सिस्टम का शिकार हो गया मैं, सिर्फ एक रात के लिए शवगृह का प्रबंध नहीं कर सका

21 जून 2018, रांची अपने किराये के मकान में विश्राम कर रहा था। अचानक समीर जी का कॉल अपनी पत्नी के मोबाइल पर आया। उन्होंने बताया कि उनकी मां अब इस दुनिया में नहीं हैं। जैसे ही यह समाचार पता चला। अपना पूरा परिवार गम में डूब गया, क्योंकि समीर जी का परिवार और अपना परिवार पूर्व में कई वर्षों तक एक ही किराये के मकान में गुजारे थे।

21 जून 2018, रांची अपने किराये के मकान में विश्राम कर रहा था। अचानक समीर जी का कॉल अपनी पत्नी के मोबाइल पर आया। उन्होंने बताया कि उनकी मां अब इस दुनिया में नहीं हैं। जैसे ही यह समाचार पता चला। अपना पूरा परिवार गम में डूब गया, क्योंकि समीर जी का परिवार और अपना परिवार पूर्व में कई वर्षों तक एक ही किराये के मकान में गुजारे थे।

अपने बच्चों पर तो समीर जी की मां और पिताजी ने खुब प्यार लूटाया है। जिसका हमलोग कभी कर्ज नहीं उतार सकते। एक ऐसा रिश्ता ईश्वर की कृपा से बंधा है कि निरन्तर चलता ही जा रहा हैं। उनकी मां और पिताजी ने कभी हमें मां-पिता की कमी तक खलने नहीं दी और बच्चों ने खुब दादा-दादी का प्यार पाया। अब समीर जी के दोनों मां और पिताजी अब इस दुनिया में नहीं हैं।

थोड़ी ही देर बाद, दुबारा समीर जी का फोन आया कि उनकी मां के शव को शवगृह में रखना है, हम पैसे खर्च करने को तैयार है, थोड़ा आप हमारी मदद करें। मैं उसी वक्त समीर जी को मदद करने के लिए, अपने मित्रों संजय रंजन, बिपिन सिंह, कांग्रेस पार्टी के नेता आलोक दूबे तथा एक दो भाजपा नेताओं को फोन लगाया। संजय रंजन ने अपनी ओर से जो भी हो सका, मदद करने की कोशिश की, ये अलग बात है कि इसमें सफलता नहीं मिली।

एक अच्छे भाजपा नेता, मैं उनका नाम नहीं लेना चाहुंगा, क्योंकि जैसे ही नाम लूंगा, बेचारे पर भाजपा के ही लोग टूट पड़ेंगे, उन्होंने दिल खोलकर मेरी मदद की। उन्होंने तुरंत स्वास्थ्य मंत्री व रिम्स के अधीक्षक, सेंटेवीटा अस्पताल में पता लगाने की कोशिश की, कि कहां शवगृह हैं, जहां शव को रखा जा सकें। इधर समीर जी भी अपनी ओर से कोशिश कर रहे थे। तभी उक्त अच्छे भाजपा नेता ने, हमें फोन किया कि आपका काम हो गया है, आप रिम्स के अधीक्षक से संपर्क कर लें।

हमने जैसे ही रिम्स के अधीक्षक से बातचीत की। उन्होंने नियम-कायदे-कानून बताने शुरु किये। उनका कहना था कि आप अपना आधार कार्ड की फोटो कॉपी, एक आवेदन पत्र उनके नाम से बनाकर तथा जिस अस्पताल में जो मृतका एडमिट है, उसके यहां से डेडबॉडी कैरिंग सर्टिफिकेट बनाकर लेते आये, काम हो जायेगा, उन्होंने यह भी कहा कि ये सारे काम करके आप सायं पांच बजे तक जरुर आ जाये, क्योंकि इसके बाद शव को शवगृह में रखने में दिक्कत आ सकती है। जब रिम्स के अधीक्षक से हमारी बात हो रही थी, उस वक्त तीन बज रहे थे।

अब क्या करें, हमारे पास दो घंटे के समय थे। समीर जी की मां आर्किड हास्पिटल में भर्ती थी। आधार कार्ड और आवेदन पत्र का तो इंतजाम हो चुका था, पर डेडबॉडी कैरिंग सर्टिफिकेट बनवाने में हमें पसीने छूट गये। आर्किड हास्पिटल में उस वक्त कार्यरत चिकित्सा पदाधिकारी ने कहा कि डेडबॉडी कैरिंग सर्टिफिकेट बनाने के लिए आपको पोस्टमार्टम कराना होगा, पुलिस को इन्फार्म करना होगा, यानी डेडबॉडी कैरिंग सर्टिफिकेट बनवाने के लिए हमें आर्किड अस्पताल ने दो दिनों का अच्छा खासा प्रबंध कर दिया था, क्योंकि पोस्टमार्टम उस दिन हो नहीं सकता था और पुलिस को इन्फार्म करने में क्या होता है? वो जगजाहिर है, क्योंकि अपने देश में पुलिस सेवा कितनी ईमानदारी से चलती है, वो कौन नहीं जानता, जबकि डाक्टर अच्छी तरह से जानता था कि ये सामान्य मौत है।

आर्किड अस्पताल डेथ सर्टिफिकेट देने को तैयार था, पर डेडबॉडी कैरिंग सर्टिफिकेट देने को तैयार नहीं था। अस्पताल के लोग और हम सभी अच्छी तरह जानते थे कि आर्किड हास्पिटल पहुंचते-पहुंचते ही समीर जी की मां जो 74 साल की थी, दम तोड़ चुकी थी। हम कभी समीर जी की मां के शव को देखते, कभी उनके बिलखते परिवार को देखते, क्या करें और क्या न करें, समझ नहीं आ रहा था। देखते-देखते पांच बज गये। रिम्स के अधीक्षक के कथनानुसार सायं पांच बजे के बाद, वे शव को शवगृह में रखने को तैयार नहीं थे।

उधर शव को शवगृह में एक दिन के लिए रखना जरुरी था, क्योंकि समीर जी के मकानमालिक ने शव को अपने घर में रखने से मना कर दिया था, समीर जी की मजबूरी थी, कि उनके परिवार के कुछ सदस्य मां के अंतिम दर्शन करने के लिए दूसरे दिन सुबह आनेवाले थे, कोई विकल्प नहीं था. अब क्या करें, अंत में किसी प्रकार से मेकॉन हास्पिटल में पता चला कि एक शव गृह हैं, वहीं समीर जी की मां के शव को रखा गया और दूसरे दिन यानी 22 जून को वहीं से समीर जी की मां का अंतिम संस्कार हरमू मुक्ति धाम में कर दिया गया।

अब सवाल यह है कि आखिर कोई भी सिस्टम बना है, तो वह आम जनता के लाभ के लिए ही न बना है, और जब उस सिस्टम का किसी जरुरतमंद को लाभ ही नहीं मिले और इसके लिए पैरवी की आवश्यकता पड़ जाये, पैरवी के बाद दस ऐसे लामकाम बांध दिये जाये कि आखिर में उस आदमी की पैरवी भी पस्त हो जाये तो फिर ऐसे सिस्टम से क्या लाभ? पहली बार एक शव को मात्र एक दिन शवगृह में रखने के लिए हमें नाक रगड़ने पड़े, फिर भी हमें उसका लाभ नहीं मिला, फिर भी जिन्होंने हमें सहयोग करने में अपनी विशेष भूमिका अदा की, हम उनके प्रति दिल से आभार प्रकट करते हैं।

Krishna Bihari Mishra

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