क्या सचमुच धर्म ज्यादातर भरे पेट लोगों की बौद्धिक अय्याशी का विषय है?

कुछ ही दिन पहले की बात है। एक हमारे फेसबुक फ्रेंड ने एक छोटी सी आलेख में लिखा कि धर्म ज्यादातर भरे पेट लोगों की बौद्धिक अय्याशी का विषय है। जिस मित्र ने ये बाते लिखी, उनके बारे में थोड़ा परिचय देना, मैं जरुरी समझता हूं। ये जनाब एक बहुत बड़े चैनल में काम करते हैं। इनके फेसबुक मित्रों की संख्या भी बहुतायत हैं। बहुत अच्छा लिखते हैं। बहुत अच्छा बोलते भी हैं। अच्छे इंसान भी हैं। मैं इन्हें पसंद भी करता हूं।

कुछ ही दिन पहले की बात है। एक हमारे फेसबुक फ्रेंड ने एक छोटी सी आलेख में लिखा कि धर्म ज्यादातर भरे पेट लोगों की बौद्धिक अय्याशी का विषय है। जिस मित्र ने ये बाते लिखी, उनके बारे में थोड़ा परिचय देना, मैं जरुरी समझता हूं। ये जनाब एक बहुत बड़े चैनल में काम करते हैं। इनके फेसबुक मित्रों की संख्या भी बहुतायत हैं। बहुत अच्छा लिखते हैं। बहुत अच्छा बोलते भी हैं। अच्छे इंसान भी हैं। मैं इन्हें पसंद भी करता हूं। जनाब को कई संस्थाओं ने सम्मानित भी किया है।

ईश्वर करें, खूब सम्मानित हो। कई चैनलों के मालिक भी बन जाये। आजकल तो चैनलों के मालिक बनना, या किसी चैनल में एक अच्छी पकड़ बनाना बहुत ज्यादा आसान है, बशर्ते एक अच्छा पत्रकार या एक अच्छा इंसान बनना। हम चाहेंगे कि वे एक अच्छा पत्रकार या एक अच्छा इंसान बने, पर उन्हें क्या बनना हैं, ये तो उन्हें ही डिसाइड करना है, पर मैं देख रहा हूं कि जनाब कुछ ज्यादा बनने के चक्कर में कहीं-कहीं डिरेल्ड हो जा रहे हैं, जो न तो उनके लिए और न ही समाज के लिए बेहतर होगा, क्योंकि वर्तमान में पत्रकार और पत्रकारिता दोनों सामाजिक मूल्यों के आगे धराशायी हो रहे है।

हमारा मानना है कि जिसका जो विषय है, वह उस विषय पर व्याख्यान दें तो ज्यादा अच्छा लगता है, पर हर विषय में टांग अड़ाकर, वाहवाही लूटने की कोशिश शर्मनाक ही नहीं, बल्कि अपराध हैं। जैसे – किसी के द्वारा धर्म को भरेपेट लोगों के लिए बौद्धिक अय्याशी बता देना। हमारा यह भी मानना है कि पहले धर्म को जानिये तब व्याख्यान दीजिये। दुनिया में किसी भी व्यक्ति विशेष के द्वारा चलाया गया पंथ, कभी भी धर्म नहीं हो सकता, वह पंथ हो सकता है, क्योंकि धर्म उस पंथ को चलानेवाले व्यक्ति विशेष के पूर्व भी था और आगे भी रहेगा, इसे कोई चुनौती नहीं दे सकता।

पूजा करना, नमाज पढ़ना, चर्च में जाकर कैंडल जलाना ये कभी धर्म न था और न ही हो सकता है। धर्म का अर्थ ही नहीं, बल्कि उसके मर्म को समझिये। धर्म पूर्णतः संस्कृत शब्द है। जो धृ धातु से बना है। जिसका अर्थ होता है, धारण करना। क्या धारण करना है? तो स्पष्ट है सत्य धारयति धर्मः। सत्य को धारण करना ही धर्म है। अब कोई हमें ये बताए कि सत्य को धारण करना, कहां से बौद्धिक अय्याशी का विषय हो गया।

