स्मृति दिवस विशेष, महावतार बाबाजी का अमर संदेश: प्रेम, क्रियायोग और आत्मसाक्षात्कार का दिव्य पथ
महावतार बाबाजी केवल योग परंपरा के एक रहस्यमय महायोगी नहीं, बल्कि मानवता के आध्यात्मिक उत्थान के लिए समर्पित उस दिव्य चेतना के प्रतीक हैं, जो काल, देश और सीमाओं से परे होकर आज भी साधकों का मार्गदर्शन कर रही है। उनके स्मृति दिवस पर उनका संदेश एक बार फिर मानव समाज को प्रेम, आत्मसाक्षात्कार और विश्वशांति की दिशा में प्रेरित करता है।
महावतार बाबाजी का मूल संदेश है कि प्रत्येक मनुष्य ईश्वर की संतान है तथा शांति और आनंद उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। उनके अनुसार संसार की अशांति का कारण बाहरी परिस्थितियां नहीं, बल्कि मनुष्य का स्वयं को केवल शरीर मान लेना है। यदि व्यक्ति अपने भीतर विद्यमान दिव्य सत्ता का अनुभव कर ले, तो उसे जिस शांति और सुख की तलाश बाहर है, वह उसके अपने अंतर्मन में ही उपलब्ध हो सकता है।
महावतार बाबाजी के दिव्य व्यक्तित्व से विश्व का परिचय प्रेमावतार परमहंस योगानन्द की विश्वप्रसिद्ध पुस्तक ‘योगी कथामृत’ (Autobiography of a Yogi) के माध्यम से हुआ। 25 जुलाई 1920 को, जब 27 वर्षीय परमहंस योगानन्द अमेरिका यात्रा को लेकर अनेक आशंकाओं से घिरे हुए ध्यान में लीन थे, तभी महावतार बाबाजी उनके समक्ष प्रकट हुए। उन्होंने योगानन्द को आश्वस्त करते हुए कहा, “डरो मत, अमेरिका जाओ। तुम्हारी रक्षा होगी। तुम्हें ही हमने क्रियायोग के विश्वव्यापी प्रचार के लिए चुना है।” यही घटना आगे चलकर विश्वभर में क्रियायोग के प्रसार का आधार बनी।
बाबाजी ने इससे पूर्व ही स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि को संकेत दे दिया था कि उनके पास एक विशेष शिष्य आएगा, जो क्रियायोग को विश्वभर में पहुंचाएगा। यही शिष्य आगे चलकर परमहंस योगानन्द बने। बाबाजी का विश्वास था कि साधारण गृहस्थ भी क्रियायोग के नियमित अभ्यास से इंद्रियातीत आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त कर सकता है और जब बड़ी संख्या में लोग आत्मानुभूति की इस साधना को अपनाएंगे, तब विश्व में स्थायी शांति की स्थापना संभव होगी।
योग परंपरा के अनुसार महावतार बाबाजी हजारों वर्षों से दिव्य देह में विद्यमान हैं। उनका कोई ज्ञात जन्मस्थान या पारिवारिक इतिहास नहीं है। उन्हें समय और मृत्यु से परे माना जाता है तथा उनका स्वरूप लगभग 25 वर्ष के तेजस्वी युवक जैसा बताया गया है। उन्हें मनुष्य और ईश्वर के बीच एक दिव्य सेतु के रूप में देखा जाता है। परंपरागत मान्यता है कि उन्होंने आदि शंकराचार्य, संत कबीर सहित अनेक महापुरुषों का मार्गदर्शन किया और वे इस युग के अंत तक मानवता का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
महावतार बाबाजी ने ही प्राचीन क्रियायोग परंपरा को संरक्षित रखा और वर्ष 1861 में उत्तराखंड के रानीखेत स्थित द्रोणगिरि पर्वत पर लाहिड़ी महाशय को इसकी दीक्षा देकर इसका पुनरुद्धार किया। उस समय लाहिड़ी महाशय दानापुर के सैन्य इंजीनियरिंग विभाग में लेखाकार थे। बाबाजी की प्रेरणा से उनका स्थानांतरण रानीखेत हुआ, जहां उन्हें पूर्वजन्मों का स्मरण कराया गया और दिव्य अनुभूति के बीच क्रियायोग की दीक्षा प्रदान की गई। साथ ही उन्हें यह आदेश भी मिला कि वे गृहस्थ जीवन में रहते हुए लोगों को ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग दिखाएं। यह संदेश अपने समय में अत्यंत क्रांतिकारी था, क्योंकि इससे यह स्पष्ट हुआ कि आत्मसाक्षात्कार केवल संन्यासियों के लिए ही नहीं, बल्कि गृहस्थों के लिए भी समान रूप से संभव है।
लाहिड़ी महाशय से यह आध्यात्मिक परंपरा स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि तक पहुंची और उनके माध्यम से परमहंस योगानन्द ने इसे विश्व के अनेक देशों तक पहुंचाया। आज भारत में योगदा सत्संग सोसाइटी तथा विदेशों में सेल्फ-रियलाइजेशन फैलोशिप इसी दिव्य परंपरा का प्रसार कर रही हैं।
महावतार बाबाजी के स्वरूप का मूल आधार प्रेम माना गया है। योगदा सत्संग परंपरा की तृतीय अध्यक्षा दया माता ने रानीखेत स्थित बाबाजी की गुफा में ध्यान के दौरान ऐसा अनुभव किया कि मानो उनके हृदय में प्रेम की अनंत तरंगें उमड़ पड़ी हों। उस आध्यात्मिक अनुभूति ने उन्हें यह बोध कराया कि बाबाजी का वास्तविक स्वरूप ही प्रेम है और प्रेम ही संसार को बदलने की सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने यह संदेश भी दिया कि सच्चा साधक अपने गुरु के आदेश पर कभी संशय नहीं करता।
योग परंपरा की मान्यता के अनुसार महावतार बाबाजी आज भी मानवता के कल्याण के लिए कार्यरत हैं। जो साधक नियमित क्रियायोग, ध्यान और ईश्वर-भक्ति का अभ्यास करता है, वह अपने जीवन में उनकी दिव्य उपस्थिति का अनुभव कर सकता है। महावतार बाबाजी का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों पहले था। प्रेम, विनम्रता, गुरु-भक्ति और क्रियायोग के मार्ग को अपनाकर मनुष्य अपने भीतर स्थित दिव्यता को पहचान सकता है। यही आत्मबोध उसे भय, अशांति और जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त कर उस शाश्वत आनंद तक पहुंचाता है, जिसे महावतार बाबाजी ने समस्त मानवता का वास्तविक अधिकार बताया है।
