राजनीति

इंदौर में राज्यपाल रमेश बैस ने झारखण्ड के विश्वविद्यालयों की दुर्दशा की खोली पोल, अपना पीठ स्वयं थपथपाया, बताया कि उनके प्रयासों से कुछ सुधार हुआ

विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान द्वारा उच्च शिक्षा विभाग, मध्य प्रदेश, मध्य प्रदेश निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर, विक्रमशिला विश्वविद्यालय, उज्जैन और भारतीय विश्वविद्यालय संघ के तत्वावधान में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय परिसर, इंदौर में आयोजित दो दिवसीय ‘अखिल भारतीय संस्थागत नेतृत्व समागम- 2023’ के समापन समारोह में झारखण्ड के राज्यपाल रमेश बैस ने झारखण्ड की शिक्षा-व्यवस्था की दुर्दशा का जोरदार ढंग से बखान किया और अपनी पीठ भी स्वयं थपथपाई, वहां लोगों को बताया कि उन्होंने कैसे झारखण्ड की चौपट हो गई शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने का गंभीर प्रयास किया, तथा इसे पटरी पर लाने के लिए, वे अभी भी प्रयासरत है।

इसके पहले उन्होंने कहा कि आप सभी विद्वानों के बीच आकर उन्हें बहुत ही प्रसन्नता हो रही है। इस समागम में देश के विभिन्न हिस्सों से शिक्षा जगत के नीति-निर्माताओं ने अपनी सक्रिय भागीदारी निभाई है। उन्होंने कहा कि शिक्षा के माध्यम से मनुष्य में निहित प्रतिभाओं व शक्तियों का विकास होता है। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य में अंतर्निहित क्षमताओं की अभिव्यक्ति करना है। व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया में, व्यक्तित्व के समग्र विकास में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षा मनुष्य में ज्ञान एवं कौशल का विकास कर उसको एक योग्य नागरिक तो बनाती  ही है साथ साथ उस राष्ट्र और समाज की दशा और दिशा को भी निर्धारित  करती है।

उन्होंने कहा कि भारत दुनिया में विचारों की एक अग्रणी शक्ति के साथ शैक्षिक उत्कृष्टता का प्रमुख केंद्र भी रहा है। नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विश्वस्तरीय शिक्षा के केन्द्रों में दुनिया भर से विद्यार्थी ज्ञान हासिल करने आते थे। हमारे ज्ञान की समृद्ध विरासत से विदेशी ताकतों ने जान-बूझकर हमें वंचित किया और एक ऐसी शिक्षा प्रणाली दी जो न तो देशवासियों के हित में थी और न ही  व्यवहारिक थी। उस शिक्षा प्रणाली का सिर्फ एक ही मकसद था की कैसे भारतवासियों को हमेशा अंग्रेजों का गुलाम बना कर रखा जाय।

उन्होंने कहा कि आज़ादी के अमृतकाल में हम सभी के सामने अवसर है खुद को जानने का। भारत ने संस्कृत, विज्ञान, गणित, खगोल, वैदिक गणित, रसायन एवं भाषा इत्यादि के क्षेत्र में अपना अतुलनीय योगदान दिया है। आज भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रम में प्रमुखता से स्थान देकर हम युवा पीढ़ी को भारत के गौरव की अनुभूति करा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि आजादी के बाद पहली बार देश की प्रकृति, संस्कृति और विकास को ध्यान में रखते हुए ऐसी शिक्षा नीति बनी है, जो भारत को वैश्विक पटल पर ‘ज्ञान की महाशक्ति’ बनने की ओर ले जायेगी क्योंकि इसमें ज्ञान की अहमियत के साथ-साथ व्यवहारिक  ज्ञान पर ध्यान दिया गया है। इसमें विद्यार्थियों के कौशल विकास पर विशेष जोर दिया गया है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति अपनी जड़ों से जुड़ने एवं अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने की प्रेरणा देती है।

