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भाजपा की नई मीडिया टीम या भाजपा प्रदेश अध्यक्ष का कृपा-पात्र महासम्मेलन?

महीनों के इंतज़ार के बाद भाजपा की नई प्रदेश मीडिया टीम की घोषणा हो गई। कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि इस बार पार्टी ऐसे लोगों को आगे लाएगी जो मीडिया में पार्टी का पक्ष मजबूती से रख सकें, विपक्ष के आरोपों का जवाब दे सकें और संगठन की आवाज़ बन सकें। लेकिन सूची सामने आते ही कई लोगों की पहली प्रतिक्रिया थी—“यह मीडिया टीम है या कृपा-पात्रों की सूची?”

सूची में कई ऐसे नाम दिखाई दिए जिन्हें देखकर कार्यकर्ता एक-दूसरे से पूछते नज़र आए—“ये आख़िर करते क्या हैं?” कुछ लोग वर्षों से मीडिया से उतने ही दूर रहे हैं जितना कोई मछली रेगिस्तान से। न प्रेस कॉन्फ्रेंस, न मीडिया ब्रीफिंग, न टीवी डिबेट में कोई पहचान, लेकिन अचानक वे मीडिया प्रबंधन के महारथी घोषित कर दिए गए। लगता है इस बार मीडिया अनुभव से ज़्यादा महत्व किसी और योग्यता को मिला है।

कई नियुक्तियाँ देखकर ऐसा महसूस होता है कि मीडिया में बोलने की क्षमता से अधिक महत्व अध्यक्ष जी के प्रति अटूट श्रद्धा को दिया गया है। जिन लोगों की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि समय-समय पर नेतृत्व की प्रशंसा में कसीदे पढ़ना रही है, वे इस सूची में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करने में सफल रहे हैं। सोशल मीडिया पर अध्यक्ष जी के समर्थन में चौबीसों घंटे सक्रिय रहने वाले योद्धाओं को भी संगठन ने निराश नहीं किया। आखिर प्रतिभा का सम्मान होना ही चाहिए, चाहे वह प्रतिभा तर्क की हो या ताली की।

सबसे दिलचस्प वे चेहरे हैं जिनके लिए कैमरा आज भी किसी प्रतियोगी परीक्षा से कम नहीं है। कैमरा देखते ही जिनकी आवाज़ धीमी पड़ जाती है और सवाल सुनते ही जिनके चेहरे पर चिंता की रेखाएँ उभर आती हैं, उन्हें फिर से मीडिया की जिम्मेदारी सौंप दी गई है। शायद नया सिद्धांत यही है कि मीडिया में वही सबसे सफल है जो मीडिया से सबसे कम बात करे।

आदित्य साहू ने मीडिया टीम नहीं, बल्कि विशाल पुनर्वास केन्द्र खोल दिया

झारखंड जैसे राज्य में इतनी विशाल मीडिया कमेटी देखकर ऐसा लगता है मानो संगठन ने मीडिया सेल नहीं, बल्कि पदाधिकारियों का एक विशाल पुनर्वास केंद्र खोल दिया हो। हालत यह है कि पार्टी में कार्यकर्ता कम और पदाधिकारी अधिक दिखाई देने लगे हैं। जिस संस्कृति पर भाजपा वर्षों तक कांग्रेस का मज़ाक उड़ाती रही, आज वही मॉडल बड़े आत्मविश्वास के साथ अपनाया जा रहा है—हर व्यक्ति पदाधिकारी, काम करने वाला व्यक्ति दुर्लभ प्रजाति।

सूची आने के बाद कार्यकर्ताओं के बीच प्रदेश अध्यक्ष की कार्यशैली को लेकर भी चर्चा तेज़ हो गई। लोगों का कहना है कि संगठन चलाना और सभी को खुश रखना दो अलग-अलग बातें हैं। मजबूत नेतृत्व कभी-कभी कठिन फैसले लेता है और कुछ लोगों को नाराज़ भी करता है। लेकिन कमजोर नेतृत्व अक्सर पद बाँटकर संतुलन बनाने की कोशिश करता है। परिणाम यह होता है कि संगठन धीरे-धीरे गंभीर राजनीतिक संस्था कम और संतुष्ट पदाधिकारियों का क्लब अधिक दिखाई देने लगता है।

