यही हाल रहा तो, अभी मिट्टी के डाक्टर देखे हैं, जल्द ही हवा, पानी, सड़क, आदि के डाक्टर भी देखियेगा

रांची के संपादकों का क्या हैं, उनके होठो पर तो एक ही बोल है, “ एक-दो पेज विज्ञापन का है सवाल, जिये तेरे बच्चे रघुवर, जमे रहो रघुवर दादा।” आज रांची से प्रकाशित सभी अखबारों में एक पृष्ठ का विज्ञापन छपा है। विज्ञापन कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग, झारखण्ड सरकार द्वारा जारी किया गया है, जिसमें मिट्टी के डाक्टरों का सम्मान समारोह का जिक्र है।

रांची के संपादकों का क्या हैं, उनके होठो पर तो एक ही बोल है, एकदो पेज विज्ञापन का है सवाल, जिये तेरे बच्चे रघुवर, जमे रहो रघुवर दादा।” आज रांची से प्रकाशित सभी अखबारों में एक पृष्ठ का विज्ञापन छपा है। विज्ञापन कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग, झारखण्ड सरकार द्वारा जारी किया गया है, जिसमें मिट्टी के डाक्टरों का सम्मान समारोह का जिक्र है।

जिसमें लिखा है – 17 लाख से ज्यादा किसानों को मिले स्वाइल हेल्थ कार्ड,  मिट्टी की जांच के लिए पंचायत स्तर पर 3164 प्रयोगशाला की स्थापना, 1203 अतिरिक्त प्रयोगशाला बनाने का जिक्र भी है, यह भी कहा गया है कि 4367 पंचायतों में से 2-2 महिलाओं को ट्रेनिंग दिलवाकर 8734 महिलाओं को मिट्टी का डाक्टर बनाने का लक्ष्य है, साथ ही रघुवर दास का तकिया कलाम भी है – काम किया है… और करेंगे।

और लीजिये जैसे ही यह विज्ञापन मिला सभी दंडवत् हो गये, देखते ही देखते झारखण्ड के कृषि जगत् में क्रांति आ गई, गजब हो गया, झारखण्ड बहुत आगे निकल गया, देश में पहली बार महिलाएं बन रही मिट्टी की डाक्टर। मुख्यमंत्री रघुवर दास की चारों ओर जय-जयकार होने लगी, आज तक ऐसा कभी मुख्यमंत्री झारखण्ड क्या पूरे देश में नहीं हुआ, जिसने मिट्टी के डाक्टर तक बना डाले, अब तक तो लोग डाक्टर उसे ही मानते थे, जो चिकित्सीय सेवा से जुड़े हो या पीएचडी प्राप्त की हो, लेकिन मुख्यमंत्री रघुवर दास तो एकमात्र गरीबों के मसीहा है, जो 2014 में झारखण्ड के मुख्यमंत्री बने, जिनकी सोच अद्वितीय है, आजतक ऐसी सोच वाला मुख्यमंत्री पूरे देश के किसी राज्य के पास नहीं, भाजपा में तो एकमात्र यहीं है।

इधर लोगों को कहना है कि अब तो मिट्टी के डाक्टर देख ही लिये, जल्द ही पानी के डाक्टर, हवा के डाक्टर, सड़क के डाक्टर, पढ़ाई-लिखाई के डाक्टर, सिलाई-बुनाई के डाक्टर आदि भी देश में पहली बार झारखण्ड में ही दिखेंगे, क्योंकि राज्य में होनहार भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की टीम एक साथ अवतरित हो गई।

राजनीतिक पंडितों की मानें तो वे साफ कहते है कि भाई “जब-जब चुनाव नजदीक में आवा, तब-तब सीएम-आइएएस मिल गाल बजावा” अर्थात् जिस राज्य में जब कभी चुनाव आने को होता है, तो वहां का मुख्यमंत्री और भारतीय प्रशासनिक सेवा के वे अधिकारी जो अब तक जनता को उल्लू बनाकर उपकृत होते रहे हैं, अपनी जमीन खिसकता हुआ देख, वे नाना प्रकार के गाल बजाने वाले कार्यक्रम लेकर जनता के बीच कूद पड़ते हैं और इसमें मीडिया के पास कुछ टुकड़े फेंककर उसे अपने में मिला, उनसे ताली बजवाते हैं, उनसे कुछ अपने पक्ष में जय-जयकार कराते हुए लिखवाते है, जिसका दृश्य आज और कल सभी अखबारों में दिखेगा।

