निर्लज्ज सरकार और उनके अधिकारियों से लड़िये, संघर्ष का रास्ता अपनाइये, पर आत्महत्या मत करिये

जरा उन किसानों के बच्चों की सुनिये, जो दिल्ली के जंतर-मंतर पर कल अपना दर्द सुनाने बैंठे थे। उनके हाथों में तख्तियां थी। तख्तियों पर लिखे थे – खुदकुशी ये समस्या का हल नहीं हैं। खेती को उद्योग का दर्जा दो। हमारे किसान पिता ने खुदकुशी की, इसमें हमारा क्या कसूर हैं? आखिर किसानों की मांगे ही क्या है? – किसानों को फसल का पूरा दाम मिले और दूसरा उनके कर्ज माफ हो। देश की जो स्थिति है, वह एकदम नारकीय है। सरकार किसी की हो, सत्ता में आने के पूर्व वे खुब किसानों की हित की बात करते हैं, पर जैसे ही सत्ता मिलती है, वे अपना रंग दिखाने लगते हैं। किसानों द्वारा आत्महत्या करने की बात कोई नई नहीं है, कांग्रेस की सरकार के समय से किसानों की आत्महत्या का जो दौर शुरु हुआ है, वह थमने का नाम नहीं ले रहा। आज भी जो किसानों की आत्महत्या हो रही है, उसमें केवल एनडीए ही नहीं, बल्कि वहां भी हो रही हैं, जहां यूपीए की सरकार हैं, पर सच पूछिये तो किसी भी दल ने इस पर ईमानदारी नहीं बरती है।

राजनीति में आये किसान परिवार भी किसानों के बारे में बातें नहीं करते

जो किसान परिवार से आते है, उन्होंने भी अपनी सरकार या दल पर दबाव नहीं डाला कि वे कृषि और किसान को अपनी राजनीति का केन्द्र बिन्दु बनाये। कुछ दल तो अपने बेटे, बेटियों और पत्नियों-प्रेमिकाओं के अलावे कुछ किया ही नहीं, जबकि विपक्ष में रहने पर इनकी बोली देखिये, चूंकि सत्ता में आने के लिए वोट का मार्ग किसानों से ही होकर गुजरता है, ये खुब चिल्लम-पों करते है, और सत्ता आते ही, शुरु हो गयी धनाढ्यों-कुबेराधिपतियों का मंगलाचरण गाना और उनसे स्वयं के लिए उपकृत होना। आज फिर झारखण्ड में एक युवा किसान की आत्महत्या की खबर सभी अखबारों में सुर्खियों में हैं। रांची के चान्हो के बेतलंगी गांव में संजय मुंडा ने आत्महत्या कर ली है। बताया जाता है कि संजय आर्थिक संकट से गुजर रहा था, जिसके कारण उसने आत्महत्या कर ली। इसके पूर्व भी इस राज्य में, इसे मिलाकर चार किसानों ने आत्महत्या कर ली । संजय की तीन बहनें हैं, जिसकी परवरिश की जिम्मेवारी भी संजय पर थी। संजय ने तो आत्महत्या कर अपने परिवार से पिंड छुड़ा लिया पर उसकी तीन बहनें रीतु, गीता और सरिता को अब कौन देखेगा?  सरकार और समाज भी कब तक उसके हालात पर नजर रखेगी। यह सवाल उनसे है, जो आत्महत्या को ही समस्या का निदान समझ कर, फांसी को गले लगा रहे है, या लगाने की कोशिश करेंगे। जरा वे बताएं…

  • 10 जून को पिठोरिया के सिमलबेड़ा गांव निवासी कलेश्वर महतो ने फांसी लगाकर जान दे दी थी, क्या उसके जान दे देने से उसके परिवार का भला हो गया, उसके परिवार को आर्थिक संकट से मुक्ति मिल गई?
  • 15 जून को पिठोरिया के सुतियांबे के किसान बालदेव महतो ने आत्महत्या कर ली, क्या उसके आत्महत्या कर लेने से उसके परिवार को आर्थिक संकट से मुक्ति मिल गई?
  • 2 जुलाई को ओरमांझी के विजांग गांव में राजदीप नायक किसान ने आत्महत्या कर ली, तो क्या उसके भी परिवार की, उसके आत्महत्या कर लेने के बाद, आर्थिक संकट दूर हो गई?

