हर प्रश्नों का हल योगदा परम्परा से जुड़े गुरुओं के पास है, अतः जब संकट आये, तो इनका द्वार खटखटाए, हल अवश्य निकलेगाः स्वामी सदानन्द
आप जब किसी मुसीबत या बड़ी उलझन में हो या कोई ऐसे प्रश्न का हल ढूंढना चाह रहे हो, जो आपके जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है, तो उस प्रश्न का हल ईश्वर पर छोड़िये। ईश्वर से उन प्रश्नों का हल ढूंढिये। आप पायेंगे कि आपके प्रश्नों का हल निकल गया। ठीक उसी प्रकार जैसे परमहंस योगानन्द को जब अमरीका जाना था। तब उनके मन में नाना प्रकार के सवाल उठ रहे थे। उन्होंने उन प्रश्नों का हल जानना चाहा। वे ध्यानमग्न हो गये और तब तक ध्यानमग्न रहे। जब तक उनके प्रश्नों का हल नहीं निकल गया। ये बातें आज रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम में आयोजित रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए स्वामी सदानन्द गिरि ने योगदा भक्तों के बीच में कही।
उन्होंने कहा कि जैसे ही परमहंस योगानन्द जी अपने प्रश्नों को लेकर ध्यान की गहराइयों में गये। उन्होंने पाया कि महावतार बाबाजी उनके सामने खड़े हैं और कह रहे हैं कि तुम्हारी सारी प्रश्नों का भान उन्हें हैं। तुम्हें अपने गुरुओं की बात माननी चाहिए और अमरीका जाने की तैयारी करनी चाहिए। वहां तुम्हारा संरक्षण किया जायेगा। महावतार बाबाजी को अपने पास देख, परमहंस योगानन्द अभिभूत हो गये। जब वे जाने लगे। तब परमहंस योगानन्द जी भी उनके साथ जाने लगे। तब बाबाजी ने उनसे कहा कि उन्हें उनकी पीछा करने की जरुरत नहीं। तभी परमहंस योगानन्द जी ने पाया कि उनके पांव वहीं स्थिर हो चुके हैं, आगे नहीं बढ़ रहे। बाद में महावतार बाबाजी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और परमहंस योगानन्द जी की अमरीका यात्रा सफल हुई।
स्वामी सदानन्द गिरि ने दया माता जी के बारे में बताया कि जब वो 1963-64 में भारत आई तो उन्होंने रानीखेत स्थित महावतार बाबाजी की गुफा का दौरा किया था। लेकिन उस वक्त विदेशियों को वहां जाने पर प्रतिबंध था। फिर भी उन्होंने मन की गहराइयों से महावतार बाबाजी को याद किया और महावतार बाबाजी से उन्हें काठगोदाम स्टेशन पर ही दर्शन दे दिये। जब वो गुफा पहुंची थी। तब उन्होंने महावतार बाबाजी से पूछा था कि वो उन्हें किस रूप में याद करें। महावतार बाबाजी ने बताया कि उनका स्वभाव ही प्रेम है और तुरन्त दया माता ने पाया कि उनका हृदय प्रेम की लाखों तरंगों से भर उठा। ऐसा लगा कि उन लाखों प्रेम की तरंगों से उनका हृदय फट जायेगा।
स्वामी सदानन्द गिरि ने कहा कि दयामाता के शब्दों में, दयामाता ने उस वक्त ध्यानमग्र होकर महावतार बाबाजी से पूछा था कि आखिर बोर्ड ऑफ डायरेक्टर ने उन्हें एसआरएफ के प्रमुख के रूप में क्यों चुना। तब महावतार बाबाजी ने उन्हें कहा था कि उन्हें अपने गुरुओं के आदेश पर कभी संशय नहीं करना चाहिए। उस वक्त वो आनन्दमयी शांति से परिपूर्ण थी और जब उनका ध्यान टूटा तो उन्हें पता चला कि वो यहां पूर्व में भी कई बार आ चुकी है। उनके सामने पूर्व जन्म की कई स्मृतियां भान हो उठी। वो जहां भी गई, महावतार बाबाजी ही दिखें।
उन्होंने कहा कि दयामाता ने उस दौरान वहां के ग्रामीणों के बीच प्रवचन भी की और जब वहां के डाक बंगला में ठहरी तो उन्होंने देखा कि उनका कमरा नीले प्रकाश से भर उठा है। बाबाजी ने उनसे कहा था कि यहां किसी को आने की जरुरत नहीं। वे तो सभी के साथ है। स्वामी सदानन्द जी ने एक और बात बताई कि केवलानन्द जी ने बताया था कि एक बार एक शिष्य महावतार बाबाजी को ढूंढते-ढूंढते वहां पहुंच गया, जहां महावतार बाबाजी अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। उस शिष्य ने कहा कि मैं आपको जान गया हूं, आप ही महावतार बाबाजी है। आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिये।