अब बात इस पूरी प्रक्रिया के सबसे मनोरंजक हिस्से की—गोपनीयता

बताया जाता है कि घोषणा से पहले कई लोगों को अलग-अलग बुलाकर कहा गया कि “आपको महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा रही है, लेकिन यह बात किसी को बताइएगा नहीं।” मज़ेदार बात यह रही कि यही संवाद लगभग हर उस व्यक्ति से बोला गया जिसे कोई न कोई पद मिलने वाला था। नतीजा यह हुआ कि आधी पार्टी को पहले से पता था कि किसे क्या मिलने वाला है। रहस्य ऐसा था जिसे सब जानते थे, लेकिन हर व्यक्ति को लगता था कि यह जानकारी केवल उसी के पास है।

जानकारों का मानना है कि यह पूरी प्रक्रिया केवल नियुक्ति नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक प्रबंधन का भी एक प्रयोग थी। पहले पद की सूचना दो, फिर एहसान का भाव पैदा करो और उसके बाद वफ़ादारी सुनिश्चित करो। ताकि हर नियुक्त व्यक्ति को यह महसूस होता रहे कि उसका चयन संगठन की आवश्यकता से नहीं, बल्कि किसी विशेष कृपा का परिणाम है।

लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती

सूची में शामिल कुछ नामों को लेकर संगठन और राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से तरह-तरह की चर्चाएँ भी सुनाई देती रही हैं। आरोप लगते रहे हैं कि कुछ लोग राजनीतिक प्रभाव और संगठनात्मक पहचान का उपयोग कर कथित तौर पर ठगी, भयादोहन, शोषण और वसूली जैसे कामों से जुड़े रहे हैं। यदि इन चर्चाओं और आरोपों में सच्चाई का अंश भी है, तो सवाल केवल उन व्यक्तियों पर नहीं, बल्कि चयन प्रक्रिया पर भी उठता है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या नियुक्तियों से पहले किसी प्रकार का मूल्यांकन हुआ था? क्या संगठन ने यह देखने की कोशिश की कि जिन लोगों को मीडिया में पार्टी का चेहरा बनाया जा रहा है, उनकी सार्वजनिक छवि क्या है? या फिर यह सब सवाल इसलिए अप्रासंगिक हो गए क्योंकि योग्यता और छवि से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत समीकरण थे?

इन आरोपों और चर्चाओं का विस्तृत खुलासा भविष्य के लिए छोड़ देते हैं। लेकिन इतना निश्चित है कि यदि तथ्यों और प्रमाणों के साथ इन मामलों की परतें खुलीं, तो कई लोगों को असहज प्रश्नों का सामना करना पड़ सकता है। तब शायद यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि कथित तौर पर चल रहे इन खेलों का लाभ केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित था या उसकी पहुँच कहीं और तक भी थी।

कुल मिलाकर यह सूची मीडिया टीम से अधिक कृपा-पात्रों की सूची प्रतीत होती है। पार्टी को ऐसे चेहरे चाहिए थे जो मीडिया में संघर्ष कर सकें, लेकिन तैयार होती दिख रही है एक ऐसी टोली जिसकी सबसे बड़ी विशेषज्ञता नेतृत्व की प्रशंसा में दिखाई देती है। अब देखना दिलचस्प होगा कि यह टीम विपक्ष से राजनीतिक लड़ाई लड़ती है या फिर अध्यक्ष जी की प्रशस्ति गान प्रतियोगिता में नए कीर्तिमान स्थापित करती है। फिलहाल कार्यकर्ताओं के बीच एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या यह मीडिया टीम है, या दरबार की नई बैठक व्यवस्था?

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