धर्म को अफीम माननेवाले वामपंथियों का चरित्र उजागर, भगवान अयप्पा के किये दर्शन, विरोध में केरल बंद

अगर कोई यह कहता है कि उसने कल सबरीमाला में दो महिलाओं को प्रवेश कराकर वर्षों पुरानी परम्परा तोड़ दी, तो चाहे तो वह महामूर्ख है या दूसरे को उल्लू बनाने की कोशिश कर रहा है, भारत में कई ऐसे हिन्दू मंदिर है, जहां दूसरे धर्म के लोगों का प्रवेश वर्जित है, फिर भी बहुत सारे लोग अपने कथित धर्म जो कि धर्म होता ही नहीं, बल्कि एक पंथ होता है, उसे छुपाकर उन मंदिरों में प्रवेश कर जाते है, इसका मतलब यह भी नहीं कि वहां परम्पराएं टूट गई।

दरअसल कल की सबरीमाला की घटना ने वामपंथियों और केरल की सरकार का दोहरा चरित्र उजागर कर दिया। उजागर यह भी किया कि धर्म को अफीम माननेवाले वामपंथियों को भी धर्म का चस्का लग गया है और वह भी धर्म का लबादा ओढ़कर राजनीति की एक नई विचारधारा में डूबकी लगाने को लालायित हैं, क्योंकि उन्हें पता चल चुका है कि उनके केरल में घोर हिन्दूवादी भाजपा ने धमाकेदार इंट्री कर दी है, और देर या सवेर, अगर उन्हें किसी से खतरा है, तो वह भाजपा से हैं न कि कांग्रेसियों से, इसलिए उन्होंने सबरीमाला पर आक्रमण करने का एक नया बहाना ढूंढ लिया है।

कहने को तो ये भी वे कह सकते है कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के लिए प्रवेश पर रोक को अवैध बताया था, तथा उन्हें मंदिर में जाने की इजाजत दी थी, पर मंदिर प्रशासन ने ऐसा करने पर रोक लगा दिया था, तो बात तो यहां एक और उठती है कि ऐसी इजाजत केवल सबरीमाला के लिए क्यों? सिर्फ हिन्दू मंदिरों पर क्यों?

भारत में तो ऐसे विदेशों से आयातित कई धर्म (हालांकि मैं इन्हें धर्म नहीं मानता, क्योंकि ये पंथ है, क्योंकि व्यक्ति विशेष द्वारा चलाया गया, कोई भी चीज धर्म का स्थान ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि धर्म तो सत्य हैं, शाश्वत है, उसे कोई चुनौती भी नहीं दे सकता और न किसी में सामर्थ्य है) है, जो भारत के कई गांवों-मुहल्ले तक घुस गये हैं, पर उनके धार्मिक स्थलों में भी महिलाओं की आज भी मनाही है, क्या भारत के सुप्रीम कोर्ट को इतनी ताकत है कि उस पर फैसला दे कि उन धार्मिक स्थानों पर भी महिलाओं की इजाजत मिले।

जिस बीबीसी ने आज कार्टून बनाया कि भारत में आज भी छुआछूत है, और जिसे प्रभात खबर ने प्रमुखता से स्थान दिया, क्या उस बीबीसी की हिम्मत है कि वह उन धार्मिक स्थानों पर जहां महिलाओं की इजाजत आजतक नहीं मिली, उसको लेकर कार्टून तक बना दें, दरअसल वे ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि वे जानते है कि ऐसा करने से, उनके उपर क्या बीतेगा? तथा उनकी धर्मनिरपेक्षता कौन से गांव में तेल लाने के लिए निकल जायेगी?

क्योंकि सत्य को स्वीकार करना और सत्य को बेचने के लिए असत्य का सहारा लेना, दोनों अलग-अलग बाते हैं। हमें खुशी है कि हिन्दू धर्म या सनातन धर्म में इतनी सरलता, इतना लचीलापन है कि आप इनके धर्म से संबंधित देवी-देवताओं को गालियां भी दे दें, या सुप्रीम कोर्ट इनके खिलाफ जो भी फैसला सुना दें, इस धर्म के माननेवाले लोग सब कुछ स्वीकार कर लेते हैं? क्योंकि उनका धर्म किसी सुप्रीम कोर्ट या किसी पार्टी का, या किसी व्यक्ति विशेष के रहमोकरम पर नहीं चलता, तभी तो इतने झंझावातों के सहने के बावजूद, चट्टान की तरह यह खड़ा हैं और इसे टकरानेवाले खुद ब खुद नंगा होते जा रहे हैं, जैसे सबरीमाला के नाम पर वामंपंथियों का दोगला चरित्र उजागर हो गया।

जो वामपंथी धर्म को अफीम मान रहे थे, वे अब सबरीमाला मंदिर में स्थित अयप्पा के दर्शन करने के लिए छटपटा रहे हैं, उन्हें लेनिन और मार्क्स की जगह अयप्पा में मुक्ति दिखाई पड़ रही हैं, वे अयप्पा के दर्शन के लिए अपनी सरकार तक को दांव पर लगा रहे हैं, अपनी जीवन भर की पूंजी को झोंक दे रहे हैं, क्योंकि अब तो जीवन-मरण का प्रश्न है, कल तक जो पूरे देश में थे, बाद में बंगाल, त्रिपुरा और केरल तक सिमटे, अब तो बंगाल और त्रिपुरा से विदाई हो गई तो केरल तक सिमट गये, अब केरल से भी सिमट गये तो फिर वे कहां जायेंगे? इसलिए वे भगवान अयप्पा में अपना भविष्य ढूंढ रहे हैं ताकि उनका जीवन सफल हो सके, उनकी विचारधारा जीवित रहे।