महावतार बाबाजी ने कहा कि पहले तुम इस पहाड़ से छलांग लगाओ, तब तुम्हें शिष्य बनाउंगा। फिर क्या था। उक्त शिष्य ने पहाड़ से छलांग लगा दी। महावतार बाबाजी जी ने अपने शिष्यों से उक्त शिष्य को जिसने पहाड़ से छलांग लगाई थी। उसे ढूंढकर लाने को कहा। शिष्यों ने उसके मृत शरीर को महावतार बाबाजी के पास ले आये। महावतार बाबाजी ने उसके शरीर को स्पर्श किया और वो शिष्य जी उठा। इसके बाद महावतार बाबाजी ने कहा कि अब तुम हमारे शिष्य बनने लायक हो गये हो।
सदानन्द जी ने कहा कि ये घटना बताती है कि कभी भी गुरु के आदेश पर विवाद या शंका नहीं करनी चाहिए। गुरु के आदेश का पालन निर्विवाद रूप से हर हालत में करनी चाहिए, जैसा कि उक्त शिष्य ने किया। बिना संशय किये, महावतार बाबाजी के आदेश का पालन किया और पहाड़ से छलांग लगा दी। अगर वो शिष्य थोड़ी भी शंका करता तो महावतार बाबाजी की उस पर कृपा नहीं बरसती। इसलिए हमें अपने गुरु परमहंस योगानन्द जी के आदेश का अक्षरशः पालन करना चाहिए। क्योंकि एक ईश्वर से आत्मसाक्षात्कार किया गुरु ही हमें ईश्वर के पास ले जा सकता है। हमें बिना देर किये ईश्वर की खोज में लग जाना चाहिए और अपने गुरु के आदेश का पालन करना चाहिए।
स्वामी सदानन्द जी ने कहा कि हमारे गुरु हृदय में रहते हैं और वे हमारे विचारों को जानते हैं, उन्हें धोखा देना, स्वयं को धोखा देने के बराबर है। उन्होंने कहा कि महावतार बाबाजी जैसे गुरु तो कई शताब्दियों से जनकल्याण के लिए शरीर धारण किये हुए हैं। जो भी महापुरुष का जन्म होता है, वे उनकी सहायता के लिए वहां मौजूद रहते हैं। कभी ईसा और कबीर को भी इन्होंने ही क्रिया योग की दीक्षा दी थी।
उन्होंने कहा कि महावतार बाबाजी मृत्युंजय है। वे इच्छानुसार शरीर धारण करने में समर्थ है। इनके उपर उम्र का कोई प्रभाव नहीं हैं। उनके बाल ताम्र के रंग के समान दिखते हैं। लाहिड़ी महाशय के कथनानुसार, महावतार बाबाजी का कोई भी नाम लेता है, तो वह तत्क्षण उनका आशीर्वाद ग्रहण कर लेता है। उन्होंने बताया कि जब लाहिड़ी महाशय पटना के दानापुर स्थित मिलिट्री छावनी के इंजीनियरिंग सेक्शन में एकाउंटेंट के पद पर कार्यरत थे। तब महावतार बाबाजी ने उन्हें अपनी इच्छा से उनका स्थानान्तरण रानीखेत करवा दिया था। जब लाहिड़ी महाशय रानीखेत में महावतार बाबाजी से मिले तो महावतार बाबाजी की कृपा से वे ये जानें कि वे जन्म-जन्मान्तर से महावतार बाबाजी के शिष्य रहे हैं। महावतार बाबाजी ने बताया कि लाहिड़ी महाशय के मृत्योपरांत भी उन्हें भूले नहीं। जब वे अपनी मां के गर्भ में रहे। जब उनका जन्म हुआ। जब वे नदियों के बालूओं में छिपे रहते, तो उस वक्त भी महावतार बाबाजी उनका ख्याल रखते थे।
स्वामी सदानन्द जी ने कहा कि जैसे महावतार बाबाजी ने लाहिड़ी महाशय का ख्याल रखा था। ठीक उसी प्रकार हमारे परमहंस योगानन्द जी भी हम सब का ख्याल रखते हैं। जब भी कोई भक्त शांत भाव से उन्हें पुकार रहा होता है, अपनी समस्याओं को उनके पास रख रहा होता है। वो महसूस करता है कि परमहंस योगानन्द जी उसके आस पास ही खड़े हैं। लेकिन उसके लिए ध्यान में गहराई होना चाहिए। उस भक्त को क्रिया योग का नियमित अभ्यास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को अपनी मन की चंचलता पर रोक लगाना चाहिए, अपनी उत्तेजना पर रोक लगानी चाहिए। अगर आप ध्यान कर रहे हैं, क्रिया योग में मन लगा रहे हैं और उससे कुछ नई चीजें आपको प्राप्त हो रही हैं। तो आप उसे अपने मन में ही रखें, किसी को शेयर न करें, नहीं तो आपको प्राप्त हुई वो विशेष चीजें कब गायब हो जायेंगी, आपको पता भी नहीं चलेगा।
स्वामी सदानन्द ने कहा कि ध्यान के समय कुछ जब आपके साथ अलौकिक घटना घटे तो उस अलौकिक घटना को डबल करने का प्रयास करें, न कि शेयर करने लगे। ध्यान मार्ग में जितना भी आप आगे बढ़ें, उसका प्रचार-प्रसार न करें और न ही इसका घमंड करें। स्वयं को ईश्वर के समक्ष बच्चों की भांति रखें। अगर कुछ नहीं भी प्राप्त हो रहा हैं, फिर भी मन में यह विश्वास रखें कि एक न एक दिन आपका प्रयास रंग लायेगा। ईश्वर की प्राप्ति अवश्य होगी। यही धारणा और आपका दृढ़ विश्वास आपको ईश्वर के समक्ष ला खड़ा करेगा। हमेशा याद रखिये कि ईश्वर की ओर जानेवाला मार्ग कोई सर्कस नहीं।
