मानना पड़ेगा झारखण्ड के डा. इरफान अंसारी को, जिसने RPC के अध्यक्ष के आह्वान की ही धज्जियां उड़ा दी, जिन्हें मंत्री का विरोध करना था, वे उनका इंटरव्यू चलाने में, उनके साथ बेहतर संबंध बनाने पर अब ज्यादा जोर दे रहे
मानना पड़ेगा झारखण्ड के स्वास्थ्य मंत्री डा. इरफान अंसारी को, जिसने रांची के पत्रकारों को अपने सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया, जो कल तक पत्रकारों और मीडिया की स्वतंत्रता के समर्थकों से आग्रह कर रहे थे कि वे नीचे दिये गये पोस्टर को अपनी प्रोफाइल फोटो बनाकर इस हमले का विरोध करें। उसी ने सबसे पहले अपनी प्रोफाइल फोटो देखते ही देखते चेंज कर ली, जबकि अन्य पत्रकारों पर आज भी नीचे दी गई प्रोफाइल फोटो स्पष्ट रूप से दिख रही है।

रांची प्रेस क्लब का अध्यक्ष शंभु नाथ चौधरी अपने फेसबुक पर 28 अप्रैल की रात्रि 23:41 पर लिखता है कि “झारखंड के हज़ारीबाग़ में मंत्री डॉ. इरफान अंसारी से सवाल पूछने पर पत्रकारों पर जिस तरह हमला हुआ, वह बेहद निंदनीय और शर्मनाक है। जब सवाल पूछना गुनाह हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र ख़तरे में है। हम पत्रकारों और मीडिया की स्वतंत्रता के समर्थकों से आग्रह करते हैं कि वे इस पोस्टर को अपनी प्रोफाइल फोटो बनाकर इस हमले का विरोध करें।”
अब सवाल उठता है कि जब रांची प्रेस क्लब के अध्यक्ष ने अपनी प्रोफाइल चेंज कर ही ली तो वो खुद बताए कि क्या हजारीबाग के पत्रकार के साथ हुए दुर्व्यवहार का मामला सलट गया? क्या डा. इरफान अंसारी ने पत्रकारों से माफी मांग ली? और जब ये सब हो ही गया तो फिर आज हजारीबाग में पत्रकारों ने उक्त घटना को लेकर आंदोलन क्यों किया? आज बोकारो के सर्किट हाउस में पत्रकारों की इस मामले में बैठक क्यों हुई और जिसमें सर्वसम्मति से चरणबद्ध आंदोलन चलाने का निर्णय क्यों लिया गया? आंदोलन के पहले चरण में दो मई को काला बिल्ला लगाकर प्रोटेस्ट मार्च निकालने का निर्णय क्यों लिया गया?
लगता है कि रांची प्रेस क्लब के अध्यक्ष के इसी ढुलमुल नीतियों व निर्णयों को लेकर रांची के ज्यादातर संपादकों/पत्रकारों ने उसकी बात नहीं मानी और उनमें किसी ने भी अपने प्रोफाइल फोटो नहीं चेंज किए। जबकि अन्य कई पत्रकार जो रांची प्रेस क्लब से जुड़े हैं, उन्होंने अपना प्रोफाइल चेंज किया था। सच्चाई यह भी है कि इस प्रकरण पर पत्रकारों का ही कई ग्रुप बन चुका है। जिनमें एक ग्रुप तो इस प्रकरण पर मुखर है और मंत्री इरफान अंसारी को छोड़ने नहीं जा रहा। जबकि दुसरा ग्रुप अब धीरे-धीरे मंत्री इरफान अंसारी के चरणकमलों में गिर जाने के लिए बेताब है।
एक युवा पत्रकार ने आज विद्रोही24 से फोन पर कहा कि अगर मंत्री इरफान अंसारी ने कल ये कहा था कि पत्रकारों की दुकानदारी उन्हीं की बदौलत चल रहा है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं हैं। मंत्री के पास इस बात के पुख्ता सबूत है कि कैसे महत्वपूर्ण अवसर पर मंत्री के आवास पर जाकर पत्रकारों का समूह पंक्तिबद्ध होकर, उनके यहां पंजी पर हस्ताक्षर कर उपकृत होता रहा है। ऐसे में किसकी हिम्मत जो मंत्री इरफान अंसारी से माफी मंगवा लें।
उसी युवा पत्रकार ने यह भी कहा कि रांची प्रेस क्लब से जुड़े मुट्ठी भर लोग जब क्लब पर धरना-प्रदर्शन कर रहे थे, उसी वक्त कई रांची प्रेस क्लब से जुड़े पत्रकार मंत्री इरफान अंसारी का विरोध करने के बजाय उनका इंटरव्यू लेने के लिए बेताब थे। कई तो उनका इंटरव्यू लिया और चलाया भी। आखिर इतनी बेताबी इन पत्रकारों को क्यों थी? दरअसल जो मंत्री ने जोरदार ढंग से कहा कि पत्रकारों की दुकानदारी उन्हीं से चलती है, उसका ही यह परिणाम था।