जब इन प्रश्नों का सरल उत्तर हैं – नहीं। तो फिर आत्महत्या क्यों?   सच्चाई यहीं है कि आत्महत्या से किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि जो जीवित रहेंगे, वे उनकी याद में घूंट-घूंट कर मरने को विवश होंगे, सब कुछ प्राप्त हो जाने के बाद भी। जरा देखिये – किसानों के बच्चे ही जंतर-मंतर पर क्या कह रहे हैं – खुदकुशी समस्या का हल नहीं। बच्चों के इस वाक्य को, इस दर्द को समझिये।

मदर इंडिया की किसान महिला और दो बीघा जमीन के पुरुष किसान को देखिये

याद करिये। बहुत पहले एक फिल्म बनी थी – मदर इंडिया। यह फिल्म किसानों और उनकी समस्या को लेकर ही केन्द्रित थी। इस फिल्म में दिखाया गया था कि कैसे एक किसान परिवार, एक महाजन के चक्कर में पड़कर, अपना जीवन तबाह कर लेता है। इसमें यह भी दिखाया गया था कि महाजन द्वारा लगातार त्रस्त किये जाने के बावजूद भी एक किसान परिवार की महिला उसके आगे झुकी नहीं। उसने अपने सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं किया और अपनी मेहनत से अपने गांव में अपनी प्रतिष्ठा में चार-चांद लगाये और फिर मदर इंडिया बन गई।

याद करिये। दो बीघा जमीन। यह फिल्म भी किसानों की समस्याओं पर केन्द्रित थी, उसमें भी किसान ने लगातार संघर्ष किया, पर आत्महत्या नहीं की। सचमुच आत्महत्या समस्या का समाधान नहीं है, इससे आनेवाले समय में आपके बच्चे, आपका परिवार हंसी के पात्र बन जायेंगे। क्या आप चाहेंगे कि आपके मरणोपरांत आपके बच्चे-आपका परिवार किसी के रहमोकरम पर पले, लोग उस पर गंदी नजर डाले। अगर नहीं तो फिर आत्महत्या क्यों?  संघर्ष करना सीखिये, समय से लड़िये और उस पर विजय पाइये।

जहां किसान आत्महत्या करें वहां की सरकार को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए

…और सरकार, सरकार किसी की भी हो, उन्हें शर्म आनी चाहिए, जिस राज्य या देश में किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाये, उसे चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। अपनी ब्रांडिंग के लिए करोड़ों खर्च, चुनाव जीतने के लिए करोड़ों-अरबों खर्च और किसानों की सहायता और उनकी समृद्धि के लिए बनने वाले बजट की राशि कौन हड़प ले जा रहा हैं? जब किसानों को आत्महत्या ही करना है, तो फिर कृषि विभाग और कृषि मंत्री तथा कृषि विभाग के प्रधान सचिव, सचिव, जिला कृषि पदाधिकारी, अनुमंडल कृषि पदाधिकारी या प्रखंड विकास पदाधिकारी, उपायुक्त आदि का क्या मतलब?  सच तो यह  होना चाहिए कि जिस इलाके में किसान आत्महत्या करें, उन इलाकों के कृषि से जुड़े सभी संतरी से लेकर मंत्री तक के लोगों को जिम्मेवारी तय कर, इनके खिलाफ सजा मुर्कर्रर करना चाहिए, ताकि कोई किसान आत्महत्या न कर सकें। राज्य व केन्द्र सरकार, इसकी जिम्मेवारी लेगी, हमें नहीं लगता, क्योंकि ये तो दो लाख का मुआवजा देगी और चुप्पी साध लेगी।