कर, महात्मा गांधी को श्रद्धाजंलि देंगे, ऐसा प्रत्येक भारतीय को संकल्प लेना चाहिए और सरकार इस ओर प्रयास में लगी है। इस वक्तव्य को सुनने के बाद, देखने को मिला कि प्रधानमंत्री दिल्ली की सड़कों पर झाड़ू लेकर निकल पड़ें, कई समाचार चैनलों ने भी पीएम के इस संकल्प के साथ हो लिए, केन्द्र सरकार और राज्य सरकार (भाजपा शासित) के कार्यालयों में भी स्वच्छता को जमीन पर उतारने के लिए सफाई अभियान निकल पड़ा।

स्वयं भाजपा में ही ऐसे कई नेता, जिन्होंने कभी किसी जिंदगी में झाड़ू नहीं पकड़ा था, नये-नये झाड़ू लेकर, अपने समर्थकों के साथ मीडिया को बुलाकर, साफ सड़कों पर कचरे फैलाएं और उन्हें साफ करने की नौंटकी किया और दूसरे दिन अखबारों में समाचार छपवाएं।

अब हम भाजपा के लोगों एवं प्रधानमंत्री से ही पूछेंगे कि क्या महात्मा गांधी ने ऐसी ही स्वच्छता की परिकल्पना की थी? क्या जब भारत या दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी ने स्वच्छता को जमीन पर उतारने का प्रयास किया था, अपने शौचालय की सफाई जब वे स्वयं करने का प्रयास करते थे तो क्या वे मीडिया को बुलवाते थे कि वे आये और उनके कार्यों को अपने अखबारों में प्रमुखता दें या ढोल पिटवाते थे, हमें तो नहीं लगता कि गांधी को ऐसा करने में विश्वास था, सच्चाई यही है कि जब आप कोई कार्य ढोल पिटने-पिटवाने या अपना चेहरा चमकाने के उद्देश्य से करते है तो इससे सिर्फ आपका चेहरा चमकता है, न कि देश का चेहरा चमकता या स्वच्छ होता है।

बिहार-झारखण्ड का एक लोक-पर्व है – छठ। छठ चूंकि तीन प्रकार का होता है, एक चैत्र, दूसरा भाद्रपद और तीसरा कार्तिक माह में. चैत्र और भाद्रपद के छठ तो बहुत कम होते हैं और ये बहुतेरे जगह दिखाई नहीं पड़ता पर कार्तिक माह का छठ तो विशालता को प्रकट कर देता है, इस कार्तिक माह में आप बिहार-झारखण्ड के किसी इलाके में चले जाइये, आप गली-मोहल्ले, तालाब, कूएं, नहर, नदी, खेत-खलिहान, आपको एक जगह भी गंदगी नहीं मिलेगी, कारण क्या है? तो लोगों का पर्व में स्वच्छता के महत्व को जानना तथा उसे आत्मा से जोड़ लेना, जिसका परिणाम सामने नजर आता है।

झारखण्ड के आदिवासी बहुल गांवों में तो आप साल के 365 दिनों में कभी भी चले जाये, वहां तो आपको ऐसी सफाई मिलेगी, कि ऐसी सफाई आपको प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति भवन या प्रधानमंत्री के घर में भी देखने को नहीं मिलेगी, ये मैं दावे के साथ कह सकता हूं, क्योंकि हमने उन आदिवासी बहुल गांवों में एक नहीं कई बार, दिन बिताए हैं, उन पर समाचार भी बनाएं, समाचार था – जियो तो ऐसे जियो।

ठीक इसी प्रकार की स्वच्छता की महत्ता को कभी महात्मा गांधी ने अपने चरित्र बल के द्वारा बताने की कोशिश की, लोगों ने स्वीकारा और फिर शुरु हुआ स्वच्छता अभियान। ऐसे तो भारत का स्वच्छता से बहुत पुराना नाता रहा है, तभी तो यहां नदियों को मां कहकर बुलाने की परंपरा रही है और पत्थर तक पूजे जाते है। (जिस दिन मौका मिलेगा तो इस पर मैं और लिखूंगा, फिलहाल स्वच्छता और गांधी के दृष्टांत को यहां इतना ही।)