आश्चर्य देखिये। राज्य की राजधानी रांची से निकलनेवाले चार महत्वपूर्ण अखबारों के कारनामों की। डा. इरफान अंसारी के विरोध में चल रहे पत्रकारों के इस कथित आंदोलन को मात्र दो अखबारों प्रभात खबर और दैनिक भास्कर ने ही जगह दी। वो भी छोटे से एक कॉलम में समेट दिया। जबकि हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण ने इनके खबरों से दूरियां बना ली। शायद ये दोनों अखबार, डा. इरफान अंसारी को दुखी करना नहीं चाहते थे, क्योंकि डा. इरफान अंसारी कोई सामान्य विभाग तो चला नहीं रहे। मामला विज्ञापन और कृपा पाने का भी है। ऐसे में भले ही पत्रकार पिटा जाये या उनके साथ कुछ हो जाये। इन बड़े अखबारों को इससे क्या मतलब? ये सब तो मुखर होते हैं, जब इनके संपादकों पर कोई हमला करता है, जैसे योगेन्द्र तिवारी ने आज के केन्द्रीय सूचना आयुक्त और कल के प्रभात खबर के प्रधान संपादक पर हमले बोले थे। जिसे रांची की जनता ने खुलेआम देखा।
इसी बीच जिस पत्रकार की कथित पिटाई हुई। अब उसे लेकर दो पक्ष आमने सामने हो गये। देखा जा रहा है कि डा. इरफान अंसारी के पक्ष में धीरे-धीरे उनके समुदाय के लोग गोलबंद होते जा रहे हैं और जो भी किसी सोशल साइट पर डा. इरफान अंसारी के खिलाफ लिख रहा है, वे उसके पोस्ट पर खुब अनाप-शनाप लिख रहे हैं और उसे गोदी मीडिया बताकर चुप कराने का असफल प्रयास कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर जिस पत्रकार पर हमला हुआ, उसके पक्ष में कई राजनीतिक दल और उसके जाति समूह के संगठनों ने चिन्ता जाहिर करनी शुरु कर दी है। तेली अधिकार मंच ने तो उक्त पत्रकार के समर्थन में प्रेस कांफ्रेस तक आयोजित कर दिया और इरफान अंसारी के खिलाफ आंदोलन चलाने की बात कर दी। आश्चर्य यह भी है कि उक्त पत्रकार उस प्रेस कांफ्रेस में मौजूद भी था। अब सवाल यहां फिर उठता है कि क्या पत्रकार की लड़ाई जातीय समूह से जुड़े संगठन लड़ेंगे और ऐसा होता है तो फिर क्या वो पत्रकार, पत्रकार कहलाने लायक भी है, जो जातीय संगठन का सहारा लेता है?
इसी बीच कांग्रेस की ओर से एक बात अच्छी लगी कि उसकी पार्टी की नेता अम्बा प्रसाद ने सोशल साइट पर इस मामले में बहुत अच्छी प्रतिक्रिया दी। प्रतिक्रिया यह है – मीडिया के माध्यम से यह जानकारी मिली है कि 27/04/2026 को न्यूज़ 18 के पत्रकार सुशांत सोनी और आशीष साव के साथ एक कार्यक्रम के दौरान, मंत्री इरफान अंसारी जी से सवाल पूछने पर कुछ अज्ञात लोगों द्वारा दुर्व्यवहार किया गया। उस समय मैं पश्चिम बंगाल में थी, इसलिए घटना की प्रत्यक्ष जानकारी मेरे पास नहीं है। यदि ऐसी घटना हुई है, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

AICC सचिव के रूप में मैं इस प्रकरण से मर्माहत हूँ और मानती हूँ कि पत्रकारों के साथ सम्मानजनक व्यवहार लोकतंत्र की मूल भावना है। पत्रकारों का कार्य जनता के मुद्दों को उठाना और सवाल पूछना है| ऐसे में उनके साथ किसी भी प्रकार का दुर्व्यवहार स्वीकार्य नहीं हो सकता। मैं संबंधित पक्षों से अपेक्षा करती हूँ कि मामले की गंभीरता को देखते हुए दोषी लोगों की पहचान कर आवश्यक कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। संवाद, सम्मान और संयम ! यही लोकतंत्र की असली ताकत है, और इन्हें बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।
