दलबदलू नेता, दलबदलू ही न रहेगा, वो थोड़े ही गांधी, नेहरु, शास्त्री बनने के लिए दुनिया में पैदा लिया है

बेशक दल बदलिये, दलबदलू कहाइये, पर अपना दीदा मत खोइये, किसी दल के नेता को इतना भी पहले मत गरिया दीजिये कि फिर जब आपको उस दल में जाने की नौबत आये तो आपकी ही इज्जत खतरे में पड़ जाये और आप मुंह चोर के जैसा जिस पार्टी में गये, उस पार्टी के और जिस पार्टी को छोड़े हैं, उस पार्टी के कार्यकर्ताओं से भी आप मुंह लुकाते फिरिये, क्योंकि कार्यकर्ता तो कार्यकर्ता होता हैं, वह तो आप जैसा नेता तो होता नहीं,

बेशक दल बदलिये, दलबदलू कहाइये, पर अपना दीदा मत खोइये, किसी दल के नेता को इतना भी पहले मत गरिया दीजिये कि फिर जब आपको उस दल में जाने की नौबत आये तो आपकी ही इज्जत खतरे में पड़ जाये और आप मुंह चोर के जैसा जिस पार्टी में गये, उस पार्टी के और जिस पार्टी को छोड़े हैं, उस पार्टी के कार्यकर्ताओं से भी आप मुंह लुकाते फिरिये, क्योंकि कार्यकर्ता तो कार्यकर्ता होता हैं, वह तो आप जैसा नेता तो होता नहीं, वह तो दिल से पार्टी को चाहता हैं, वह जब आपको अपने आक्रोश के लपेटे में लेगा, तो क्या होगा, यह समझने की कोशिश कीजिये।

रही बात पत्रकारों की तो, उनको कोई फर्क नहीं पड़ता, वो तो जानते है कि आप किसी भी पार्टी में जाइये, जो आपसे उनको मिलनेवाला हैं, वो अनवरत् मिलता ही रहेगा, क्योंकि वे भी बेचारे क्या करें, अपने धूर्त संपादकों/मालिकों के आगे लाचार हैं, साथ ही उनको अपना घर भी चलाना हैं, पर्व-त्यौहार भी मनाना हैं, ऐसे में वे क्या करेंगे, इसलिए आप दल बदलिये या खुद को बदल डालिये या अपना नाम बदल दीजिये, या दलबदलू कहाइये, उनको पता है कि आप पर उसका कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि आपकी चमड़ी विशेष टाइप की भगवान ने बनाई हैं।

झारखण्ड में दलबदलूओं की एक परम्परा रही है, और खुशी इस बात की है कि इस परम्परा को आज के नेताओं ने जीवित रखा है

ऐसे तो दलबदलूओं की कहानी देशव्यापी हैं, पर झारखण्ड में दलबदलूओं की एक परम्परा हैं, जो अभी भी कायम हैं, कौन पार्टी का नेता, कब किस डाल पर जाकर फूदकने लगेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। जरा देखिये न 19 अक्टूबर को झामुमो की बदलाव रैली, मोराबादी मैदान में आयोजित थी, वहां झामुमो का एक नेता यानी बहरागोरा का विधायक कुणाल षाड़ंगी इस प्रकार से बैठा था कि उसे ऐसा बैठा देखकर कोई बोल ही नही सकता था कि ये झामुमो को गच्चा देने जा रहा हैं, पर उसने तो गच्चा दे दिया, और एक हफ्ते भी नहीं हुए, दो दिन में ही भाजपा के राज्य मुख्यालय में जाकर तोते की तरह मोदी-मोदी रटने लगा। फिर क्या था? इसके विरोधियों ने इनका पुराना विडियो खंगालना शुरु किया और लीजिये, शुरु हो गई लोगों द्वारा हु-तू-तू। ऐसे केवल ये कुणाल षाड़ंगी ही नहीं।

तीन मंत्र बोलिये, भाजपा में शामिल हो जाइये, मंत्र है – मोदी शरणं गच्छामि, शाहं शरणं गच्छामि, रघुवर शरणं गच्छामि

ऐसे कई नेता हैं जो पहले राजद में थे, और थोक भाव से भाजपा के शरण में जाकर कहा मोदी शरणं गच्छामि, शाहं शरणं गच्छामि, रघुवर शरणं गच्छामि। झाविमो के विधायकों ने तो ऐसा गंध मचाया कि इस पार्टी का सारा विधायक तोते की तरह फुर्र होकर भाजपा कार्यालय में पांच साल पहले से मोदी-मोदी, रघुवर-रघुवर गा रहा हैं।

भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं को लगता हैं कि उनके नेता चुनाव लड़ने के लिए नहीं, बल्कि दलबदलूओं के झोले ढोने के लिए बने हैं

सच पूछिये तो भाजपा की अपनी यहां औकात भी नहीं, ये नाम के लिए मोदी-शाह, मोदी-शाह जपते हैं, पर इनके पास एक भी नेता ऐसा नहीं, कार्यकर्ता नहीं जो चुनाव लड़ सकें या चुनाव लड़ने की योग्यता रख सकें। इसीलिए तो ये दूसरे दलों तथा अवकाश प्राप्त आइएएस-आइपीएस अफसरों की ओर ये नजर दौड़ाते है कि कौन उसके शरण में आकर तीन मंत्र सस्वर बोले, और जैसे ही उसे यह मौका मिलता है।