वर्तमान में स्वच्छता को गांधी से जोड़ने का प्रयास किया गया, पर गांधी के मूल सिद्धांतों व चरित्र को न तो हमारे प्रधानमंत्री ने आत्मसात् करने की कोशिश की और न ही ऐसा न करने के कारण लोगों ने इस स्वच्छता अभियान से खुद को जोड़ा, सभी ने माना कि सरकार नौटंकी कर रही है, और इस स्वच्छता अभियान की करीब-करीब हर जगह हवा निकल गई, ठीक उसी प्रकार जैसे सरकार की विभिन्न योजनाओं की हवा निकल जाती है।

जरा महात्मा गांधी को देखिये, सभी जानते है कि जब वे महात्मा नहीं थे, ब्रिटेन में पढ़ाई कर रहे थे, उस दौरान, वे फैशन के दिवाने थे, खूब सूट-बूट पहना करते, पर जैसे ही उन्हें भारत और भारत के लोगों की दरिद्रता देखी, उन्होंने भारतीयता के रंग में रंगकर सदा के लिए लंगोटी पहन ली, पर आज के गांधी के नाम पर राजनीति करनेवाले नेताओं को देखिये, खुद प्रधानमंत्री को देखिये, जब वे संघ के प्रचारक थे, जब वे शुरुआती दौर में गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो वे साधारण कपडों में नजर आते थे, पर जैसे-जैसे इनके मुख्यमंत्रीकाल का समय गुजरता गया और फिर प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे, जरा इनके पहनावा को देख लीजिये, आप दंग रह जायेंगे। यानी गुजरात से ही आनेवाला व्यक्ति जो पहले मुख्यमंत्री और फिर बाद में प्रधानमंत्री पद तक पहुंचता है, पर गांधी के इस अमूल्य चरित्र को नजरंदाज कर देता है, जबकि लाल बहादुर शास्त्री जिनकी आज जयंती है, वे जब तक जीवित रहें गांधी के आदर्श को अपनाया, इसे कभी अपने आंखों से ओझल होने नहीं दिया, तभी तो लाल बहादुर शास्त्री भी मरणोपरांत, करोड़ों भारतीयों के दिल में उसी प्रकार बसे हैं, जैसे गांधी।

आगे देखिये, गांधी की पत्नी कस्तूरबा, जो गांधी जी के साथ हमेशा से उनके विचारों, उनके आत्मा तथा गांधी से सेवा भाव से जुड़ी रही, कभी गांधी से कुछ मांगा नहीं, सिर्फ और सिर्फ उनके आदर्शों को लेकर चली और मर गई, न तो गांधी ने कस्तूरबा को और न कस्तूरबा ने गांधी को छोड़ा, और एक आदर्श स्थापित किया, पर आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जो गांधी-गांधी भजते है, उन्हें देख लीजिये, पता लग जायेगा कि वे गांधी के आदर्शों को अपने जीवन में कैसे उतारते हैं?

मैं तो बार-बार कहता हूं कि जो भी नेता, गांधी जयंती के दिन, महात्मा गांधी की प्रतिमा पर माल्यापर्ण करने को आतुर रहते है, सिर्फ गांधी के चरित्र को उतार लें तो भारत हर क्षेत्र में शिखर पर  होगा, पर यहां के नेताओं ने किया क्या है? महात्मा गांधी के आदर्शों, चरित्रों और उनके सत्य का प्रत्येक दिन श्राद्ध किया और उनकी जयंती के दिन उनकी पत्थर की प्रतिमाओं को फूल-मालाओं से लाद दिया, अरे भाई ऐसा करके आप महात्मा गांधी को क्यों अपमानित करते हो, क्या कभी गांधी ने कहा था क्या, कि मरणोपरांत हमेशा, उनकी प्रतिमाओं पर फूल-माला चढ़ाते रहना।