कृषि में रुचि रखनेवाले जानकारों को कहना है कि आज का किसान मुख्यमंत्री अथवा राज्य के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की तरह बेवकूफ नहीं हैं, उसे सब पता है कि कब क्या बोना है और कब उसे काटना है, सरकार केवल उसकी आर्थिक मदद करें, सब ठीक हो जायेगा, पर यहां आर्थिक मदद तो नहीं, किसानों के आर्थिक मदद के नाम पर उनसे लूटने तथा उन्हें आत्महत्या करने को मजबूर करने की परिपाटी इन लोगों ने विकसित कर ली है, जिससे कृषि का यहां बंटाधार है।

जानकार यह भी बताते है कि जब राज्य में कृषि विभाग हैं, उसका मंत्री है, उसका प्रधान सचिव है, जिलास्तर से लेकर अनुमंडल ही नहीं बल्कि प्रखण्डस्तरीय तक पदाधिकारी है, वे बैठकर करते क्या है? उनका काम क्या है? राज्य में जो कृषि अनुसंधान केन्द्र के नाम पर जो नौटंकी चलती है, वहां बैठकर लोग करते क्या है कि इन्हें मिट्टी की डाक्टर की जरुरत पड़ गई और जब ये मिट्टी के डाक्टर इन महिलाओं को बना दिया गया तो जो मिट्टी को लेकर अनुसंधान कर रहे हैं, वे क्या है मिट्टी के दादा या और कुछ?

जानकार बताते है कि दरअसल एक लोकोक्ति है कि जिस राज्य में मूर्खों की संख्या अधिक होती है, तो वहां धूर्त शासन करने लगते है, झारखण्ड में फिलहाल अभी यही हो रहा है, कृषि विभाग की जो स्थिति हैं, उसका कार्य प्रणाली है, वो शून्य है, उनके काम सिर्फ अखबारों, चैनलों, पोर्टलों, इनके चाटूकार पत्रकारों, और एलइडी पर ही दिखती है, सच्चाई सब को पता है।

राजनीतिक पंडितों की मानें तो जिस राज्य में चिकित्सा के क्षेत्र में डाक्टरों की भारी कमी है, जहां डाक्टर काम करना पसन्द नहीं करते, जहां डाक्टरो की फीस 500 रुपये से 2000 रुपये तक हैं, वहां चिकित्सकों की बहाली न कर, वहां मिट्टी के डाक्टर बनाने की कला किसी को सीखनी है तो रघुवर दास और उनके संग घूमनेवाले आइएएस अधिकारियों से कोई सीखें।

जानकारों से यह पूछे जाने पर कि लाजिकली मिट्टी के डाक्टर होने चाहिए कि नहीं, तब जानकार बताते है कि लाजिकली तो फिर हवा, पानी और सड़क के भी डाक्टर होने चाहिए, क्योंकि हम कौन सी विषैली हवा सांस के रुप में ले रहे हैं, कौन सा दूषित पानी पी रहे हैं, किस सड़क पर चल रहे हैं, वो हमारे लिए उपयुक्त हैं या नहीं और उससे भी बढ़कर पूरा राज्य बिजली के संकट से जूझ रहा है, यहां तो सबसे पहले बिजली के डाक्टरों की जरुरत है।

जानकार कहते है कि लाजिकली क्या होता है, सबसे बड़ी बात है कि आपकी नीयत कैसी है? क्योंकि कहा जाता है, जैसी नीयत, वैसी बरकत। आपकी नीयत तो ठीक नहीं है, और जब नीयत ठीक नहीं है, तो बरकत कहां से होगी? पूरे राज्य में अब चुनाव का माहौल दिख रहा हैं, काम-धाम सब बंद है, लोगों को कैसे अबकी बार 65 पार का झूनझूना याद कराया जाय, सबका दिमाग इसी पर लगा है, खुद मुख्यमंत्री रघुवर दास के पेज पर “अबकी बार 65 पार” दिख रहा है, और इसके बावजूद लोगों को सच नहीं दिख रहा तो फिर ऐसे लोगों को हम क्या कहे?

Krishna Bihari Mishra

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