चाहे वह यौन शोषण का आरोपी या हत्यारा या कई घोटाले मामले में आरोपी ही क्यों न हो, भाजपा इसका परवाह नहीं करती, और वह सीधे अपने शरण में लेकर, उसे पवित्र करती हुई, भाजपा का टिकट देने, चुनाव लड़ाने की व्यवस्था कर देती हैं, और देखते ही देखते वह नेता भाजपा का उच्च कोटि का विचारक, झारखण्ड का मुख्यमंत्री, किसी अन्य राज्य का राज्यपाल तक बन जाता हैं और भाजपा में काम करनेवाले कार्यकर्ता की सारी उम्र इनका झोला ढोने में निकल जाती है।

अर्जुन मुंडा जैसे लोग तो भाजपा में आकर कहां से कहां पहुंच गये, अभी उनको कोई कहे कि आप मेरे दल में आइये, ये जायेंगे ही नहीं और तब तक नहीं जायेंगे, जब तक भाजपा की हालत वर्तमान राष्ट्रीय जनता दल या भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तक न हो जाये और जैसे ही कोई नया या पुराना दल मजबूत स्थिति में आ गई तो फिर इन्हें भाजपा छोड़ते देर भी नहीं लगेगी, ये ध्रुव सत्य है। इससे कोई इनकार भी नहीं कर सकता।

झारखण्ड में राम-कथा की तरह दलबदलू कथा लिखने की आवश्यकता

जरा देखिये, झाविमो से अपनी किस्मत चमकानेवाले, दक्षिण भारत से आये डा. अजय कुमार ने पहले झाविमो छोड़ा, फिर कांग्रेस पकड़ा और जब कांग्रेस छोड़ा तो फिर आम आदमी पार्टी पकड़ लिया, यानी झारखण्ड के वातावरण का कितना असर इस दक्षिण भारतीय व्यक्ति पर पड़ा हैं, भाई मानना ही पड़ेगा। राजनीतिक पंडित तो साफ कहते है कि दलबदलने की परम्परा और दलबदलू कहलवाना तो इसकी मिट्टी में लगता हैं, घुल गया हैं, जिसे देखिये जब मन किया, घुलट गया। एक और नेता हैं सालखन मुर्मू जो कभी खुद अपनी पार्टी बनाते हैं, कभी भाजपा में जाते हैं, और फिलहाल अभी जनाब जनता दल यूनाइटेड का किस्मत ठीक करने में लगे हैं, यानी झारखण्ड एक ऐसा प्रान्त जहां एक नहीं, कई उदाहरण मिलेंगे, जिस पर रामकथा की तरह दलबदलू कथा लिखी जा सकती है।

दलबदलूओं को सलाह, भविष्य में दलबदल करनी हैं तो वर्तमान में जहां हैं, अपने विरोधी नेताओं को मत गरियाइये, नहीं तो आज के इस डिजिटल युग में लोग आपको परेशान करके रख देंगे

अगर ये नेता राज्यहित में अगर दलबदलने का फैसला करते, तो समझ में आती, पर इन्होंने कभी राज्यहित का ध्यान ही नहीं दिया, इनकी पहली और अंतिम प्राथमिकता परिवार, पत्नी, ससुराल ही रहा और यही सब देखकर, यहां के प्रशासनिक अधिकारियों जिनमें आइएएस/आइपीएस सब शामिल हैं, सभी ने वहीं किया, जो इन नेताओं ने किया।

अब सवाल उठता है कि जब आपको राज्यहित पर ध्यान ही नहीं देना हैं, केवल अपने परिवार और ससुराल पर ध्यान देना हैं, और स्वयं को प्रतिष्ठित कराते रहना हैं, और इसके लिए दल बदलते ही रहना हैं, तो क्या आवश्यकता है कि दूसरे दलों के नेताओं को गरियाने की, आप अपना मुंह बंद रखिये, इतना तो कर ही सकते हैं, अगर आप ऐसा किये रहते तो कम से कम आपको उन कार्यकर्ताओं के आगे मुंह छुपाने की जरुरत नहीं पड़ती, आप आंख से आंख मिलाकर बात कर रहे होते।

इसलिए हम झारखण्ड के उन सारे नेताओं से अनुरोध करते है कि हे भूत, वर्तमान और भविष्य में दलबदल की परम्परा को कायम रखनेवाले महान विभूतियों आप खूब इस डाल से उस डाल उछलते रहिये, दल-बदलते रहिये पर अपने ही बिरादरी के नेताओं को मत गरियाइये, ये आपके भविष्य के लिए भी ठीक नहीं, ऐसे जो आप कर रहे हैं, वो ठीक ही हैं, आप थोड़े ही महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरु, लाल बहादुर शास्त्री बनने के लिए पैदा लिये हैं, आप तो जब बनियेगा तो दलबदलू ही ना…

Krishna Bihari Mishra

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