मिट्टी में मिल जाउँगा…और गांधी जयंती के 150वीं वर्षगांठ पर जनता को फिर मूर्ख बनाउंगा, क्योंकि…

आज गांधी जयन्ती है, जीवन में शुचिता, सत्य, स्वच्छता, अहिंसा, सच्चरित्रता के प्रतीक महान आत्मा का जन्मदिन, और जरा देखिये इनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण करनेवाले कौन लोग है? जिन्होंने अपने जीवन से शुचिता, सत्य, स्वच्छता, अहिंसा और सच्चरित्रता को कब का उतार फेंका, और सिर्फ स्वार्थ को अपने जीवन में उतार कर, स्वहित में जब चाहा राजनीतिक बयान दिया और खुद के ही बयान को अपने ही हरकतों से मिट्टी में मिला दिया।

मिट्टी में मिल जाउँगा… और गांधी जयंती के 150वीं वर्षगांठ के प्रारम्भिक वर्ष पर बिहार की जनता को फिर मूर्ख बनाउंगा, क्योंकि ऑफर सीमित समय के लिए है। आज गांधी जयन्ती है, जीवन में शुचिता, सत्य, स्वच्छता, अहिंसा, सच्चरित्रता के प्रतीक महान आत्मा का जन्मदिन, और जरा देखिये इनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण करनेवाले कौन लोग है? जिन्होंने अपने जीवन से शुचिता, सत्य, स्वच्छता, अहिंसा और सच्चरित्रता को कब का उतार फेंका, और सिर्फ स्वार्थ को अपने जीवन में उतार कर, स्वहित में जब चाहा राजनीतिक बयान दिया और खुद के ही बयान को अपने ही हरकतों से मिट्टी में मिला दिया। जिसमें आज के राजनीतिज्ञों व पत्रकारों की एक लंबी शृंखला है, जैसे – नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, नीतीश कुमार, हरिबंश नारायण सिंह, लालू प्रसाद, रघुवर दास मुलायम सिंह यादव, मायावती, आदि।

आज सबेरे-सबेरे अपनी छोटी सी घर की लाइब्रेरी को खंगाल रहा था, तभी पुराने फाइलों में से मुझे अखबारों के टूकड़े मिले, जो सुशासन बाबू के बयानों से संबंधित थे, जो बयान कभी बहुत ही चर्चित हुए थे, आज गांधी जयंती के दिन जब उस बयान का अनुसंधान किया, तो हमें लगा कि क्या गांधी के देश में, वर्तमान जो नेता हैं, जो गांधी के आदर्शों की बात करते नहीं थकते, क्या वे गांधी के आदर्शों को अपना रहे हैं, आत्मसात कर रहे हैं, या गांधी की आत्मा को शर्मसार कर रहे हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि वे गांधी जयंती के इस दिन को एक राजनीतिक ऑफर की तरह इस्तेमाल कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं, क्योंकि जब आप सत्य को नहीं स्वीकारेंगे और सत्यपथ पर नहीं चलेंगे तो फिर आज के दिन गांधी जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने से क्या लाभ?

बिहार में एक नेता है – नीतीश कुमार, जो राज्य के मुख्यमंत्री है, जनता दल यूनाइटेड के वरिष्ठ नेता है, कभी 18 फरवरी 2014 को बिहार विधानसभा में कहा था, जो अखबारों की सुर्खियां बनी थी, क्या कहा था, जरा उन अखबारों के कतरनों को देखिये, बयान था – मिट्टी में मिल जाऊंगा, पर दोबारा भाजपा का साथ नहीं लूंगा, पर आश्चर्य है कि वे आज भाजपा के साथ मिलकर सत्ता में हैं और जीवित भी। क्या कोई जदयू का नेता या बात-बात में नीतीश कुमार के आगे नतमस्तक हो जानेवाले, नीतीश भक्ति में लीन और फिलहाल नीतीश की कृपा से राज्यसभा के उपसभापति बन चुके पत्रकार हरिबंश नारायण सिंह उर्फ हरिवंश ये बताने की कृपा करेंगे कि मिट्टी में मिल जाउंगा, पर दोबारा भाजपा का साथ नहीं लूंगा का मतलब क्या होता है?

मैं तो अच्छी तरह जानता हूं कि नीतीश कुमार, सत्ता के लिए भाजपा को कभी भी लात मार सकते है और फिर कभी जिन्होंने लालू प्रसाद को बड़ा भाई कहा था, उनसे दही का अपने माथे पर तिलक लगवाया था, फिर लालू प्रसाद की कृपा पाने के लिए उनके गोद में भी जा सकते हैं, क्योंकि हमारे देश की वर्तमान राजनीति का तो ये फंडा है, जो जितना झूठा, जो जितना भ्रष्ट, जो जितना राजनीतिक पदों का लालची, वो उतना ही बड़ा नेता। कभी नीतीश कुमार की ही पार्टी से राज्यसभा पहुंचे एक नेता जिन्हें शिवानन्द तिवारी कहा जाता है, जिस दिन उन्हें दुबारा राज्यसभा में नहीं भेजा गया, वे फिर वहीं पहुंच गये, जहां वे पहले हुआ करते थे, पर उन्हें शायद वहां अभी तक वो इंट्री नहीं मिली, जिसका उन्हें इंतजार था, हालांकि फिर भी वहीं सम्मान पाने के लिए, वे बराबर लालायित रहते हैं।

मेरा मानना है कि यह देश तभी प्रगति करेगा, जब यहां के नेता जो गांधी व शास्त्री जयंती के दिन, उनकी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करते हैं, वे उन महान नेताओं के आदर्शों व चरित्रों को अपने जीवन में उतारेंगे, पर सच्चाई क्या है? सच्चाई यहीं है कि विधानसभा या लोकसभा में एक-दो सीट कम क्या हो गई? चरित्र और आदर्श दोनों को ताखे पर बिठाकर एक नई राजनीति की परम्परा की शुरुआत कर देते हैं, उन्हें लगता है कि चरित्र और आदर्श बेकार की चीजें है, जो सामने दिखाई पड़ रहा है, वहीं सत्य है।

क्या अगर गांधी चाहते तो भारत के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते थे? बन सकते थे, परन्तु उन्होंने प्रधानमंत्री से ज्यादा, अपने चरित्र को प्रधान माना, उसे बचाये रखा, हालांकि उसकी उन्होंने कीमत भी चुकाई, सीने पर गोली खाकर, परन्तु क्या वे मर गये, वे तो आज भी जिंदा है, पर जो कहते है कि मिट्टी में मिल जाना पसन्द करुंगा पर दोबारा भाजपा से हाथ नहीं मिलाऊंगा, वह भी सदन में और फिर उसी के साथ सत्ता का स्वाद चखते हैं और अपने ही पार्टी के एक सांसद को, सिर्फ इसलिए कि उनका वह परमभक्त है, उसे राज्यसभा का उपसभापति बना देते है। यह क्या बताता है? ऐ भाई, ये कौन सा चरित्र है? समझ नहीं आ रहा, क्या इन नेताओं के इन हरकतों को देख आज गांधी की प्रतिमा रोती नहीं होगी?

Krishna Bihari Mishra

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