मानवाधिकार विषय की संगोष्ठी में वासवी ने कहा भाजपा और आरएसएस दोनों देशद्रोही

विश्वभर में मानवाधिकार के हनन की खबरों की संख्या बढ़ते जा रही हैं, भारत में लोकतंत्र एकतंत्र में बदलता जा रहा है। झारखण्ड में देशद्रोह का मुकदमा, फर्जी मुकदमे में लोगों को फंसाना, जबरन जमीन छिनना, जेल में युवाओं की मृत्यु इत्यादि सभी मानवाधिकारों के हनन के ही मामले हैं, ये बातें सामाजिक कार्यकर्ता ललित मुर्मू ने कल रांची के बिहार क्लब में आयोजित मानवाधिकार की चुनौतियां विषयक संगोष्ठी में कही।

विश्वभर में मानवाधिकार के हनन की खबरों की संख्या बढ़ते जा रही हैं, भारत में लोकतंत्र एकतंत्र में बदलता जा रहा है। झारखण्ड में देशद्रोह का मुकदमा, फर्जी मुकदमे में लोगों को फंसाना, जबरन जमीन छिनना, जेल में युवाओं की मृत्यु इत्यादि सभी मानवाधिकारों के हनन के ही मामले हैं, ये बातें सामाजिक कार्यकर्ता ललित मुर्मू ने कल रांची के बिहार क्लब में आयोजित मानवाधिकार की चुनौतियां विषयक संगोष्ठी में कही। इस संगोष्ठी में बड़ी संख्या में आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता और नेताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, छात्रों एवं अन्य संगठनों के लोगों ने भाग लिया तथा देश व राज्य में मानवाधिकार के हनन पर गहरी चिन्ता व्यक्त की।

भाकपा माले के राज्य सचिव जनार्दन प्रसाद ने कहा कि, मानवाधिकार का दायरा बहुत बड़ा है। मनुष्य की गरिमापूर्ण अस्तित्व के लिए जरुरी किसी भी चीज पर हमला, एक तरह से मानवाधिकार का हनन है। उन्होंने कहा कि जैसे भूमि का सवाल भी मानवाधिकार का मूल विषय है। झारखण्ड में आदिवासियों की जमीन छिन कर मुट्ठी भर कारपोरेट को दिया जाना, खूंटी की पत्थलगड़ी घटना के दौरान वहां के लोगों तथा अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं को झूठे मुकदमें में फंसाना ये सभी मानवाधिकार के हनन के ही उदाहरण है। उन्होंने कहा कि भाजपा सत्ता का इस्तेमाल करके लोकतंत्र और मानवाधिकार की रक्षा के लिए उठनेवाले आवाज को कुचल देना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट पर दबाव बनाया जा रहा है। वर्तमान सरकार तो एक कदम आगे निकल जाना चाहती है, वह तो संविधान को बदलने की बात कर रही है।

अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता पूजा ने कहा कि कमजोर, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक एवं महिलाओं के अधिकारों पर हमले बढ़े हैं। मानवाधिकारों और संविधान के लिए अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी गई है और उसे हाशिये पर रहे लोगों के लिए भी हासिल करने के लिए लड़ाई लड़नी होगी। मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सभी को एक साथ और एक स्वर में आगे बढ़ना होगा, क्योंकि ये लड़ाई सामान्य नहीं है।

मार्क्सवादी समन्वय समिति के मिथिलेश सिंह ने कहा कि आदिवासी इलाकों में लोगों को मूलभुत सुविधाएं भी नहीं मिल पाती, जैसे की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर आदि। आज के हालात में मानवाधिकारों को बचाने के लिए आंदोलन समय की मांग है। अब तो हद हो गया, सरकार तो न्यायालय के फैसले तक को नहीं मानती।

स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता वासवी किरो ने कहा कि मानवाधिकार एक व्यापक शब्द है,  जबसे राज्य का गठन हुआ तब से विकास के नाम पर सिर्फ और सिर्फ लोगों को गहरा जख्म दिया गया, पिछले 18 सालों में आदिवासियों को अधिकार दिलाने के नाम पर सिर्फ छला गया। जल जंगल जमीन पर आश्रित लोगों की जमीन छीनी गई। झारखण्ड का कोना-कोना विस्थापन के दर्द से कराह रहा है। विकास के नाम पर आदिवासियों से सारा बलिदान लिया गया और विकास का फल जमीन छीननेवालों को मिला, और आज क्या है सारी लडाई गाय और गोबर में घुस गई। सच्चाई यह है कि ये आरएसएस और भाजपा के लोग ही असल में देशद्रोही है।

सीपीआई नेता भुवनेश्वर मेहता ने कहा कि मानवाधिकार और लोकतंत्र की रक्षा के लिए झारखण्ड के तमाम विपक्षी दल, सामाजिक संगठन एवं आंदोलनकारियों को साथ आकर लड़ना होगा, ऐसा आंदोलन किया जाये जो सतत चलता रहे और दमनकारी शक्तियों की नींद उड़ा दे, उसे सत्ता से उखाड़ फेंके। इसी दरम्यान कल्याण नाग ने गीत गाकर संघर्ष की कहानी सुनाई।

कार्यक्रम के अन्त में फादर स्टेन स्वामी ने कहा कि झारखण्ड में मानवाधिकारों के हनन को लेकर आम आदमी के बीच आंदोलन की बात को लेकर जाना चाहिए और ऐसे मामलों में राजनीतिक पार्टियों को भी शामिल होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मानवाधिकार आयोग में भी पारदर्शिता लाने की जरुरत है और उनके काम के बारे में आम जनता के बीच प्रचार-प्रसार करना जरुरी है, मानवाधिकारों के मामले में केस दर्ज किया जाये और इन मामलों पर त्वरित कार्रवाई भी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कड़े और फांसीवादी कानून जैसे कि यूएपीए, राजद्रोह, रासुका, टीएन गुंडा एक्ट, और आफ्सपा जैसे कानूनों को वापस लेने के लिए राजनैतिक आंदोलन खड़ा किया जाये और राजनीतिक पार्टियों को इसमें शामिल किया जाये।

Krishna Bihari Mishra

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