आज ही एक महिला अधिवक्ता से हमारी लंबी बातचीत हुई। बातचीत का कारण था, कि भाजपा के कुछ पतित कार्यकर्ताओं द्वारा उनके पिताजी को सोशल साइट पर गाली देने एवं आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करने के बाद, उनका विचलित होना तथा उन पतित कार्यकर्ताओं को महिला अधिवक्ता द्वारा जवाब देना। जब महिला अधिवक्ता से हमारी लंबी बातचीत हुई तो पता चला कि गाली देनेवाला एवं आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करनेवाला भाजपा का वह पतित कार्यकर्ता और कोई नहीं बल्कि दूर के रिश्तेदार का अपना भाई है।

अब पीएम नरेन्द्र मोदी ही बताएं कि वे कैसा भारत बना रहे है, गांधी का भारत, जिसमें सभी एक दूसरे का सम्मान करें, मानवीय मूल्य हो, सत्य व स्वच्छता से जिनका आत्मीय स्तर का नाता हो, या अपने जैसा भारत, जो बोले कुछ और करे कुछ, जो घर-घर में ही आग लगा दें, एक दूसरे को गाली दे, कोई किसी की सुने ही नहीं और जब ज्यादा हो जाये तो उसे गोलियों से नाथूराम गोडसे की तरह गांधी के शरीर को ही ढेर कर दें, मैंने गांधी के शरीर का यहां प्रयोग इसलिए किया क्योंकि दुनिया का कोई मोदी, गांधी की आत्मा को कभी मार ही नहीं सकता, क्योंकि जहां भी सत्य होगा, अहिंसा होगी, स्वच्छता होगा, ईश्वर के प्रति गहरी निष्ठा होगी, वहां गांधी खुद ब खुद दिखाई पड़ जायेंगे।

फिलहाल, हमें कहने में ये तनिक भी गुरेज नहीं कि इस सोशल साइट के युग में, एक व्यक्ति विशेष की पूजा करने की शुरु हुई नई परम्परा के युग में गांधी के सिद्धांतों-विचारों पर ग्रहण लगाने, उसे समाप्त करने की जो नई विचारधारा शुरु हुई है, उससे मुकाबला करने का समय आ चुका है, हम सब को चाहिए कि इस गंदी और पतित विचारधारा से मुकाबला करने के लिए आज से ही गांधी के सत्याग्रह को अपना हथियार बनाएं और उसका मुकाबला करें, क्योंकि गांधी ही भारत की पहचान है, न कि मोदी भारत की पहचान है। गांधी हमारी थाती है, इन्हें हर हाल में बचाना होगा, क्योंकि पं. प्रदीप ने ऐसे ही नहीं लिख दिया था या गाया था कि…

जिस दिन तेरी चिता जली रोया था महाकाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल… रघुपति राघव, राजा राम…

Krishna Bihari Mishra

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शास्त्रीजी के जन्मदिन पर किसानों पर लाठी चले, आंसू गैस के गोले दागे जाये, तो ये दुर्भाग्य ही है

Tue Oct 2 , 2018
आज देश के सर्वश्रेष्ठ, बहुत ही प्यारे-न्यारे, चरित्रवान् हमारे लाल बहादुर शास्त्री जी की जयन्ती है, जिन्होंने नारा दिया था – जय जवान, जय किसान, और देश का दुर्भाग्य देखिये, दिल्ली-यूपी सीमा पर जवान और किसान आमने सामने हैं। किसान अपनी समस्याओं को लेकर, अपनी पूर्व सूचना के अनुसार दिल्ली कूच करना चाहते हैं, पर उन्हें जवानों के द्वारा दिल्ली में प्रवेश करने नहीं दिया जा रहा, सरकार के आदेश से, ये जवान किसानों को दिल्ली जाने से रोक रहे हैं, इसके लिए वे लाठी चार्ज भी किये है, आसूं गैस के गोले भी छोड़ रहे हैं, पर किसान डटे है।

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