जरा देखिये, कल जो महिलाएं सबरीमाला के अयप्पा मंदिर में प्रवेश की, वह हैं कौन? वह भाकपा माले की कार्यकर्ता बिंदू है, वह कहती है कि वह सासता की भक्त है? भला कोई वामपंथी यह कहें कि वह धार्मिक है, ये कोई वामपंथी स्वीकार नहीं कर सकता?  दूसरी कनकदुर्गा है, जो एक नागरिक आपूर्ति कर्मी है, इन दोनों को मंदिर तक ले जाने में केरल सरकार ने एड़ी-चोटी एक कर दी, जिस पर माकपा नेता वृंदा करात का कहना है कि दोनों महिलाएं पूजा करना चाहती थी, और उन्हें ऐसा करने का अधिकार दिया गया। उन्हें केरल सरकार ने सुरक्षा प्रदान किया।

भला वृंदा जी और थोड़ा लिबरल होइये, अन्य तथाकथित धर्म पर भी कृपा दृष्टि दिखाइये, अपनी पार्टी के महिला वर्करों को कहिये कि जाये और उन धार्मिक स्थलों में जाकर, धार्मिककृत्य संपन्न कराएं, फिर मजा देखिये? दरअसल ये राजनीतिक हथकंडा है, वर्चस्व की लड़ाई का बेतुका कारनामा है। कांग्रेस तो निर्लज्ज पार्टी है, उसको देश या समाज से क्या मतलब? उसका नेता क्या जाने देश और देशभक्ति? रही बात केरल भाजपा प्रमुख का ये कहना कि केरल सरकार को भगवान अयप्पा के क्रोध का सामना करना पड़ेगा। राज्य सरकार ने श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठगा है। ये सत्य भी है।

सवाल उठता है कि सुप्रीम कोर्ट के कितने न्यायाधीश वेद, उपनिषद, शास्त्र, महाकाव्यों के ज्ञाता है? आखिर किस हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार उन्होंने फैसला सुना दिया? यहीं फैसला अन्य तथाकथित धर्मों पर लागू करने में उन्हें क्या हो जाता है? आस्था के नाम पर हिन्दूओं की बलि ही क्यों चढ़ाई जाती है? तीन तलाक के नाम पर भाजपा को छोड़कर, अन्य पार्टियों को क्यों सांप सूंघ जाता है, इसलिए कि उससे वोट न मिल पाने का खतरा मंडराने लगता है और भाजपा को क्या? उसे तो इसकी परवाह ही नहीं रहती कि उसे वोट मिलेगा भी या नहीं?

भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सर्वाधिक जिस धर्म पर चौतरफा हमले हुए, तो वह हिन्दू धर्म हुआ। जिस पार्टी ने चाहा, उस पार्टी ने इस धर्म को लतियाया तथा अपने वोट के फायदे के लिए, इस हिन्दू धर्म को चोट की, कश्मीर में हजारों हिन्दू परिवारों को घाटी से निकला दिया गया, पर भाजपा को छोड़कर किसी पार्टी ने उसके लिए आंसू नहीं बहाया, पर रोहिंग्या जो भारतीय नहीं है, पर उनके लिए देखिये, भाजपा को छोड़कर सभी पार्टियां आंसू बहा रही है, दरअसल ये सभी वोट बैंक की राजनीति है, और कालांतराल से यही वोट बैंक की राजनीति भारत को बर्बाद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

आज भारत का हिन्दू समाज कई जातियों में बंटकर, अपने ही हिन्दू समाज को चोट कर रहा हैं, कुछ तो सेक्यूलर होने का लबादा ओढ़कर, विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर बैठकर, जमकर अपनी बीवियों और प्रेमिकाओं के संग परम आनन्द की मजे ले रहे हैं और समय-समय पर हिन्दूओं और उनके धार्मिक कृत्यों पर चोटकर सेक्यूलर होने का पुख्ता प्रमाण दे देते हैं, जिसका फायदा वे उठाते है, जैसा कि सबरीमाला में हुआ, पर शायद उन्हें नहीं मालूम कि कल की घटना ने भाजपा को जितना केरल में मजबूत किया, उतना ही वामपंथियों को पूरे देश में नंगा कर दिया, कि एक वामपंथी सरकार या वामपंथी संगठन से जुड़ी महिला को अयप्पा मंदिर में जाने की इतनी उत्कंठा क्यों थी? खासकर उस वामपंथी संगठन को जो धर्म को अफीम मानता है, क्या अब धर्म अफीम नहीं रहा?

इधर इस कुकृत्य के विरोध में केरल के कई हिन्दू संगठनों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी हैं तथा इसके विरोध में आज केरल बंद बुलाया है, जिसका पूरे प्रदेश में व्यापक असर देखने को मिल रहा हैं। केरल के लोगों का कहना है कि किसी के आस्था एवं परम्परा पर चोट करना दुर्भाग्यपूर्ण है। केरल सरकार को इसका खामियाजा भुगतना पडे़गा।