ये विडम्बना है कि ज्यादातर लोग अपने देश में पूजा पद्धति को ही धर्म समझ लेते हैं और फिर अपने इच्छानुसार दिये जाते हैं, जबकि धर्म का इससे कोई लेना देना नहीं। धर्म तो सिर्फ सत्य को अंगीकृत करने से हैं। एक बार जब मैं ईटीवी रांची में कार्यरत था तो मैं रथयात्रा के दौरान रांची के जगन्नाथपुर मंदिर गया। वहां एक परिवार अपने पूरे परिवार तथा मित्र मंडली के साथ सत्यनारायण भगवान की पूजा में तल्लीन था। तभी मैंने देखा कि वहीं पर एक चबूतरे पर 25-26 साल का युवा और कोई 23-24 साल की लड़की बैठे थे। मैंने जगन्नाथमंदिर में बैठे इन युवाओं के पास गया और एक बाइट लेनी चाही।

मेरे ईटीवी के बूम को देखकर, वह युवा बोला, मैं धार्मिक नहीं हूं और मुझे इन सब से कोई लेना-देना नहीं हैं। तभी मैंने उस युवा से कहा अगर तुम धार्मिक नहीं हो तो क्या हो? अधार्मिक हो, कुसंस्कारी हो, अत्याचारी हो? ऐसा बोलना था कि वह युवा हम पर क्रोधित हो गया, उसके परिवार वाले जो सत्यनारायण की पूजा में व्यस्त थे, सभी छोड़-छाड़कर मेरी ओर लपके। मैंने कहा कि इस युवा से मैंने धर्म से संबंधित एक बाइट लेनी चाही, इसने कहा कि वह धार्मिक नहीं हैं, तभी मैंने कहा कि अगर वह धार्मिक नहीं है तो क्या है, अधार्मिक है, कुसंस्कारी है, अत्याचारी है। इतने में ही यह गरम हो गया है।

दरअसल धर्म का मतलब क्या है? न तो ये युवा जानता हैं और न ही आप सभी जानते हैं। भला जिस देश में, जहां का बच्चा अपने माता-पिता को सम्मान करता हैं, अपने गुरुजनों का सम्मान करता हैं, जहां समाज और देश के प्रति ईमान रखता हैं, वो भला अधार्मिक कैसे हो सकता है, क्योंकि धर्म तो यहीं कहता है कि सत्य को धारण करो, तो सत्य है क्या? सत्य तो यहीं है, सभी का सम्मान करो, किसी को बुरा मत कहो, किसी के बारे में बुरा मत सुनो, न किसी की बुराई देखने की कोशिश करो, जो काम मिले, उसमें ईमानदारी बरतो, हमेशा सत्य बोलो, किसी के प्रति अपने मन में घृणा मत लाओ, दुनिया में जितने भी लोग है, सभी अपने परिवार हैं, सभी के प्रति अपने हृदय में प्रेम लाओ, अगर प्रेम ला दिये तो तुम धार्मिक हो, धर्म के महत्व को जानते हो, नहीं तो तुम लाख पूजा कर लो, नमाज अदा कर लो, चर्च में कैंडल जला लो, धर्म के आगे सब बकवास है।

सच्चाई तो यह है कि धर्म, सत्य है, शाश्वत है, इसे कोई झूठला नहीं सकता, इसका हुलिया नहीं बदल सकता और न ही इसे कोई चुनौती दे सकता, और जो चुनौती देने की बात करता है, दरअसल वह चुनौती नहीं दे रहा, बल्कि वह स्वयं को नष्ट करने पर तुला है, इसे उस व्यक्ति को स्वीकार कर लेना चाहिए, क्योंकि उपनिषद कहता है – धर्मों रक्षति रक्षितः। धर्म की आप रक्षा करो, धर्म स्वतः तुम्हारी रक्षा करेगा, पर तुम तो धर्म को जानते ही नहीं, और चल दिये, इसे बौद्धिक अय्याशी में लपेट देने, तो फिर आपको मैं क्या कहूं? धार्मिक या अधार्मिक?

Krishna Bihari Mishra

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