उन्होंने कहा कि इस नीति द्वारा देश में स्कूली एवं उच्च शिक्षा में व्यापक सुधारों की अपेक्षा की गयी है। स्कूली और उच्च शिक्षा में छात्रों के लिए संस्कृत और अन्य प्राचीन भारतीय भाषाओं का विकल्प होगा लेकिन किसी भी छात्र पर भाषा के चुनाव की कोई बाध्यता नहीं होगी। शिक्षा नीति के अंतर्गत केंद्र व राज्य सरकारों के सहयोग से  शिक्षा पर जीडीपी के छः प्रतिशत व्यय का लक्ष्य भी रखा गया है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा का मकसद केवल किताबों तक सीमित रहना व सिर्फ डिग्रियाँ हासिल करना ही नहीं है। चाहे सरकारी विश्वविद्यालय हो या निजी विश्वविद्यालय, सभी का प्रयास अपने विद्यार्थियों को बेहतर व गुणात्मक शिक्षा प्रदान करना, उनमें मानवीय मूल्यों का संवर्धन करना और राष्ट्रीय चेतना का विकास करना होना चाहिए। विश्वविद्यालय में होने वाले शोध समाज एवं देश की आवश्यकता के अनुरूप हो, समस्याओं के समाधान के लिए हो, यह आवश्यक है। शिक्षा को मानव संसाधन विकास में राष्ट्रीय निवेश के रूप में लिया जाना चाहिए।  

उन्होंने कहा कि भारत में दुनिया की सबसे बड़ी शिक्षा प्रणाली है जिसमें सभी स्तरों पर लगभग 30 करोड़ छात्र और उच्च शिक्षा संस्थानों में चार करोड़ छात्र हैं। हमारे छात्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए जबरदस्त भूख है, चाहे वह भारत में उपलब्ध हो या विदेश में। यही कारण है कि वर्ष 2022 में 4.5 लाख से अधिक छात्र विदेशों में पढ़ने के लिए गए, जिसकी संख्या जल्द ही 18 लाख तक पहुंचने की उम्मीद है। यह भी हमारे लिए चिंतन का विषय होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि झारखण्ड प्रदेश के राज्यपाल का पदभार ग्रहण करने के बाद उन्होंने राज्य के विश्वविद्यालयों की जो दुर्दशा देखी उसे देख उन्हें बहुत दुःख तो हुआ, साथ ही आश्चर्य भी हुआ। राज्य के विश्वविद्यालय मात्र 30 प्रतिशत शिक्षकों के सहारे चल रहे थे। ज्यादातर में तो न कुलपति थे, न ही रजिस्ट्रार, न ही वित्त अधिकारी और न ही कोई परीक्षा नियंत्रक। टीचिंग-नन टीचिंग के पद वर्षों से रिक्त थे और महाविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी थी। झारखण्ड लोक सेवा आयोग ने वर्ष 2008 के बाद कोई नियुक्तियां ही नहीं की। विश्वविद्यालयों का न कोई एकेडमिक कैलेंडर था और न ही परीक्षाएं समय पर होती थी, जिससे विद्यार्थियों को आगे एडमिशन लेने में काफी परेशानी होती थी। उनके द्वारा निरंतर बैठकें की गयी तब जाकर भर्ती की प्रक्रिया शुरू हुई।

उन्होंने कहा कि राज्य में नए विश्वविद्यालय तो खुले लेकिन उनके लिए कोई भवन ही नहीं। आधारभूत सरंचना एवं मूलभूत सुविधाओं का अभाव भी था। कई निजी विश्वविद्यालय किराये के भवनों में चल रहे थे। यू०जी०सी० के मापदण्डों का पालन नहीं हो रहा था। उन्होंने राज्य के सारे सरकारी और  निजी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के साथ समीक्षा बैठकें की। कई दिशा-निर्देश दिए, बार-बार दिए तब जाकर अब स्थिति कुछ सुधरी है लेकिन अभी भी संतोषजनक नहीं है।

उन्होंने कहा कि शैक्षणिक उत्थान की दिशा में सुधार की चुनौतियाँ अपार हैं। विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालयों के शिक्षको के लिए   समय-समय पर शिक्षण व प्रशिक्षण के कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। शिक्षण कार्य को अधिक प्रभावी बनाने की  नयी-नयी तकनीकों पर भी विचार-विमर्श किए जाने की जरूरत है। मांग के अनुरूप शिक्षण संस्थानों में कोर्स का संचालन हो। ‘सशक्त’ एवं ‘आत्मनिर्भर भारत’ के निर्माण में  शिक्षण संस्थानों की विशेषकर उच्च संस्थानों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका हैं।

उन्होंने कहा कि आज की जरूरत उद्योग और शिक्षा में साझेदारी की भी है, क्योंकि दोनों ही देश के विकास में भागीदार हैं। शिक्षा और उद्योग के बीच एक सामान्य इंटरफ़ेस मॉडल होना चाहिए और एक सामंजस्य भी स्थापित होना चाहिए। उद्योग जगत शिक्षण संस्थानों निरंतर अपना फीडबैक या प्रतिक्रिया दें जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि शैक्षणिक संस्थानों से निकले हुए विद्यार्थी उसकी जरूरतों को पूरा करने में  काफी हद तक सफल हों। भारतीय शैक्षणिक संस्थानों को उद्योग आधारित पाठ्यक्रम तैयार करने की आवश्यकता है जो भारतीय छात्रों की कम रोजगार क्षमता से निपटने में  मदद करेगा।

उन्होंने कहा कि शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका मनुष्य की समावेशी प्रगति से संबंध है और जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव विद्यार्थियों को एक सभ्य, कुशल, बुद्धिमान और रोजगारपरक बनाने पर पड़ता है। प्राचीन काल में भारत में “गुरुकुल” प्रणाली थी, जहाँ छात्रों को शिक्षा पूरी लगन के साथ दी जाती थी और गंभीरता से देखभाल की जाती थी और उनके चरित्र  निर्माण पर विशेष जोर  दिया  जाता था। लेकिन, आज शिक्षा का काफी हद तक  व्यवसायीकरण होने के कारण निजी शिक्षण संस्थान तो छात्रों को ग्राहकों के रूप में देखते हैं। इस बारे में आप शिक्षाविदों को संवेदनशील होने की  ज़रुरत है जिससे हम भारत की प्राचीन वैभवशाली शिक्षा प्रणाली के गौरव को वापस ला सकें।

उन्होंने कहा कि विद्याभारती उच्च शिक्षा संस्थान एवं  देवी अहिल्या विश्वविद्यालय द्वारा मध्य प्रदेश शासन उच्च शिक्षा विभाग, निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग तथा भारतीय विश्वविद्यालय संघ के सहयोग से आयोजित इस अखिल भारतीय संस्थागत नेतृत्व समागम के अवसर पर उपस्थित देश भर के केन्द्रीय एवं राज्य विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, कुलपतिगण, आईआईएम एवं एनआईटी के निदेशकगण, उच्च शिक्षा संस्थानों के चेयरमैन, निदेशकगण, प्राचार्यगण, शिक्षाविद एवं प्राध्यापक राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर चर्चा एवं इसके क्रियान्वयन हेतु एक मंच पर आए हैं। वे विद्याभारती उच्च शिक्षा संस्थान के इस प्रयास के लिए उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं देते हैं।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को नई शिक्षा नीति का गंभीरतापूर्वक अवलोकन कर उस पर विचार-विमर्श कर इसके  मूल उद्देश्यों का मूल्यांकन भी करना होगा। वे चाहते हैं कि इस प्रकार की परिचर्चा का आयोजन समय-समय पर होता रहे, जिससे नई शिक्षा नीति के लाभ, उपयोगिता और गुणवत्ता के बारे में शिक्षकों और विद्यार्थियों को अधिक से अधिक जानकारी मिल सके।